यूपी में दिव्यांगों को मिलने लगा रोजगार, लेकिन कई पुरानी चुनौतियां अब भी कायम!
यूपी कौशल विकास मिशन के दिव्यांगजन रोजगार अभियान ने हजारों दिव्यांगों को नौकरी या स्वरोजगार दिया, लेकिन उनकी कई चुनौतियां जस की तस हैं

लंबे अरसे तक दिव्यांगजनों को लेकर सोच दो शब्दों में सिमटी रही है- पेंशन और अनुदान. ये जरूरी सहारे हैं, लेकिन बराबरी की लड़ाई नहीं लड़ते. सहारा देते हैं, सम्मान नहीं. इसी मानसिकता को चुनौती देने के इरादे से उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन (UPSDM) ने एक अलग राह चुनी- ‘दिव्यांगजन रोजगार अभियान’.
इस अभियान ने दिव्यांगों के प्रति समाज और प्रशासन के नजरिए को ‘सहानुभूति’ से बदलकर ‘आत्मनिर्भरता’ पर केंद्रित कर दिया है. वर्ष 2025 और 2026 में चलाए गए इस कार्यक्रम ने साबित किया है कि अगर प्रशासनिक इनोवेशन का सही उपयोग हो, तो दिव्यांगजनों के लिए रोजगार के बंद दरवाजे खोले जा सकते हैं.
परिवार का सहारा बनीं बलरामपुर की सोनम
प्रशासनिक आंकड़ों के पीछे छिपी असल कामयाबी बलरामपुर की सोनम जैसी बेटियों के चेहरों पर दिखती है. 20 साल की सोनम न बोल सकती हैं, न सुन सकती हैं. एक साल की उम्र में जब उनकी खामोशी का सच सामने आया, तो पूरे परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई. जिस उम्र में बच्चे चहकते हैं, सोनम एक कोने में सिमट जाती थीं. स्कूल की दहलीज उनके लिए पराई थी और दुनिया की नजर में वे महज एक ‘बोझ’ थीं; मां की रातें यह सोचकर कटती थीं कि उनके बाद इस बेजुबान का सहारा कौन बनेगा.
सोनम की मां बताती हैं कि एक दिन जब उन्होंने उसे कैंची से कपड़े काटते और मशीन पर सिलाई करते देखा, तो समझ आया कि उसकी खामोशी में भी एक हुनर छिपा है. किस्मत ने करवट तब ली, जब छोटी बेटी के स्कूल से उन्हें ‘दिव्यांगजन रोजगार अभियान’ की जानकारी मिली. उम्मीद की आखिरी किरण लेकर वे सोनम को वहां ले गईं, और यहीं से एक नया अध्याय शुरू हुआ.
रोजगार अभियान से जुड़े विशेषज्ञों ने न केवल सोनम के हुनर को पहचाना, बल्कि उन्हें लखनऊ में तीन महीने की पेशेवर ट्रेनिंग भी दी. ट्रेनिंग पूरी होते ही, जिस बेटी को कभी ‘बोझ’ समझा जाता था, उसे 10,000 रुपए महीने की नौकरी मिल गई. आज सोनम अपने परिवार का सहारा हैं, उनकी कमाई से घर का चूल्हा जलता है. सोनम की मां कहती हैं, “हम गरीब लोग तो बच्चों को ज्यादा पढ़ाने तक का नहीं सोच पाते थे, ट्रेनिंग और नौकरी तो बहुत दूर की बात है. सोनम के अपने पैरों पर खड़ा होने से हमको नया जीवन मिला है.”
जब डिग्रियां बोझ नहीं, सम्मान का आधार बनीं
फतेहपुर के रंजीम का संघर्ष उन शिक्षित दिव्यांगों की कहानी है, जो योग्यता के बावजूद समाज की हीन दृष्टि का शिकार होते रहे. शरीर से दिव्यांग, घर की आर्थिक तंगी और ऊपर से समाज का नजरिया- हर कदम पर यह एहसास कि वह ‘कमजोर’ हैं. रंजीम ने हार नहीं मानी. पिता ने उन्हें पढ़ाने के लिए खेत बेच दिया, और उन्होंने भी मेहनत कर MA, TET और DElEd जैसी डिग्रियां हासिल कीं.
