गाजीपुर एनकाउंटर पर अपनी ही सरकार के खिलाफ क्यों दिखे संजय निषाद?

योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने गाजीपुर में कमलेश बिंद एनकाउंटर को लेकर यूपी पुलिस पर सवाल उठाए हैं

मंत्री संजय निषाद. (Photo: Screengrabs)
संजय निषाद

उत्तर प्रदेश की राजनीति में अक्सर विपक्ष सरकार पर हमलावर दिखाई देता है लेकिन जब सरकार का ही एक सहयोगी दल सार्वजनिक रूप से पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाने लगे तो मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं रह जाता. उसके राजनीतिक मायने भी तलाशे जाने लगते हैं.

गाजीपुर के चर्चित विनीत राय हत्याकांड के आरोपी कमलेश बिंद के 4 जून को पुलिस एनकाउंटर के बाद कुछ ऐसा ही देखने को मिला है. योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री और निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय कुमार निषाद ने जिस तरह खुलकर पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं, उसने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है.

संजय निषाद ने न केवल एनकाउंटर की स्वतंत्र जांच की मांग की, बल्कि यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर किसी व्यक्ति को सीधे मुठभेड़ में मार देना उचित नहीं है. उन्होंने पुलिस अधीक्षक तक को चुनौती देते हुए कहा कि अगर कार्रवाई निष्पक्ष है तो मुख्य आरोपियों के खिलाफ भी वैसी ही सख्ती दिखाई जाए. यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी विपक्षी नेता का नहीं बल्कि सरकार के सहयोगी और मंत्रिमंडल के सदस्य का है.

सिर्फ एनकाउंटर नहीं, वोट बैंक की चिंता भी

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संजय निषाद का यह रुख केवल मानवीय या संवैधानिक चिंता तक सीमित नहीं है. इसके पीछे एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक गणित भी काम कर रहा है. कमलेश बिंद जिस समुदाय से आता था, वह पूर्वांचल में निषाद, मल्लाह, केवट, बिंद, कश्यप और मछुआरा समूहों के व्यापक सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा माना जाता है. इसी सामाजिक आधार पर निषाद पार्टी अपनी राजनीति खड़ी करती है.

कमलेश बिंद की मौत के बाद जिस तरह उसके परिवार और समुदाय के कुछ लोगों ने विरोध दर्ज कराया, उसने निषाद पार्टी के नेतृत्व पर दबाव बनाया. खुद संजय निषाद ने स्वीकार किया कि समुदाय के लोग उनके घर तक पहुंच गए और उनसे जवाब मांगने लगे. ऐसे में उनके सामने चुनौती केवल एक एनकाउंटर पर प्रतिक्रिया देने की नहीं थी बल्कि अपने सामाजिक आधार को यह संदेश देने की भी थी कि पार्टी उनके साथ खड़ी है. गोरखपुर विश्वविद्यालय से रि‍टायर प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सुशील राय बताते हैं, “दरअसल, हाशिये की जातियों पर आधारित पार्टियों की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही होता है कि सत्ता में रहते हुए भी उन्हें अपने मूल वोट बैंक को लगातार आश्वस्त करना पड़ता है कि उनकी पहचान और हित सुरक्षित हैं. यदि वे ऐसा नहीं कर पातीं तो उनका सामाजिक आधार तेजी से खिसक सकता है.”

2024 के नतीजों का असर

संजय निषाद के बयानों में बार-बार 2024 के लोकसभा चुनावों का संदर्भ दिखाई देता है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि जनता की नाराजगी चुनावी नतीजों में दिखाई देती है और राजनीतिक दलों को इससे सबक लेना चाहिए. यह टिप्पणी महज संयोग नहीं है. लोकसभा चुनाव 2024 में उत्तर प्रदेश में BJP के नेतृत्व वाले NDA को अपेक्षित सफलता नहीं मिली. BJP को कई सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा, जबकि समाजवादी पार्टी ने पिछड़े और दलित वर्गों में उल्लेखनीय पैठ बनाई. PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा चुनावी विमर्श के केंद्र में रहा. 

संजय निषाद को वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में संतकबीर नगर सीट से अपने बेटे प्रवीण निषाद की हार सबसे ज्यादा कचोट रही है. असल में निषाद पार्टी की बेचैनी की जड़ें केवल एक चुनावी हार तक सीमित नहीं हैं. पार्टी का पूरा राजनीतिक आधार निषाद समुदाय की पहचान, सम्मान और हिस्सेदारी के सवाल पर टिका है. वर्ष 2013 में राष्ट्रीय निषाद एकता परिषद से शुरू हुई यह यात्रा 2016 में निषाद पार्टी के रूप में सामने आई. हर संकल्प दिवस पर निषाद समाज को SC दर्जे की मांग दोहराई जाती है, लेकिन आज तक इस मुद्दे पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकला. ऐसे में पार्टी के भीतर यह भावना गहराती जा रही है कि सत्ता में रहते हुए भी उनके मूल सवाल हाशिये पर हैं.

