मामूली लड़ाई-झगड़े से हत्याओं तक! यूपी के कैंपस क्यों हो रहे लहूलुहान?
वाराणसी के एक कॉलेज में हुआ हत्याकांड यूपी के कॉलेजों में बढ़ती हिंसा, छात्र गुटबाजी, कमजोर सुरक्षा और प्रशासनिक नाकामी की नई कड़ी भर है

वाराणसी के उदय प्रताप ऑटोनॉमस कॉलेज या यूपी कालेज में 21 मार्च की दोपहर जो हुआ, उसने उत्तर प्रदेश के शैक्षणिक परिसरों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. बीएससी मैथ के चौथे सेमेस्टर के छात्र सूर्य प्रताप सिंह को कॉलेज के भीतर ही दिनदहाड़े गोली मार दी गई. आरोप एक सीनियर छात्र पर है.
यहां मामूली कहासुनी से शुरू हुआ विवाद कुछ ही घंटों में हत्या और फिर सामूहिक हिंसा में बदल गया. घटना के बाद न सिर्फ कैंपस में तोड़फोड़ हुई, बल्कि आसपास का इलाका भी तनाव और अफरा-तफरी की चपेट में आ गया. यह घटना कोई अपवाद नहीं है, बल्कि एक खतरनाक सिलसिले की ताज़ा कड़ी है.
कैंपस में बढ़ती हिंसा : एक पैटर्न
पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश के कई कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में इसी तरह की आपराधिक घटनाएं सामने आई हैं, जो यह संकेत देती हैं कि कैंपस धीरे-धीरे हिंसा, गुटबाजी और आपराधिक प्रभाव के केंद्र बनते जा रहे हैं. अगर हालिया घटनाओं पर नजर डालें, तो तस्वीर और साफ हो जाती है. 31 अगस्त 2023 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ से जुड़े दो गुटों के बीच फायरिंग हुई थी, जिसमें एक छात्र गंभीर रूप से घायल हो गया था. यह झड़प मामूली विवाद से शुरू हुई थी, लेकिन देखते ही देखते हथियार निकल आए और गोलियां चलने लगीं.
इससे पहले 12 फरवरी 2023 को लखनऊ विश्वविद्यालय में छात्र संगठनों के बीच टकराव के दौरान खुलेआम फायरिंग और मारपीट हुई. इस घटना में कई छात्र घायल हुए और परिसर में कई घंटे तक तनाव बना रहा. 5 दिसंबर 2022 को चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में परीक्षा केंद्र के बाहर छात्रों के दो गुटों में हिंसक झड़प हुई, जिसमें चाकू और डंडों का इस्तेमाल किया गया। एक छात्र को गंभीर चोटें आईं. 24 सितंबर 2022 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पास बिरला हॉस्टल क्षेत्र में छात्र गुटों के बीच गोलीबारी हुई थी. इस घटना में भी पुरानी रंजिश और दबंगई का एंगल सामने आया था. 16 जनवरी 2021 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पास छात्र नेता की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, जिससे पूरे शहर में तनाव फैल गया था. इन घटनाओं का पैटर्न लगभग एक जैसा है- छोटा विवाद, पुरानी दुश्मनी, गुटबाजी, और फिर अचानक हिंसा का विस्फोट.
निजी रंजिश से गैंग कल्चर तक
विशेषज्ञ मानते हैं कि कैंपस में बढ़ती हिंसा के पीछे कई स्तरों पर कारण काम कर रहे हैं. सबसे बड़ा कारण है निजी रंजिश और गुटीय टकराव. वाराणसी की घटना में भी शुरुआती वजह कपड़ों को लेकर कहासुनी बताई जा रही है, लेकिन छात्रों का कहना है कि दोनों के बीच पहले से तनाव था. यही बात अन्य मामलों में भी देखने को मिलती है, जहां छोटे-छोटे विवाद पुराने झगड़ों से जुड़कर हिंसक रूप ले लेते हैं. दूसरा बड़ा कारण है छात्र राजनीति का आपराधिकरण. एक समय में छात्र राजनीति को नेतृत्व और लोकतांत्रिक प्रशिक्षण का माध्यम माना जाता था, लेकिन अब कई जगह यह शक्ति प्रदर्शन और दबदबे का मंच बन चुकी है.
स्थानीय स्तर पर सक्रिय आपराधिक तत्वों का प्रभाव भी कई कैंपस में देखा जा रहा है. सामाजिक विश्लेषक कहते हैं कि छात्र संगठनों को मिलने वाला बाहरी समर्थन और संरक्षण कई बार कानून-व्यवस्था को कमजोर कर देता है. तीसरा कारण है सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी. सवाल उठता है कि आखिर हथियार कैंपस के अंदर कैसे पहुंच जाते हैं. अधिकांश कॉलेजों में न तो सख्त एंट्री चेकिंग होती है और न ही पर्याप्त संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगे होते हैं.
