गणित में फिर मात खा गए यूपी के स्टूडेंट; आखिर दिक्कत कहां है?
यूपी बोर्ड 2026 में गणित सबसे कठिन विषय बनकर उभरा. शिक्षकों की कमी, कमजोर बेस और घटती रुचि ने लाखों छात्रों के नतीजों को प्रभावित किया

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (UP Board) की 2026 की परीक्षाओं के 23 अप्रैल को घोषित नतीजों ने एक बार फिर उस सच्चाई को सामने ला दिया है, जिसे शिक्षक और छात्र लंबे समय से महसूस करते रहे हैं : गणित अब भी सबसे बड़ा ‘डर’ बना हुआ है.
हाईस्कूल और इंटरमीडिएट, दोनों स्तरों पर सबसे ज्यादा छात्र इसी विषय में फेल हुए. यह सिर्फ एक विषय में कमज़ोरी का मामला नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की कई परतों को उजागर करता है.
23 अप्रैल को घोषित नतीजों में विषयवार अंकों की जांच से पता चलता है कि इस साल कुल 4,49,932 परीक्षार्थी- जिनमें कक्षा 10 के 3,64,588 छात्र और कक्षा 12 के 85,344 छात्र-खास तौर पर गणित में फेल हुए हैं. इस तरह कक्षा 10 और 12 मिलाकर कुल 4.49 लाख से अधिक छात्र गणित में फेल हुए.
हाईस्कूल में एनरोल्ड 27,61,972 उम्मीदवारों में से इस बार 90.42 फीसदी पास हुए. आंकड़ों से पता चलता है कि कक्षा 10 में गणित चुनने वाले 19,84,265 छात्रों में से 81.29 फीसदी पास हुए, जबकि करीब 19 फीसदी फेल हो गए. विज्ञान विषय में, एनरोल्ड 27,58,848 उम्मीदवारों में से करीब 84 फीसदी पास हुए.
इंटरमीडिएट में भी गणित के नतीजे इसी तरह निराशाजनक रहे. जहां एनरोल्ड छात्रों (25,75,460) का कुल पास प्रतिशत 80.38 फीसदी रहा, वहीं गणित विषय चुनने वाले 3,98,628 छात्रों में से केवल 77.69 फीसदी ही पास हो पाए. यानी हाईस्कूल में जहां कुल पास प्रतिशत 90.42 फीसदी रहा, वहीं गणित में पास प्रतिशत गिरकर 81.29 फीसदी पर आ गया. इंटरमीडिएट में भी यही तस्वीर दिखी, जहां कुल पास प्रतिशत 80.38 फीसदी रहा लेकिन गणित में सिर्फ 77.69 फीसदी छात्र ही पास हो सके. यह अंतर मामूली नहीं है, बल्कि यह बताता है कि गणित छात्रों के लिए एक व्यवस्थित चुनौती बन चुका है.
इस चुनौती की जड़ें समझने के लिए सिर्फ रिजल्ट देखना पर्याप्त नहीं है. पिछले चार वर्षों के ट्रेंड पर नजर डालें तो तस्वीर और स्पष्ट हो जाती है. इंटरमीडिएट में गणित चुनने वाले छात्रों की संख्या लगातार घट रही है. 2023 में जहां करीब 4.99 लाख छात्रों ने गणित चुना था, वहीं 2026 में यह संख्या घटकर 3.98 लाख रह गई. यानी करीब एक लाख छात्रों ने इस विषय से दूरी बना ली है. यह गिरावट संकेत देती है कि छात्र पहले ही गणित को जोखिम भरा विषय मानकर उससे बचने की रणनीति अपना रहे हैं.
शिक्षा विशेषज्ञ इसे सिर्फ ‘डर’ नहीं, बल्कि सिस्टम की खामी मानते हैं. लखनऊ के एक सरकारी इंटर कॉलेज में कार्यरत गणित शिक्षक कहते हैं, “गणित को समझने के लिए लगातार अभ्यास और मजबूत बेस की जरूरत होती है. लेकिन हमारे यहां प्राथमिक और जूनियर स्तर पर ही बेस कमजोर रह जाता है. जब बच्चा 9वीं या 10वीं में पहुंचता है, तब तक उसके कॉन्सेप्ट साफ नहीं होते और वह सीधे जटिल सवालों से जूझने लगता है.” यही बात केंद्रीय विद्यालय संगठन की पूर्व असिस्टेंट कमिश्नर शालिनी दीक्षित भी रेखांकित करती हैं. उनके अनुसार, “गणित में गिरती रुचि का बड़ा कारण यह है कि छात्र इसे करियर के लिहाज से सीमित विकल्पों वाला विषय मानने लगे हैं, जबकि बायोलॉजी उन्हें ज्यादा विविध और व्यावहारिक अवसर देती है.” यही वजह है कि 2026 में 12.16 लाख छात्रों ने बायोलॉजी चुनी, जो गणित के मुकाबले तीन गुना से भी अधिक है.
