यूपी बोर्ड कॉपियों की जांच में ‘जीरो टॉलरेंस’ से शिक्षक क्यों हैं परेशान?
कॉपियों की जांच में सख्त नियम, गलती पर भारी कटौती और बैन का प्रावधान; डिजिटलीकरण व दोहरी जांच के बीच सवाल, क्या बढ़ेगी पारदर्शिता या बढ़ेगा शिक्षकों पर दबाव?

उत्तर प्रदेश में बोर्ड परीक्षाओं के बाद शुरू होने वाली कॉपी जांच प्रक्रिया इस बार सिर्फ एक नियमित प्रशासनिक काम नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गई है. 18 मार्च से शुरू हो रहे उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन के साथ उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद ने ऐसे सख्त नियम लागू किए हैं, जो साफ तौर पर 'जीरो टॉलरेंस' नीति की ओर इशारा करते हैं.
लगभग 3 करोड़ कॉपियों की जांच और 1.5 लाख शिक्षकों की तैनाती के बीच यह पूरी प्रक्रिया अब पहले से कहीं ज्यादा निगरानी, जवाबदेही और तकनीकी दखल के दायरे में आ गई है. बोर्ड का दावा है कि इन बदलावों से परीक्षा जांच में कम गलतियां होंगी, लेकिन इसके साथ ही यह बहस भी तेज हो गई है कि क्या इतनी सख्ती से गुणवत्ता सुधरेगी या शिक्षकों पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा.
सख्ती का नया पैमाना
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में यूपी बोर्ड के मूल्यांकन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं. बड़ी संख्या में छात्रों ने रीचेकिंग के लिए आवेदन किए और उनमें से कई मामलों में अंकों में अंतर सामने आया. कहीं अंक जोड़ने में गलती हुई तो कहीं कॉपी में दिए गए नंबर सही तरीके से दर्ज नहीं किए गए. इससे न सिर्फ छात्रों का भरोसा प्रभावित हुआ बल्कि उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ा. यही वजह रही कि इस बार यूपी बोर्ड के सचिव भगवती सिंह की निगरानी में बोर्ड को अपनी मूल्यांकन प्रणाली में बड़े बदलाव करने पड़े. पिछले वर्ष ही 4,204 परीक्षकों को अनियमितताओं के चलते चेतावनी दी गई थी, जो इस समस्या की गंभीरता को दिखाता है.
इन्हीं परिस्थितियों के बीच इस बार सबसे बड़ा बदलाव दंडात्मक प्रावधानों को लेकर किया गया है. अब मूल्यांकन में गलती की कीमत सीधे परीक्षक को चुकानी पड़ेगी. बोर्ड ने त्रुटि प्रतिशत के आधार पर मानदेय कटौती की स्पष्ट व्यवस्था लागू की है. अगर किसी परीक्षक की जांची गई कॉपियों में 2 प्रतिशत तक की गलती पाई जाती है, तो उसके मानदेय का 85 प्रतिशत तक काटा जा सकता है और उसे कम से कम तीन वर्षों के लिए कॉपी जांच कार्य से प्रतिबंधित किया जा सकता है. 1 प्रतिशत त्रुटि पर आधा भुगतान काटने और 0.5 प्रतिशत पर 25 प्रतिशत कटौती का प्रावधान भी लागू किया गया है.
इस पूरी व्यवस्था को लेकर शिक्षकों के बीच मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. कुछ शिक्षक मानते हैं कि इससे लापरवाही पर रोक लगेगी और मूल्यांकन की गुणवत्ता बेहतर होगी. लेकिन कई शिक्षकों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में कॉपियों के बीच काम करते समय छोटी-सी गलती पर भारी आर्थिक दंड और प्रतिबंध का प्रावधान मानसिक दबाव को बढ़ा सकता है. उनका तर्क है कि मूल्यांकन पहले ही सीमित समय में किया जाने वाला कार्य है, जिसमें एक दिन में सैकड़ों कॉपियां जांचनी होती हैं. ऐसे में मानवीय त्रुटि की संभावना को पूरी तरह खत्म करना व्यावहारिक नहीं है.
मूल्यांकन की आनलाइन व्यवस्था
इसके साथ ही, जवाबदेही को और सख्त करने के लिए दोहरी जांच प्रणाली को मजबूत किया गया है. छात्रों को पहले की तरह पुनर्मूल्यांकन का अधिकार मिलेगा, लेकिन इसके अलावा विषय विशेषज्ञों द्वारा रैंडम रीचेकिंग भी की जाएगी. अगर किसी कॉपी में गलती पाई जाती है तो संबंधित परीक्षक को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराया जाएगा. ऐसे मामलों में उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के तहत कार्रवाई भी संभव है, जिसमें वेतन वृद्धि रोकने और पदोन्नति पर रोक जैसे कदम शामिल हो सकते हैं. यानी अब यह केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि अनुशासनात्मक अपराध की श्रेणी में भी आ सकती है.
मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने के लिए तकनीक का सहारा भी इस बार ज्यादा बड़े पैमाने पर लिया जा रहा है. प्रयागराज, मेरठ, बरेली, वाराणसी और गोरखपुर में पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर अंकों की ऑनलाइन एंट्री शुरू की गई है. इस व्यवस्था के तहत अब कॉपी जांचने के साथ-साथ अंक सीधे बोर्ड के पोर्टल पर अपलोड किए जाएंगे. इसके लिए कंप्यूटर ऑपरेटरों की तैनाती की जा रही है और पूरी प्रक्रिया की निगरानी केंद्र के उप-नियंत्रक यानी प्रधानाचार्य करेंगे.
हालांकि इस डिजिटल पहल को लेकर जमीनी स्तर पर कुछ चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं. कई मूल्यांकन केंद्रों पर तकनीकी संसाधनों की कमी, इंटरनेट कनेक्टिविटी की समस्या और शिक्षकों की डिजिटल दक्षता जैसे मुद्दे इस प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं. कॉपियों के मूल्यांकन से जुड़े रहे लखनऊ के एक शिक्षक के अनुसार यूपी बोर्ड ने ओवरराइटिंग या कटिंग वाली प्रविष्टियों को पूरी तरह अस्वीकार करने का निर्देश दिया है. कंप्यूटर सिस्टम ऐसी एंट्री को रिजेक्ट कर देगा, जिससे किसी छात्र का परिणाम अधूरा भी रह सकता है. ऐसे में शिक्षकों को अब कॉपी जांच के साथ-साथ अंक दर्ज करने में भी अत्यधिक सावधानी बरतनी होगी.
विषय विशेषज्ञ की अनिवार्यता
एक और महत्वपूर्ण बदलाव विषय विशेषज्ञता को लेकर किया गया है. बोर्ड ने निर्देश दिया है कि अंग्रेजी माध्यम की कॉपियों का मूल्यांकन केवल अंग्रेजी विषय के योग्य शिक्षक ही करेंगे. इसके लिए कॉपियों के बंडल अलग तैयार किए गए हैं. यह कदम इस लिहाज से अहम है कि पहले कई बार भाषा की समझ के अभाव में मूल्यांकन की गुणवत्ता प्रभावित होती थी. अब इस व्यवस्था से उम्मीद की जा रही है कि उत्तरों का आकलन अधिक सटीक तरीके से हो सकेगा. सुरक्षा और गोपनीयता के लिहाज से भी इस बार निगरानी और कड़ी की गई है. सभी मूल्यांकन केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरों की निगरानी होगी, परीक्षकों को मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बाहर रखने होंगे और केंद्रों में बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा. कॉपियों की पहचान छिपाने के लिए कोडिंग सिस्टम पहले की तरह लागू रहेगा, जिससे परीक्षक को छात्र की पहचान का पता नहीं चलता. इसके अलावा मूल्यांकन शुरू होने से पहले सभी परीक्षकों को मार्किंग स्कीम और प्रक्रिया को लेकर प्रशिक्षण भी दिया गया है, ताकि वे निर्धारित मानकों के अनुसार ही कॉपियों की जांच कर सकें.
“इम्प्रूवमेंट एग्जाम” का विकल्प
इन सख्त प्रावधानों के बीच एक संतुलन बनाने की कोशिश भी दिखाई देती है. बोर्ड ने छात्रों को राहत देते हुए इंटरमीडिएट स्तर पर पहली बार एक विषय में सुधार परीक्षा यानी “इम्प्रूवमेंट एग्जाम” का विकल्प देने का फैसला किया है. इससे लगभग 25.76 लाख छात्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है. अब अगर कोई छात्र किसी एक विषय में अपने अंकों से संतुष्ट नहीं है, तो उसे सभी विषयों की परीक्षा दोबारा देने की जरूरत नहीं होगी. वह केवल उसी विषय में दोबारा परीक्षा देकर अपने अंक सुधार सकता है. UP Board के सचिव भगवती सिंह कहते हैं, "राज्य सरकार को एक प्रस्ताव भेजा गया है जिसमें मौजूदा शैक्षणिक सत्र से इंटरमीडिएट स्तर पर पांच विषयों में से किसी एक में सुधार परीक्षा का विकल्प शुरू करने की बात कही गई है." अधिकारियों के मुताबिक इसके लिए सैद्धांतिक मंजूरी भी मिल गई है.
अब 18 मार्च से शुरू होकर 1 अप्रैल तक चलने वाली यह प्रक्रिया ही तय करेगी कि “जीरो टॉलरेंस” का यह मॉडल कितना कारगर साबित होता है. फिलहाल इतना तय है कि इस बार कॉपी जांच की प्रक्रिया सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में भरोसा बहाल करने की एक गंभीर कोशिश बन चुकी है.