सुरक्षा गार्ड अक्सर औपचारिक भूमिका में होते हैं और उनके पास किसी गंभीर स्थिति से निपटने का प्रशिक्षण भी नहीं होता. वाराणसी में बीएचयू के एक पूर्व कुलपति का कहना है, “हमारे यहां सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी जाती. जब तक कोई बड़ी घटना नहीं होती, तब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया जाता. और जब घटना हो जाती है, तो कार्रवाई सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाती है.”
सोशल मीडिया से और बढ़ी समस्या
पुलिस की भूमिका भी घटना के बाद ज्यादा सक्रिय होती है, लेकिन रोकथाम के स्तर पर सीमाएं साफ दिखती हैं. वाराणसी के यूपी कालेज में छात्र की हत्या के बाद पुलिस कमिश्नर मोहित अग्रवाल जैसे अधिकारी घटनास्थल का दौरा कर सख्त कार्रवाई का भरोसा देते हैं, लेकिन यह सवाल बना रहता है कि ऐसी घटनाओं को पहले क्यों नहीं रोका जा सका. एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी बताते हैं, “कैंपस पूरी तरह खुला क्षेत्र होता है. हर छात्र की निगरानी संभव नहीं है. इसके लिए कॉलेज प्रशासन, छात्र और पुलिस- तीनों को मिलकर काम करना होगा.”
सोशल मीडिया ने भी इस समस्या को और जटिल बना दिया है. अब विवाद सिर्फ आमने-सामने की बहस तक सीमित नहीं रहते, बल्कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी गुटबाजी और उकसावे का माहौल बनता है. कई मामलों में व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर हुई बहसें हिंसक टकराव में बदल जाती हैं. वाराणसी की घटना में भी वीडियो सामने आने के बाद गुस्सा और भड़क गया, जिससे कैंपस के बाहर तक हिंसा फैल गई.
संस्थाएं क्यों असफल हो रही हैं?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि संस्थाएं इस स्थिति को संभालने में असफल क्यों हो रही हैं. इसके पीछे कई कारण हैं, प्रशासनिक निष्क्रियता, राजनीतिक दबाव, संसाधनों की कमी और जवाबदेही का अभाव. लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रॉक्टर रहे एक प्रोफेसर बताते हैं “छोटे विवादों को समय रहते सुलझाने का कोई प्रभावी तंत्र नहीं है. काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं भी लगभग न के बराबर हैं, जिससे छात्रों में बढ़ता तनाव और आक्रोश अनियंत्रित हो जाता है.”
शिक्षा समाजशास्त्रियों का मानना है कि कैंपस में संवाद और सहिष्णुता की संस्कृति कमजोर हो रही है. “आज के छात्र तेज प्रतिस्पर्धा, सामाजिक दबाव और पहचान की राजनीति के बीच फंसे हैं. अगर उन्हें सही दिशा और मंच नहीं मिलता, तो यह ऊर्जा हिंसा में बदल जाती है,” एक विशेषज्ञ कहते हैं. सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम जरूर उठाए हैं. कॉलेजों में सीसीटीवी लगाने, एंटी-रैगिंग सेल को सक्रिय करने और पुलिस-प्रशासन के समन्वय को मजबूत करने की कोशिश की गई है. कुछ संवेदनशील संस्थानों में स्थायी पुलिस चौकियां भी बनाई गई हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर इन उपायों का असर सीमित ही दिखता है.
कई कॉलेजों में सीसीटीवी काम नहीं करते, एंटी-रैगिंग सेल सिर्फ नाम के लिए हैं और सुरक्षा व्यवस्था अभी भी कमजोर है. विशेषज्ञों का मानना है कि समाधान सिर्फ कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं हो सकता. इसके लिए व्यापक सुधार की जरूरत है, कैंपस में सख्त एंट्री सिस्टम, डिजिटल आईडी, छात्र-प्रशासन संवाद, विवाद समाधान तंत्र और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार. पूर्वांचल के एक डिग्री कालेज के वरिष्ठ शिक्षक मनोज यादव कहते हैं, “सबसे अहम है कैंपस के माहौल को बदलना. जब तक शिक्षा संस्थानों में अनुशासन, संवाद और जिम्मेदारी की संस्कृति विकसित नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाएं रुकना मुश्किल है.”