बिजली की रिकॉर्ड मांग फिर भी तीन साल से ठप हैं यूपी के नए पावर प्लांट

ओबरा और अनपरा में 3200 मेगावॉट के नए थर्मल पावर प्लांट के लिए 2023 में करार हुआ था, लेकिन कोल लिंकेज, पर्यावरण मंजूरी और वित्तीय अड़चनों के कारण निर्माण अब तक शुरू नहीं हो सका

सांकेतिक तस्वीर

उत्तर प्रदेश में बिजली की मांग हर साल नए रिकॉर्ड बना रही है. औद्योगिक निवेश, एक्सप्रेसवे, डेटा सेंटर, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बीच राज्य सरकार लगातार यह दावा करती रही है कि आने वाले वर्षों में बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए उत्पादन क्षमता में बड़े पैमाने पर वृद्धि की जा रही है. 

इसी रणनीति के तहत सोनभद्र जिले के ओबरा और अनपरा में 3200 मेगावॉट क्षमता के चार नए थर्मल पावर यूनिट स्थापित करने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई गई थी. लेकिन विडंबना यह है कि जिस परियोजना को उत्तर प्रदेश की भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का आधार माना जा रहा था, उसके लिए करार होने के लगभग तीन साल बाद भी निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पाया है.

योजना के तहत ओबरा-डी और अनपरा-ई परियोजनाओं में 800-800 मेगावॉट की दो-दो इकाइयां स्थापित की जानी हैं. कुल मिलाकर दोनों परियोजनाओं से 3200 मेगावॉट बिजली उत्पादन होना है. 2023 में उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (UPRVUNL) और राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (NTPC) के बीच संयुक्त उपक्रम के माध्यम से इन परियोजनाओं को विकसित करने का समझौता हुआ था. राज्य सरकार ने इसे प्रदेश की बिजली व्यवस्था के लिए गेम चेंजर परियोजना बताया था. मगर आज स्थिति यह है कि न पर्यावरणीय मंजूरी मिली है, न पर्याप्त कोयले की व्यवस्था हो सकी है और न ही वित्तीय अड़चनें दूर हुई हैं. परिणाम यह है कि परियोजना स्थल पर एक ईंट तक नहीं रखी जा सकी है.

बिजली विशेषज्ञों का मानना है कि ओबरा-डी और अनपरा-ई परियोजनाएं केवल बिजली उत्पादन की परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि उत्तर प्रदेश की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी हुई हैं. राज्य में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है. गर्मियों के दौरान मांग कई बार रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुकी है. उत्तर प्रदेश अभी भी अपनी कुल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा केंद्रीय उत्पादन स्टेशनों और बाजार से खरीदी गई बिजली के माध्यम से पूरा करता है. अगर राज्य के पास अपनी अतिरिक्त उत्पादन क्षमता होगी तो न केवल बिजली आपूर्ति अधिक स्थिर होगी बल्कि बाजार से महंगी बिजली खरीदने की जरूरत भी कम होगी. विशेषज्ञों का कहना है कि अगले दशक में डेटा सेंटर, इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण, औद्योगिक कॉरिडोर और शहरी विस्तार के कारण बिजली की मांग और तेजी से बढ़ने वाली है. ऐसे में 3200 मेगावॉट की अतिरिक्त क्षमता का समय पर तैयार होना बेहद महत्वपूर्ण है.

कोल लिंकेज बना सबसे बड़ी बाधा

परियोजना की प्रगति में सबसे बड़ी अड़चन कोयले की उपलब्धता को माना जा रहा है. ऊर्जा विभाग और उत्पादन निगम के अधिकारियों का कहना है कि कोल इंडिया लिमिटेड की तरफ से जो कोयला स्रोत प्रस्तावित किया गया है, वह अपेक्षाकृत महंगा है और परियोजना की आर्थिक व्यवहार्यता पर असर डाल सकता है. UPRVUNL के निदेशक (परियोजना एवं वाणिज्य) एस.के. दत्ता के अनुसार राज्य सरकार चाहती है कि परियोजनाओं को ऐसा कोल लिंकेज मिले जिससे भविष्य में बिजली उत्पादन लागत नियंत्रित रह सके. उनका कहना है कि वर्तमान प्रस्ताव के तहत आवश्यक कोयले का केवल लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ही सुनिश्चित हो पा रहा है.

ऊर्जा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का तर्क है कि उत्तर प्रदेश देश के सबसे बड़े बिजली उपभोक्ता राज्यों में शामिल है. ऐसे में यदि नए संयंत्रों के लिए महंगे कोयले पर निर्भरता बढ़ी तो इसका सीधा असर उपभोक्ताओं पर पड़ेगा. यही कारण है कि राज्य सरकार कोयले के अधिक किफायती स्रोतों की तलाश और पुनः आवंटन की मांग कर रही है.

