गंगा से लेकर यमुना तक, यूपी के एक्सप्रेसवे डाल रहे जेब पर डाका!

गंगा एक्सप्रेसवे पर टोल शुरू होते ही घटे वाहन, यूपी के हाईस्पीड कॉरिडोरों पर सफर अब ट्रेन और बस यात्रा से भी महंगा पड़ने लगा है

गंगा एक्सप्रेस के बनने से मेरठ से प्रयागराज तक सफर 6 घंटे में होगा पूरा. (Photo: ITG)
गंगा एक्सप्रेसवे का एक टोल बैरियर

मेरठ के कारोबारी नितिन अग्रवाल 18 मई को अपनी एसयूवी से बदायूं गए. पहले उन्होंने सोचा था कि नए गंगा एक्सप्रेसवे पर सफर तेज़ और आरामदायक रहेगा. रास्ता वाकई शानदार मिला लेकिन लौटकर उन्होंने हिसाब लगाया तो माथा पकड़ लिया. पेट्रोल के करीब 2,200 रुपए अलग खर्च हुए और टोल ने जेब से लगभग 400 रुपए और निकलवा दिए. यानी मेरठ से बदायूं की एक तरफ की यात्रा करीब 2,600 रुपए में पड़ी. 

अगर यही दूरी वे रोडवेज बस से तय करते तो किराया लगभग 500-700 रुपए के बीच आता. ट्रेन से सफर करते तो यह खर्च और कम होता. यही वजह है कि 14 मई की मध्य रात्र‍ि से गंगा एक्सप्रेसवे पर टोल वसूली शुरू होते ही वाहनों की संख्या अचानक घट गई. उद्घाटन के बाद शुरुआती दिनों में जहां प्रतिदिन 18 हजार से ज्यादा वाहन गुजर रहे थे, वहीं टोल शुरू होने के बाद पहले ही दिन यह संख्या घटकर करीब 12 हजार रह गई.

यह गिरावट केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि इस बात का संकेत है कि उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे आधारित यात्रा आम लोगों के लिए लगातार महंगी होती जा रही है.

चमकदार सड़कें, लेकिन भारी कीमत

उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों में एक्सप्रेसवे विकास मॉडल को सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना गया है. आगरा-लखनऊ, पूर्वांचल, बुंदेलखंड, गंगा और अब लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को प्रदेश की आर्थिक धुरी बताया जा रहा है. इन परियोजनाओं का दावा है कि ये यात्रा समय कम करेंगी, निवेश बढ़ाएंगी और लॉजिस्टिक्स को आसान बनाएंगी लेकिन इन हाईस्पीड सड़कों पर चलने की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है. गंगा एक्सप्रेसवे इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनकर सामने आया है. 

594 किलोमीटर लंबे गंगा एक्सप्रेसवे पर कार से पूरी यात्रा के लिए पहले 1,514 रुपए टोल तय किया गया. फिर इसे बढ़ाकर 1,800 रुपए किया गया और बाद में 1,765 रुपए पर लाया गया. यानी केवल टोल ही कई लोगों के लिए ट्रेन के एसी किराए के बराबर हो गया. अगर कोई परिवार मेरठ से प्रयागराज तक अपनी कार से जाता है, तो पेट्रोल और टोल मिलाकर कुल खर्च आसानी से 6,000 से 7,000 रुपए तक पहुंच सकता है. वहीं इसी दूरी पर ट्रेन में सेकेंड एसी का टिकट लगभग 1,200-1,800 रुपए के बीच होता है. स्लीपर में यह खर्च 500-700 रुपए तक सिमट जाता है. रोडवेज बस का किराया भी कार यात्रा की तुलना में काफी कम बैठता है.

प्रदेश के अन्य एक्सप्रेसवे की दरें भी आम यात्रियों को राहत नहीं देतीं. आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर 302 किलोमीटर के लिए कार से 675 रुपए टोल देना पड़ता है. बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे पर 296 किलोमीटर के लिए 635 रुपए और पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर 341 किलोमीटर के लिए 700 रुपए टोल है. यमुना एक्सप्रेसवे, जो देश के सबसे पुराने हाईस्पीड कॉरिडोर में गिना जाता है, वहां 165 किलोमीटर के लिए कार चालकों को 540 रुपए तक चुकाने पड़ते हैं. 

यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग आज भी पुराने राष्ट्रीय राजमार्गों को प्राथमिकता देते हैं, भले ही वहां ट्रैफिक और समय ज्यादा लगे. टैक्सी आपरेटर अभिषेक सिंह कहते हैं, “राष्ट्रीय राजमार्ग पर पड़ने वाले टोल प्लाजा के लिए 3000 रुपए का सालाना टोल टैक्स भी है जिससे 200 पर किसी भी टोल से गुजर सकते हैं लेकिन राज्य सरकार द्वारा बनाए गए एक्सप्रेसवे पर यह भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) का सालाना टोल पास उपयोग में नहीं आता. इससे एक्सप्रेसवे केवल उन्हीं के लिए उपयोगी है जिनके लि‍ए जल्दी पहुंचना जरूरी है बजाय कम कीमत में पहुंचने के.”

आखिर टोल इतना ज्यादा क्यों?

एक्सप्रेसवे परियोजनाओं की लागत इसका सबसे बड़ा कारण है. एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं में जमीन अधिग्रहण, पुल, इंटरचेंज, सर्विस रोड, सुरक्षा ढांचा और आधुनिक तकनीक पर हजारों करोड़ रुपए खर्च होते हैं. सरकार और निजी कंपनियां इन लागतों की भरपाई टोल के जरिए करना चाहती हैं. गंगा एक्सप्रेसवे को 120 किलोमीटर प्रति घंटे की गति के हिसाब से डिजाइन किया गया है. सड़क की मोटाई, सेफ्टी बैरियर, निगरानी प्रणाली और एक्सेस कंट्रोल जैसी सुविधाएं इसे सामान्य हाईवे से कहीं अधिक महंगा बनाती हैं. 

