यूपी में सरकारी कर्मचारियों की जेब और जमीन पर नजर से क्यों बढ़ी बेचैनी?
योगी सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के लिए आचरण नियमावली में संशोधन किया है जिस पर कर्मचारी संगठन सवाल उठा रहे हैं

उत्तर प्रदेश में सरकारी कर्मचारियों की वित्तीय गतिविधियों और संपत्ति पर निगरानी को लेकर योगी सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. 10 मार्च को लखनऊ के लोकभवन में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में “उत्तर प्रदेश सरकारी कर्मचारियों की आचरण नियमावली, 1956” के नियम-21 और नियम-24 में संशोधन को मंजूरी दे दी गई.
सरकार का दावा है कि इन बदलावों से सरकारी कर्मचारियों की निवेश और संपत्ति संबंधी गतिविधियों में पारदर्शिता आएगी और जवाबदेही तय होगी. लेकिन दूसरी ओर कर्मचारी संगठनों ने इस फैसले को 'अनावश्यक सख्ती' बताते हुए सरकार पर कर्मचारियों को परेशान करने का आरोप लगाया है.
राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद का कहना है कि सरकार पहले से लागू नियमों को और कठोर बनाकर कर्मचारियों को संदेह के दायरे में खड़ा कर रही है.
क्या बदला है नियमों में
कैबिनेट से मंजूर संशोधन के अनुसार अब यदि कोई सरकारी कर्मचारी एक कैलेंडर वर्ष में अपने मूल वेतन के छह महीने से अधिक की राशि स्टॉक, शेयर या अन्य निवेश में लगाता है, तो उसे इसकी सूचना अपने समुचित प्राधिकारी को देना अनिवार्य होगा. इसी तरह नियम-24 में संशोधन करते हुए यह तय किया गया है कि यदि कोई कर्मचारी दो महीने के मूल वेतन से अधिक कीमत की चल संपत्ति खरीदता है, तो उसे इसकी जानकारी संबंधित विभागीय प्राधिकारी को देनी होगी.
पहले यह सीमा एक महीने के मूल वेतन के बराबर थी. सबसे महत्वपूर्ण बदलाव अचल संपत्ति के मामले में हुआ है. पहले सरकारी कर्मचारियों को हर पांच साल में एक बार अपनी अचल संपत्ति का विवरण देना होता था, लेकिन अब इसे हर साल अनिवार्य कर दिया गया है. इस प्रावधान को अमलीजामा पहनाने से जुड़े सरकारी अधिकारियों का कहना है कि इस कदम का उद्देश्य कर्मचारियों की आय और संपत्ति के बीच संभावित असंतुलन की निगरानी करना है ताकि भ्रष्टाचार और अवैध कमाई पर रोक लगाई जा सके.
राज्य सरकार के अधिकारियों का तर्क है कि पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार के मामलों में अक्सर यह सामने आया कि कई कर्मचारियों के पास उनकी घोषित आय से कहीं अधिक संपत्ति पाई गई. सरकार का मानना है कि नियमित रूप से संपत्ति का खुलासा करने से ऐसे मामलों की पहचान जल्दी हो सकेगी. इसके साथ ही कर्मचारियों को निवेश या बड़ी खरीदारी के बारे में विभाग को बताना होगा, जिससे वित्तीय गतिविधियों पर पारदर्शिता बनी रहेगी. दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में सतर्कता और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसियों द्वारा कई सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति के मामले सामने आए हैं.
ऐसे मामलों ने सरकार पर यह दबाव भी बनाया कि कर्मचारियों की वित्तीय गतिविधियों पर निगरानी की व्यवस्था मजबूत की जाए. सरकार का तर्क है कि यदि किसी कर्मचारी की आय के अनुरूप ही उसकी संपत्ति है, तो उसे जानकारी देने में कोई समस्या नहीं होनी चाहिए.
कर्मचारी संगठनों की नाराजगी
कर्मचारी संगठनों के विरोध के बीच सरकार की सख्ती पहले से ही दिख रही है. मुख्य सचिव के एक आदेश के तहत करीब 68,000 कर्मचारियों का जनवरी का वेतन रोक दिया गया क्योंकि उन्होंने अपनी संपत्ति का विवरण पोर्टल पर अपलोड नहीं किया था. सरकार का कहना है कि यह कदम इसलिए उठाया गया ताकि कर्मचारी निर्धारित समय सीमा के भीतर अपनी संपत्ति का विवरण दें. लेकिन कर्मचारी संगठन इसे 'अनुशासनात्मक कार्रवाई के नाम पर दबाव' बताते हैं. उनका कहना है कि तकनीकी समस्याओं और प्रशासनिक देरी के कारण भी कई कर्मचारी समय पर विवरण अपलोड नहीं कर पाए.
राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के अध्यक्ष जे. एन. तिवारी ने इस संशोधन पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उनका कहना है कि सरकार लगातार कर्मचारियों पर शिकंजा कस रही है. उन्होंने कहा, “सरकार जानबूझकर कर्मचारियों पर लगातार दबाव बना रही है. पहले ही मुख्य सचिव के आदेश से 68 हजार कर्मचारियों का जनवरी से वेतन रोका गया है. अब आचरण नियमावली में संशोधन करके दो माह के मूल वेतन से अधिक मूल्य की चल संपत्ति, वाहन, सोना या निवेश की सूचना देना अनिवार्य कर दिया गया है.”