ऐसे माहौल में निषाद पार्टी यह समझती है कि यदि उसके पारंपरिक समर्थकों में यह धारणा बनती है कि उनकी आवाज सत्ता तक नहीं पहुंच रही है तो उसका सीधा राजनीतिक नुकसान हो सकता है. इसलिए संजय निषाद का दखल केवल एक घटना पर प्रतिक्रिया नहीं बल्कि 2027 की तैयारी का हिस्सा भी माना जा रहा है. सुशील राय बताते हैं, “भारतीय राजनीति में सहयोगी दल अक्सर दोहरी भूमिका निभाते हैं. सत्ता में शामिल रहते हुए वे सरकार की उपलब्धियों का श्रेय लेते हैं लेकिन साथ ही अपने सामाजिक आधार से जुड़े मुद्दों पर स्वतंत्र पहचान बनाए रखने की कोशिश भी करते हैं. संजय निषाद का मौजूदा रुख इसी राजनीतिक रणनीति का उदाहरण माना जा रहा है.”

निषाद पार्टी की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि BJP के साथ गठबंधन में रहते हुए भी वह अपनी अलग राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखे. अगर पार्टी पूरी तरह BJP की छाया में दिखाई देती है तो उसके अस्तित्व पर सवाल खड़े हो सकते हैं. दूसरी ओर अगर वह अत्यधिक टकराव का रास्ता अपनाती है तो सत्ता में उसकी हिस्सेदारी प्रभावित हो सकती है. ऐसे में एनकाउंटर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सवाल उठाना एक संतुलित राजनीतिक संदेश देता है. इससे पार्टी अपने समुदाय को यह संकेत देती है कि वह उनकी आवाज उठा रही है, जबकि सरकार के खिलाफ सीधा राजनीतिक मोर्चा भी नहीं खोलती.

‘ठोक देंगे’ मॉडल पर नई बहस

योगी आदित्यनाथ सरकार की पहचान लंबे समय से सख्त कानून-व्यवस्था और एनकाउंटर आधारित कार्रवाई से जुड़ी रही है. BJP इसे अपराधियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का प्रतीक बताती है, जबकि विपक्ष इसे मानवाधिकार और संवैधानिक प्रक्रिया के खिलाफ मानता रहा है. गाजीपुर की घटना ने इस बहस को फिर जीवित कर दिया है. अंतर सिर्फ इतना है कि इस बार सवाल विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के एक सहयोगी की ओर से भी उठ रहे हैं.

संजय निषाद ने सीधे तौर पर कहा कि न्याय करना अदालत का काम है और पुलिस की भूमिका कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित होनी चाहिए. यह टिप्पणी केवल एक एनकाउंटर की आलोचना नहीं बल्कि उस व्यापक राजनीतिक विमर्श को चुनौती देती है जिसमें मुठभेड़ों को त्वरित न्याय के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है. यही वजह है कि उनके बयान को राजनीतिक हलकों में विशेष महत्व दिया जा रहा है.

गाजीपुर एनकाउंटर ने विपक्ष को भी सरकार पर हमला करने का अवसर दिया है. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पहले से ही एनकाउंटर नीति को लेकर सरकार की आलोचना करते रहे हैं. उन्होंने इस मामले को जातीय और सामाजिक न्याय के प्रश्न से जोड़ते हुए आरोप लगाया कि कार्रवाई चुनिंदा समुदायों के खिलाफ की जा रही है. हालांकि BJP इन आरोपों को खारिज करती है और कहती है कि अपराधी की कोई जाति या धर्म नहीं होता लेकिन जब सहयोगी दल का नेता भी निष्पक्ष जांच की मांग करने लगे तो विपक्ष के आरोपों को अतिरिक्त राजनीतिक बल मिल जाता है. यही कारण है कि यह विवाद सामान्य कानून-व्यवस्था के मुद्दे से आगे बढ़कर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब हैं और राजनीतिक दलों ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है. BJP जहां कानून-व्यवस्था और विकास को अपना प्रमुख एजेंडा बनाए रखना चाहती है, वहीं सहयोगी दल अपने-अपने सामाजिक समूहों के बीच पकड़ मजबूत करने में जुटे हैं. संजय निषाद का हालिया रुख इसी तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है. वह एक तरफ NDA का हिस्सा बने रहना चाहते हैं, दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि निषाद-बिंद समाज उन्हें अपना वास्तविक प्रतिनिधि मानता रहे.

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