लेकिन कड़वा सच तब सामने आया, जब इतनी पढ़ाई के बाद भी उन्हें केवल 3-4 हजार रुपए की नौकरी मिली. रंजीम बताते हैं, “जब प्राइवेट स्कूल में 3 हजार की नौकरी मिली, तो रूह कांप गई. क्या इसी दिन के लिए मेरे किसान पिता ने खेत बेचा था?” निराशा इतनी बढ़ी कि उन्होंने घर बैठना ही बेहतर समझा. लेकिन जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तो उम्मीद का एक दरवाजा जरूर खुलता है.
रंजीम के जीवन में यह दरवाजा कौशल विकास मिशन के ‘दिव्यांगजन रोजगार अभियान’ के रूप में खुला. इस अभियान ने उनकी डिग्रियों को वह सम्मान दिया, जिसके वे हकदार थे. आज वह 12,000 रुपए मासिक वेतन पर शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं. इतना ही नहीं, उनके इस संघर्ष ने उनकी पत्नी के लिए भी रास्ता खोला, और आज दोनों पति-पत्नी शिक्षक बनकर समाज को नई दिशा दे रहे हैं.
मिशन मोड में शुरू हुआ अभियान
कौशल विकास मिशन के मिशन निदेशक पुलकित खरे बताते हैं कि प्रशिक्षित युवाओं को सीधे नौकरी से जोड़ना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रही है. इसी कमी को पहचानते हुए ‘दिव्यांगजन रोजगार अभियान’ को मिशन मोड में शुरू किया गया. इसका उद्देश्य स्पष्ट था- हर प्रशिक्षित दिव्यांग युवक-युवती को या तो नौकरी मिले या स्वरोजगार का अवसर.
उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन ने इस अभियान को दो चरणों में चलाया. पहला चरण 6 से 13 अगस्त 2025 तक चला, जिसमें 720 दिव्यांगजनों को रोजगार मिला. दूसरा चरण 6 से 18 फरवरी तक चला, जिसमें मात्र 13 दिनों में 75 जिलों के 1162 दिव्यांगजन रोजगार और स्वरोजगार से जुड़े. दोनों चरणों को मिलाकर अब तक 1,882 से अधिक दिव्यांगजनों को रोजगार या उद्यमिता से जोड़ा जा चुका है. लाभार्थियों को टेलीकॉम, रिटेल, फाइनेंस और मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में ₹9,000 से ₹21,000 तक की सैलरी पर नियुक्त किया गया है.
वहीं, स्वरोजगार के तहत सिलाई यूनिट और इलेक्ट्रिकल सेवाओं जैसे छोटे उद्यम स्थापित करने में मदद दी गई है. यह अभियान भावनाओं पर नहीं, बल्कि ठोस रणनीति और परिणामों पर आधारित है. वर्ष 2019 से 2025 के बीच जहां रोजगार मेलों में केवल 1,142 (0.06 फीसदी) दिव्यांगजनों ने पंजीकरण कराया था, वहीं 2025-26 में यह संख्या बढ़कर 1,877 (1.74 फीसदी) हो गई.
पिछले छह वर्षों में जहां केवल 296 दिव्यांगजनों को नौकरी मिली थी, वहीं इस अभियान के तहत एक साल में ही 2,118 युवाओं को रोजगार मिला. सबसे बड़ा बदलाव यह है कि कुल नौकरियों में दिव्यांगजनों की हिस्सेदारी 0.08 फीसदी से बढ़कर 12.3 फीसदी हो गई है. फतेहपुर, अमरोहा, फर्रुखाबाद, वाराणसी और महाराजगंज जैसे जिलों का प्रदर्शन इसमें सबसे बेहतर रहा है.
स्वरोजगार से आत्मनिर्भरता की मजबूत राह
इस अभियान का एक मजबूत स्तंभ स्वरोजगार भी है. महाराजगंज के विमलेश इसका जीवंत उदाहरण हैं. वह बताते हैं कि उनके पिता की छोटी दुकान ही घर की धड़कन थी. बचपन में बैसाखियों के सहारे काउंटर पर बैठते हुए उनके मन में एक ही सपना था- इस दुकान को बड़ा बनाना. लेकिन अपनी शारीरिक स्थिति देखकर वह सपना अक्सर टूट जाता.
