यूपी में इंसानों का बाजार : शादी, गोद और मजदूरी के लिए हो रही मानव तस्करी!

लखनऊ से बरेली और हापुड़ तक फैले नेटवर्क ने खोली भयावह तस्वीर, गरीब परिवारों, अनाथ बच्चों और मजबूर महिलाओं को बना रहे निशाना

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सांकेतिक तस्वीर

लखनऊ के मोहनलालगंज में 16 और 12 वर्ष की दो बहनों के अपहरण के बाद जो कहानी सामने आई, उसने उत्तर प्रदेश में मानव तस्करी के खतरनाक नेटवर्क की परतें उधेड़ दीं. दोनों किशोरियों को शादी के लिए राजस्थान में बेचने की तैयारी थी.

पुलिस ने 4 जून को जब मामले का खुलासा किया तो पता चला कि यह कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि वर्षों से सक्रिय एक ऐसा संगठित गिरोह था जो गरीब, असहाय और कमजोर परिवारों की बेटियों को निशाना बनाकर उन्हें लाखों रुपए में बेच रहा था.

मोहनलालगंज पुलिस की जांच में सामने आया कि गिरोह की महिला सरगना पहले आर्थिक रूप से कमजोर या अनाथ किशोरियों की पहचान करती थी. उन्हें अच्छे कपड़े पहनाकर तस्वीरें खींची जाती थीं और राजस्थान तथा अन्य राज्यों में बैठे खरीदारों को भेजी जाती थीं. मोबाइल फोन पर सौदा तय होता और फिर किशोरियों को शादी के नाम पर बेच दिया जाता था. यह मामला केवल दो बहनों के अपहरण का नहीं है. यह उस गहरे संकट की कहानी है, जो उत्तर प्रदेश में मानव और बच्चा तस्करी के रूप में लगातार फैल रहा है.

मानव तस्करी अब पारंपरिक अपराध नहीं रह गई है. पहले जहां इसका संबंध केवल जबरन मजदूरी या देह व्यापार से जोड़ा जाता था वहीं अब इसके कई नए रूप सामने आ रहे हैं. शादी के लिए लड़कियों की खरीद-फरोख्त, बच्चों की अवैध बिक्री, फर्जी गोद लेने के नेटवर्क, घरेलू मजदूरी, बाल श्रम और संगठित अपराधों के लिए बच्चों की सप्लाई जैसे नए आयाम सामने आए हैं. लखनऊ, बरेली और हापुड़ में हाल में सामने आए तीन बड़े मामलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तस्करों के नेटवर्क गांवों से लेकर बड़े शहरों और अस्पतालों तक फैल चुके हैं. इन गिरोहों में दलाल, डॉक्टर, नर्स, वाहन चालक और स्थानीय मुखबिर तक शामिल हैं.

शादी के लिए खरीदी जा रहीं बेटियां

पुलिस जांच में सामने आया है कि राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में लड़कियों की कम संख्या मानव तस्करों के लिए बड़ा बाजार बन गई है. वहां विवाह योग्य महिलाओं की कमी के कारण कई परिवार दलालों के जरिए दूसरे राज्यों से लड़कियां खरीदते हैं. मोहनलालगंज मामले में गिरफ्तार आरोपियों ने कबूल किया कि वे किशोरियों को एक लाख से डेढ़ लाख रुपए तक में बेचते थे. पुलिस सूत्रों के अनुसार, कई मामलों में यह रकम पांच लाख रुपए तक पहुंच जाती है.

सामाजिक कार्यकर्ता सुमन रावत का कहना है कि खरीदी गई लड़कियों की स्थिति अक्सर बेहद खराब होती है. उन्हें पत्नी नहीं बल्कि श्रमिक या संपत्ति की तरह देखा जाता है. कई मामलों में एक महिला को परिवार के कई सदस्यों के साथ रहने के लिए मजबूर किया जाता है.

बच्चों की खरीद-फरोख्त का कॉरपोरेट मॉडल

मानव तस्करी का दूसरा भयावह चेहरा बरेली में सामने आया, जहां 24 को डेढ़ साल के मासूम ऋषभ के अपहरण की जांच करते हुए पुलिस एक ऐसे नेटवर्क तक पहुंच गई जो बच्चों की चोरी और बिक्री का संगठित कारोबार चला रहा था. जांच में सामने आया कि गिरोह धार्मिक स्थलों, मेलों, अस्पतालों और भीड़भाड़ वाले इलाकों से बच्चों का अपहरण करता था. इसके बाद उन्हें डॉक्टरों और दलालों के नेटवर्क के जरिए निसंतान दंपतियों को बेचा जाता था.

सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस गिरोह में डॉक्टर, नर्स और अस्पताल से जुड़े लोग शामिल पाए गए. पुलिस के अनुसार, बच्चे पांच से दस लाख रुपए तक में बेचे जाते थे. यह खुलासा बताता है कि अब मानव तस्करी केवल सड़क स्तर का अपराध नहीं रही. इसके लिए संगठित सप्लाई चेन विकसित हो चुकी है, जिसमें अपहरणकर्ता, बिचौलिए, मेडिकल पेशेवर और खरीदारों का नेटवर्क शामिल है. बरेली पुलिस की जांच में कुछ और गंभीर तथ्य सामने आए.