लेकिन सवाल सिर्फ रुचि का नहीं है. असल समस्या शिक्षकों की भारी कमी और गुणवत्ता से भी जुड़ी है. माध्यमिक स्तर के कई सरकारी स्कूलों में गणित के पद या तो खाली हैं या फिर एक ही शिक्षक कई कक्षाओं को संभाल रहा है. उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षक संघ से जुड़े एक पदाधिकारी बताते हैं, “ग्रामीण इलाकों में स्थिति और खराब है. कई स्कूलों में गणित पढ़ाने के लिए विषय विशेषज्ञ ही नहीं हैं. विज्ञान या किसी अन्य विषय के शिक्षक से गणित पढ़वाया जा रहा है, जिससे छात्रों की बुनियाद और कमजोर हो जाती है.”
राज्य सरकार के आंकड़े भी इस समस्या की पुष्टि करते हैं. एक शिक्षक नेता रवि कुमार बताते हैं, “बड़ी संख्या में सहायक अध्यापक और प्रवक्ता के पद वर्षों से खाली पड़े हैं. नई भर्तियों की प्रक्रिया धीमी है, जबकि छात्र संख्या लगातार बड़ी है. नतीजा यह है कि एक शिक्षक पर छात्रों का बोझ बढ़ता जा रहा है, और एक-एक स्टूडेंट पर ध्यान देना लगभग असंभव हो गया है.”
कोचिंग कल्चर भी इस समस्या का एक अहम पहलू बन चुका है. शहरी इलाकों में जिन छात्रों को निजी कोचिंग मिल जाती है, वे किसी तरह गणित संभाल लेते हैं, लेकिन ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के छात्रों के पास यह विकल्प नहीं होता. बाराबंकी के एक छात्र ने बताया, “स्कूल में ठीक से समझ नहीं आता और कोचिंग के पैसे नहीं हैं. एग्जाम में सवाल देखकर घबराहट होने लगती है.”
गणित के पेपर पैटर्न को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं. कई शिक्षकों का कहना है कि पाठ्यक्रम और प्रश्नपत्र के स्तर में संतुलन की कमी है. एक वरिष्ठ शिक्षक के मुताबिक, “सिलेबस भले NCERT आधारित हो, लेकिन कई बार प्रश्नों की प्रकृति ऐसी होती है कि औसत छात्र के लिए उन्हें हल करना मुश्किल हो जाता है. कॉन्सेप्ट क्लियर होने के बावजूद टाइम मैनेजमेंट और एप्लिकेशन में छात्र पिछड़ जाते हैं.” इस साल के नतीजों में यह भी दिखा कि सिर्फ गणित ही नहीं, बल्कि विज्ञान, फिजिक्स और केमिस्ट्री जैसे विषयों में भी बड़ी संख्या में छात्र फेल हुए. इंटरमीडिएट में 2.57 लाख छात्र फिजिक्स और 2.67 लाख छात्र केमिस्ट्री में फेल हुए. यह बताता है कि समस्या व्यापक है, लेकिन गणित इसका केंद्र बन गया है क्योंकि यह अन्य विज्ञान विषयों की भी नींव है.
हिंदी और अंग्रेज़ी जैसे विषयों में भी लाखों छात्रों का फेल होना यह संकेत देता है कि बुनियादी शिक्षा में खामियां हैं. लेकिन गणित की स्थिति इसलिए ज्यादा गंभीर है क्योंकि इसमें ‘रटने’ की गुंजाइश कम होती है. यहां समझ और अभ्यास ही सफलता की कुंजी है, जो मौजूदा ढांचे में छात्रों को पर्याप्त रूप से नहीं मिल पा रही. वोकेशनल और स्किल-बेस्ड विषयों में बेहद कम नामांकन भी इस ओर इशारा करता है कि शिक्षा प्रणाली अभी तक छात्रों को वैकल्पिक रास्ते देने में सफल नहीं हो पाई है. अगर गणित कठिन लग रहा है, तो छात्र या तो बायोलॉजी की ओर जा रहे हैं या आर्ट्स स्ट्रीम में शिफ्ट हो रहे हैं, जहां समाजशास्त्र, नागरिक शास्त्र और भूगोल जैसे विषय ज्यादा लोकप्रिय हैं.
शिक्षा नीति के जानकार मानते हैं कि इस समस्या का समाधान बहुस्तरीय होना चाहिए. सबसे पहले, प्राथमिक स्तर पर गणित की बुनियाद मजबूत करनी होगी. कॉन्सेप्ट-बेस्ड लर्निंग, गतिविधि आधारित शिक्षण और डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल बढ़ाना होगा. दूसरी बड़ी जरूरत है योग्य गणित शिक्षकों की भर्ती और उनकी नियमित ट्रेनिंग. लखनऊ विश्वविद्यालय के एक शिक्षा विशेषज्ञ कहते हैं, “जब तक क्लासरूम में शिक्षक की गुणवत्ता और संख्या नहीं सुधरेगी, तब तक किसी भी सिलेबस या परीक्षा सुधार का असर सीमित रहेगा. गणित ऐसा विषय है जिसे समझाने के लिए प्रशिक्षित शिक्षक और पर्याप्त समय दोनों जरूरी हैं.”
सरकार ने हाल के वर्षों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल कंटेंट और मिशन मोड में सुधार की कई पहलें शुरू की हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका असर अभी दिखना बाकी है.