तिवारी का कहना है कि संपत्ति की जानकारी देने की व्यवस्था पहले से ही नियमावली में मौजूद है, इसलिए नए संशोधन की आवश्यकता नहीं थी. उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा, “अगर कोई कर्मचारी अपनी बेटी की शादी करता है तो उसे वाहन और गहने खरीदने पड़ते हैं. आज किसी भी वाहन की कीमत दो लाख रुपये से कम नहीं है और सोने की कीमत भी बहुत ज्यादा है. क्या अब कर्मचारी को बेटी की शादी के लिए भी सरकार से अनुमति लेकर खर्च करना होगा?”
कर्मचारी संगठनों का एक तर्क यह भी है कि इस तरह की अनिवार्य घोषणाओं से कर्मचारियों की सामाजिक प्रतिष्ठा प्रभावित हो सकती है. जे. एन. तिवारी के अनुसार यदि हर बड़े खर्च की सूचना देनी पड़ेगी तो इससे कर्मचारियों की निजी आर्थिक स्थिति सार्वजनिक हो सकती है. उन्होंने कहा कि सरकार “कर्मचारियों को बेपर्दा करने पर उतारू” है और इससे कर्मचारियों में असंतोष बढ़ेगा.
लंबित समस्याओं का मुद्दा
कर्मचारी संगठनों ने यह भी आरोप लगाया है कि सरकार कर्मचारियों के हितों से जुड़े फैसलों पर कार्रवाई नहीं कर रही, जबकि अनुशासन से जुड़े आदेश लगातार जारी हो रहे हैं. तिवारी के अनुसार कई विभागों में नियमावलियां वर्षों से लंबित हैं. उदाहरण के तौर पर स्वास्थ्य विभाग में इलेक्ट्रिशियन, कीट संग्रहकर्ता, मलेरिया-फाइलेरिया और ईसीजी टेक्नीशियन संवर्ग की नियमावलियां लंबे समय से अटकी हुई हैं. इसी तरह खाद्य रसद विभाग में नियमावली लंबित होने के कारण पदोन्नति नहीं हो पा रही है.
लोक निर्माण विभाग और सिंचाई विभाग में मेट संवर्ग की पदोन्नति से संबंधित नियमावली 2011 से लंबित बताई जा रही है. उन्होंने यह भी कहा कि राज्य विश्वविद्यालयों के कर्मचारियों के लिए अलग सेवा नियमावली नहीं है. ऐसे मामलों में कार्रवाई के लिए सरकारी आचरण नियमावली लागू कर दी जाती है, लेकिन जब कर्मचारियों को लाभ देने की बात आती है तो सरकारी नियमों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. कर्मचारी संगठनों ने संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों के मुद्दे को भी उठाया है. उनका कहना है कि वर्ष 2001 के बाद संविदा कर्मचारियों के नियमितीकरण की कोई स्पष्ट नियमावली जारी नहीं की गई.
तिवारी का आरोप है कि आउटसोर्स कर्मचारियों के शोषण पर भी सरकार की ओर से ठोस कार्रवाई नहीं हुई है. इसके अलावा उन्होंने कहा कि सातवें वेतन आयोग की कुछ संस्तुतियों पर भी अब तक निर्णय नहीं लिया गया है. आशा कार्यकर्ताओं, आंगनवाड़ी कर्मचारियों और शिक्षा मित्रों के मानदेय बढ़ाने की घोषणाएं तो होती हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन धीमा है. कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सरकार और कर्मचारियों के बीच संवाद की कमी भी विवाद की बड़ी वजह है.
जे. एन. तिवारी का आरोप है कि मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव कार्मिक और अन्य वरिष्ठ अधिकारी कर्मचारी संगठनों के साथ नियमित वार्ता नहीं कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि बार-बार मुख्यमंत्री का ध्यान इस ओर आकर्षित करने के बावजूद समस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस पहल नहीं हुई है. तिवारी के अनुसार, “प्रदेश के करीब 12 लाख राज्य कर्मचारियों पर इस संशोधन का सीधा प्रभाव पड़ेगा. संवाद की कमी के कारण कर्मचारी पहले से ही नाराज हैं और इस तरह के आदेशों से असंतोष और बढ़ सकता है.”
पारदर्शिता बनाम भरोसे का सवाल
सरकारी कर्मचारियों के सेवा संबंधी प्रकरणों की कोर्ट में पैरवी करने वाले एडवोकेट शैलेंद्र कुमार सिंह बताते हैं, “यह विवाद दरअसल सरकारी प्रशासन में दो अलग दृष्टिकोणों को सामने लाता है. एक ओर सरकार का मानना है कि सार्वजनिक धन से वेतन पाने वाले कर्मचारियों की वित्तीय गतिविधियों में पारदर्शिता जरूरी है. इससे भ्रष्टाचार पर नियंत्रण संभव होगा और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत होगी. दूसरी ओर कर्मचारी संगठनों का तर्क है कि हर खर्च और निवेश की सूचना देने की अनिवार्यता कर्मचारियों को संदेह की नजर से देखने जैसा है.”
विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता के लिए ऐसे नियम जरूरी हो सकते हैं, लेकिन इनके क्रियान्वयन में संतुलन भी आवश्यक है ताकि कर्मचारियों को अनावश्यक प्रशासनिक बोझ न उठाना पड़े. फिलहाल यह मामला प्रशासनिक सुधार और कर्मचारी असंतोष के बीच संतुलन खोजने की चुनौती बन गया है. योगी सरकार का दावा है कि यह कदम भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए जरूरी है, जबकि कर्मचारी संगठन इसे सरकारी नियंत्रण की बढ़ती प्रवृत्ति के रूप में देख रहे हैं.