पूछताछ में संकेत मिले कि कुछ मामलों में अविवाहित गर्भवती महिलाओं को गर्भपात न कराने के लिए लालच दिया जाता था. बच्चे के जन्म के बाद नवजात को मां से अलग कर निसंतान दंपतियों को बेच दिया जाता था. जांच एजेंसियां अब ऐसे कई IVF सेंटरों और निजी चिकित्सा संस्थानों की भूमिका की पड़ताल कर रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि कानूनी गोद लेने की प्रक्रिया लंबी और जटिल होने के कारण कुछ लोग शॉर्टकट तलाशते हैं. इसी मानसिकता का फायदा उठाकर ऐसे गिरोह फल-फूल रहे हैं.

मजदूरी के लिए बच्चों की तस्करी

मानव तस्करी का तीसरा चेहरा हापुड़ में सामने आया. यहां 1 जून को पुलिस ने ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया जो किशोर लड़कों को अगवा कर किसानों और अन्य लोगों को बेच देता था. गिरफ्तार आरोपियों ने करीब 15 किशोरों की तस्करी करने की बात स्वीकार की. बच्चों को 10 से 12 हजार रुपए में बेच दिया जाता था और उनसे खेतों तथा घरों में काम कराया जाता था. यह मामला बताता है कि मानव तस्करी केवल महिलाओं और छोटे बच्चों तक सीमित नहीं है. किशोर लड़के भी इस अपराध के बड़े शिकार बन रहे हैं. लखनऊ और बरेली दोनों मामलों में एक समानता दिखती है. अपराधियों ने ऐसे परिवारों को चुना जो आर्थिक रूप से कमजोर थे या जिनके सामाजिक सुरक्षा तंत्र कमजोर थे.

सुमन रावत बताती हैं कि अनाथ बच्चे, अकेली महिलाएं, मजदूर परिवार, प्रवासी कामगार और झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा जोखिम में रहते हैं. समाजशास्त्री सुधीर सिंह मानते हैं कि गरीबी, अशिक्षा और जागरूकता की कमी मानव तस्करी के लिए उपजाऊ जमीन तैयार करती है. कई बार परिवार बेहतर जीवन, नौकरी या शादी के झांसे में खुद बच्चों को तस्करों के हाथों सौंप देते हैं.

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

लखनऊ विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के विशेषज्ञों का मानना है कि मानव तस्करी केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं है बल्कि यह सामाजिक और आर्थिक असमानता का भी परिणाम है. उनके अनुसार, जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा मजबूत नहीं होगी, तब तक तस्कर कमजोर वर्गों को निशाना बनाते रहेंगे.

बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि बच्चा चोरी और अवैध गोद लेने के मामलों में तकनीकी निगरानी बढ़ाने की जरूरत है. अस्पतालों, प्रसूति केंद्रों और बाल संरक्षण संस्थानों की नियमित ऑडिटिंग होनी चाहिए. पूर्व पुलिस अधिकारी एस. के. राय का मानना है कि मानव तस्करी अब अंतरराज्यीय संगठित अपराध का रूप ले चुकी है इसलिए राज्यों के बीच बेहतर समन्वय और साझा डाटाबेस की जरूरत है.

पुलिस की रणनीति और कार्रवाई

उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाल के वर्षों में मानव तस्करी के खिलाफ विशेष अभियान तेज किए हैं. राज्य के प्रत्येक जिले में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट (AHTU) सक्रिय की गई है. इन इकाइयों का काम मानव तस्करी से जुड़े मामलों की निगरानी, जांच और पीड़ितों के पुनर्वास में सहयोग करना है. पुलिस रेलवे स्टेशन, बस अड्डों और धार्मिक आयोजनों में विशेष निगरानी रख रही है.

महिलाओं और बच्चों के लापता होने की हर सूचना को गंभीरता से लेने के निर्देश दिए गए हैं. इसके अलावा 'ऑपरेशन मुस्कान' और 'ऑपरेशन स्माइल' जैसे अभियानों के जरिए हजारों लापता बच्चों को उनके परिवारों से मिलाया गया है. हाल के मामलों में पुलिस ने तकनीकी सर्विलांस, मोबाइल लोकेशन, सीसीटीवी फुटेज और अंडरकवर ऑपरेशन का इस्तेमाल कर नेटवर्क तक पहुंच बनाई. बरेली में आईपीएस अंशिका वर्मा का ग्राहक बनकर गिरोह तक पहुंचने की रणनीति इसका उदाहरण है.

सबसे बड़ी चुनौती पुनर्वास
विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है. तस्करी से मुक्त कराए गए बच्चों और महिलाओं के पुनर्वास की व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण है. कई पीड़ित मानसिक आघात, सामाजिक बहिष्कार और आर्थिक असुरक्षा का सामना करते हैं. अगर उन्हें उचित सहायता नहीं मिलती तो वे दोबारा तस्करों के जाल में फंस सकते हैं. इसलिए मनोवैज्ञानिक परामर्श, शिक्षा, कौशल प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करना आवश्यक है.

लखनऊ, बरेली और हापुड़ के हालिया मामले एक चेतावनी हैं कि मानव तस्करी का नेटवर्क लगातार नए रूप धारण कर रहा है. कहीं बेटियों को शादी के नाम पर बेचा जा रहा है कहीं मासूम बच्चों का सौदा हो रहा है और कहीं किशोरों को मजदूरी के लिए तस्करी कर भेजा जा रहा है. इन मामलों ने यह भी साबित किया है कि अपराधी अब संगठित नेटवर्क के रूप में काम कर रहे हैं और कई बार समाज के प्रतिष्ठित पेशों से जुड़े लोग भी इसमें शामिल पाए जा रहे हैं.

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