कई स्तर पर अवरोध 

कोयले की समस्या इतनी गंभीर हो चुकी है कि इस पर मुख्य सचिव एस.पी. गोयल की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की गई. बैठक में कोल इंडिया, एनटीपीसी और राज्य ऊर्जा विभाग के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. जानकारी के अनुसार राज्य सरकार ने कोल इंडिया से अपने फ्लेक्सी-यूटिलाइजेशन मैकेनिज्म के तहत कोयले के पुनर्वितरण की संभावनाएं तलाशने का आग्रह किया है ताकि परियोजनाओं को पर्याप्त और अपेक्षाकृत सस्ता ईंधन उपलब्ध कराया जा सके. हालांकि अभी तक इस दिशा में कोई अंतिम समाधान सामने नहीं आया है. जब तक पूर्ण कोल लिंकेज सुनिश्चित नहीं होता, परियोजना के लिए वित्तीय क्लोजर और निर्माण प्रक्रिया आगे बढ़ाना कठिन माना जा रहा है. 

परियोजना के सामने दूसरी बड़ी बाधा पर्यावरणीय स्वीकृति है. उत्पादन निगम के अधिकारियों का कहना है कि पर्यावरण मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जा चुका है और आवश्यक प्रक्रियाएं जारी हैं. लेकिन मंजूरी मिलने में हो रही देरी ने पूरे प्रोजेक्ट की टाइमलाइन को प्रभावित कर दिया है. थर्मल पावर परियोजनाओं के लिए पर्यावरणीय मंजूरी बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इनमें भूमि उपयोग, जल संसाधन, वायु गुणवत्ता और स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि हाल के वर्षों में पर्यावरणीय मानकों को लेकर सख्ती बढ़ी है इसलिए ऐसी परियोजनाओं को मंजूरी मिलने में पहले की तुलना में अधिक समय लग रहा है.

परियोजना में वित्तीय बाधाएं भी कम नहीं हैं. अधिकारियों के मुताबिक एनटीपीसी के बोर्ड ने संयुक्त उपक्रमों में निवेश के लिए लगभग 5000 करोड़ रुपए की सीमा तय की थी. माना जा रहा है कि इतनी बड़ी परियोजना के लिए यह राशि पर्याप्त नहीं है. जानकारी के मुताबिक एनटीपीसी ने निवेश सीमा बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार से संपर्क किया है. राज्य सरकार भी चाहती है कि इस प्रस्ताव पर जल्द निर्णय लिया जाए ताकि परियोजना के वित्तीय ढांचे को अंतिम रूप दिया जा सके. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वित्तीय मंजूरियों में और देरी हुई तो परियोजना की कुल लागत में भारी वृद्धि हो सकती है.

लागत बढ़ने का खतरा 

बिजली इंजीनियरों के संगठन विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने परियोजना में हो रही देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त की है. समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे का कहना है कि निर्माण कार्य में हर वर्ष की देरी परियोजना लागत को बढ़ाती है. स्टील, सीमेंट, मशीनरी और निर्माण सामग्री की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है. उनका कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो भविष्य में इन संयंत्रों से मिलने वाली बिजली महंगी होगी और इसका बोझ आखिरकार आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा. 

संघर्ष समिति का दावा है कि अगर परियोजना का क्रियान्वयन सीधे राज्य विद्युत उत्पादन निगम की तरफ से किया जाए और ओबरा तथा अनपरा में पहले से मौजूद आधारभूत ढांचे का अधिकतम उपयोग किया जाए तो बिजली उत्पादन लागत में 40 से 50 पैसे प्रति यूनिट तक की कमी लाई जा सकती है. समिति का तर्क है कि इन दोनों स्थलों पर पहले से सड़क, जल आपूर्ति, ट्रांसमिशन नेटवर्क, रेलवे संपर्क और अन्य बुनियादी सुविधाएं मौजूद हैं. ऐसे में नई परियोजनाओं की लागत कम की जा सकती है.

अधिकारियों को आशंका है कि निर्माण शुरू होने के बाद भूमि और पुनर्वास से जुड़े मुद्दे भी सामने आ सकते हैं. पिछले कुछ वर्षों में पुराने तापीय विद्युत संयंत्रों के आसपास आबादी बढ़ी है और कई नई बस्तियां विकसित हुई हैं. ऊर्जा विभाग के अधिकारियों के अनुसार निर्माण कार्य शुरू करने से पहले प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और पुनर्स्थापन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी. इसके लिए प्रारंभिक स्तर पर योजनाएं तैयार की जा रही हैं. हालांकि प्रशासन का मानना है कि यदि पुनर्वास प्रक्रिया में पर्याप्त संवेदनशीलता नहीं बरती गई तो यह भी परियोजना में देरी का कारण बन सकती है.

राज्य सरकार और उत्पादन निगम के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. उनका कहना है कि कोल लिंकेज, पर्यावरण मंजूरी और वित्तीय संरचना जैसे मुद्दों पर केंद्र सरकार, कोल इंडिया और एनटीपीसी के साथ नियमित स्तर पर बातचीत चल रही है. अधिकारियों का कहना है कि जैसे ही पर्यावरणीय मंजूरी और कोयले की उपलब्धता का मुद्दा सुलझेगा, परियोजना के निर्माण कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा. सरकार का दावा है कि यह परियोजना प्रदेश की ऊर्जा जरूरतों को देखते हुए सर्वोच्च प्राथमिकता वाली परियोजनाओं में शामिल है.

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