समय के साथ जिम्मेदारी उनके कंधों पर आई. उन्होंने हिम्मत कर दुकान में मोबाइल रिपेयरिंग और सेल का काम शुरू किया, लेकिन पूंजी की कमी सबसे बड़ी बाधा बनी रही. तभी UPSDM के ‘दिव्यांगजन रोजगार अभियान’ के तहत ‘मुख्यमंत्री युवा उद्यमी योजना’ से उन्हें 5 लाख रुपए का लोन मिला. विमलेश कहते हैं, “यह सिर्फ पैसा नहीं था, यह मेरी मेहनत पर भरोसा था.” आज उनका व्यवसाय न केवल चल रहा है, बल्कि बढ़ भी रहा है.
काशी की दिव्या की कहानी भी इसी बदलाव को दिखाती है. बनारस की गलियों में पली-बढ़ी दिव्या हमेशा कुछ कर दिखाना चाहती थीं, लेकिन समाज की नजरें उन्हें उनकी काबिलियत से ज्यादा उनकी ‘विकलांगता’ से पहचानती थीं. दिव्या बताती हैं, “लोगों की सहानुभूति मुझे तोड़ देती थी. लगता था कि शायद मैं सच में कुछ नहीं कर सकती.” लेकिन कौशल विकास मिशन के इस अभियान ने उनके जीवन की दिशा बदल दी. उन्हें कौशल के साथ आत्मविश्वास भी मिला. आज वह आत्मनिर्भर हैं और अपने सपनों को जी रही हैं.
अभी भी कई चुनौतियां हैं
मिशन निदेशक पुलकित खरे कहते हैं कि यह सिर्फ प्लेसमेंट ड्राइव नहीं, बल्कि दिव्यांगजनों को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास है. पुलकित खरे के मुताबिक “जब एक दिव्यांग व्यक्ति को नौकरी मिलती है, तो यह सिर्फ उसकी नहीं, पूरे परिवार की जिंदगी बदल देता है.” भारत में लगभग 2.6 करोड़ दिव्यांगजन हैं. ऐसे में उत्तर प्रदेश का यह मॉडल पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘दिव्यांगजन रोजगार अभियान’ ने निश्चित रूप से नई दिशा दी है, लेकिन इसकी स्थाई सफलता के लिए कई चुनौतियों पर गंभीरता से काम करना होगा. श्रम और कौशल क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ रजनीश शर्मा बताते हैं, “सबसे बड़ी समस्या “स्किल-मैचिंग” की है. कई बार प्रशिक्षण तो दिया जाता है, लेकिन वह बाजार या सरकारी विभागों की वास्तविक जरूरतों से पूरी तरह मेल नहीं खाता, जिससे दीर्घकालिक रोजगार टिक नहीं पाता.”
सामाजिक क्षेत्र के विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि ग्रामीण इलाकों में अब भी जागरूकता की कमी है. कई परिवार दिव्यांग बच्चों को प्रशिक्षण केंद्रों तक भेजने में हिचकिचाते हैं, जिससे संभावित लाभार्थी छूट जाते हैं. इसके अलावा, कार्यस्थलों की भौतिक सुलभता (accessibility) भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. सरकारी दफ्तरों और संस्थानों में अब भी कई जगह दिव्यांग-अनुकूल ढांचा पूरी तरह विकसित नहीं हो पाया है. रजनीश शर्मा निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी को भी अहम बाधा मानते हैं.
शर्मा का कहना है, “जब तक निजी कंपनियों को इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक रोजगार के अवसर सीमित रहेंगे. साथ ही, नियुक्ति के बाद “रिटेंशन” यानी नौकरी में टिके रहने की दर पर भी निगरानी जरूरी है, ताकि यह पहल केवल आंकड़ों तक सीमित न रह जाए, बल्कि दीर्घकालिक बदलाव का आधार बन सके.”