इसके निर्माण और संचालन में निजी कंपनियों की भागीदारी भी लागत बढ़ाती है, क्योंकि उन्हें निवेश पर मुनाफा भी चाहिए. यूपीडा और निजी ऑपरेटरों के बीच हुए अनुबंधों में लंबे समय तक टोल वसूली का प्रावधान है. यही मॉडल अन्य एक्सप्रेसवे पर भी लागू है. यानी सड़क जितनी आधुनिक होगी, उसकी वसूली उतनी ज्यादा होगी.

एक बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक्सप्रेसवे अब केवल उच्च आय वर्ग की यात्रा सुविधा बनते जा रहे हैं? क्योंकि एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए लंबी दूरी की कार यात्रा अब काफी महंगी हो चुकी है. उदाहरण के तौर पर लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे को ही लें. 63 किलोमीटर की दूरी के लिए कार चालकों को 275 रुपए टोल देना होगा. अगर उसी दिन वापसी करते हैं तो 415 रुपए खर्च होंगे. यानी केवल टोल ही कई लोगों के लिए रोजाना आने-जाने की क्षमता से बाहर हो सकता है. हालांकि NHAI वार्षिक पास जैसी योजनाओं का हवाला दे रहा है, जिससे नियमित यात्रियों का खर्च घटाने का दावा किया जा रहा है. लेकिन वास्तविकता यह है कि अधिकांश लोग रोजाना 100 राउंड ट्रिप नहीं करते. ऐसे में आम उपयोगकर्ता के लिए टोल का बोझ बना रहेगा.

ट्रक और माल ढुलाई पर भी असर

महंगे टोल का असर केवल निजी यात्रियों पर नहीं, बल्कि माल ढुलाई पर भी पड़ता है. भारी वाहन एक्सप्रेसवे पर हजारों रुपए टोल देते हैं. यह अतिरिक्त लागत आखिरकार सामान की कीमतों में जुड़ जाती है. बस और ट्रक के लिए आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर 2,150 रुपए तक टोल है. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे पर यह 2,240 रुपए तक पहुंचता है. भारी निर्माण मशीनरी के लिए यह रकम 3,000 रुपए से भी अधिक है. ट्रांसपोर्ट कंपनियां इन खर्चों को सीधे उपभोक्ताओं पर डालती हैं. यानी एक्सप्रेसवे केवल यात्रा नहीं, बल्कि रोजमर्रा के सामान को भी महंगा बना रहे हैं.

महंगे होने के बावजूद एक्सप्रेसवे का आकर्षण बना हुआ है. इसकी सबसे बड़ी वजह समय की बचत है. मेरठ से प्रयागराज जैसी लंबी यात्रा सामान्य हाईवे पर 12-14 घंटे ले सकती है, जबकि एक्सप्रेसवे इसे काफी कम कर देते हैं. दूसरी वजह सुरक्षा और आराम है. सीमित प्रवेश वाले इन मार्गों पर गांव, बाजार और अव्यवस्थित ट्रैफिक नहीं होता. इससे दुर्घटना की आशंका कम होती है और लंबी दूरी की ड्राइव आसान बनती है. व्यापारिक यात्राओं और लॉजिस्टिक्स कंपनियों के लिए समय की कीमत कई बार टोल से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. इसलिए वे अतिरिक्त खर्च के बावजूद एक्सप्रेसवे का उपयोग करते हैं.

लेकिन क्या मॉडल टिकाऊ है?

गंगा एक्सप्रेसवे पर वाहनों की संख्या में आई शुरुआती गिरावट एक संकेत मानी जा रही है. अगर टोल बहुत ज्यादा रहेगा, तो लोग पुराने मार्गों पर लौट सकते हैं. इससे एक्सप्रेसवे की अनुमानित ट्रैफिक और राजस्व गणना प्रभावित होगी. विशेषज्ञ मानते हैं कि एक्सप्रेसवे तभी सफल माने जाएंगे जब वे केवल तेज़ नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी व्यवहारिक हों. अगर कार यात्रा का खर्च ट्रेन के एसी टिकट से भी ज्यादा हो जाए, तो बड़ी आबादी उसे नियमित विकल्प नहीं बनाएगी. 

सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह बुनियादी ढांचे में निवेश की भरपाई भी करे और जनता पर अत्यधिक आर्थिक बोझ भी न डाले. फिलहाल उत्तर प्रदेश का एक्सप्रेसवे मॉडल गति और भव्यता के मामले में आगे दिख रहा है, लेकिन अफोर्डेबिलिटी यानी वहनीयता के सवाल पर बहस तेज होती जा रही है. 

उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे केवल सड़क परियोजनाएं नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक विकास मॉडल का प्रतीक बन चुके हैं. लेकिन जैसे-जैसे टोल दरें बढ़ रही हैं, यह सवाल भी गहराता जा रहा है कि इस विकास की असली कीमत कौन चुका रहा है. सरकार इसे आधुनिक बुनियादी ढांचे की जरूरत बताती है. कंपनियां इसे निवेश की रिकवरी कहती हैं. लेकिन आम यात्री के लिए यह सवाल सीधा है, क्या तेज़ सड़कें उसकी जेब की रफ्तार से भी मेल खाती हैं?

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