यूपी में दागी और विवादित नेताओं पर दांव, भाजपा के लिए कितना कारगर?
भाजपा ने उत्तर प्रदेश में जिलाध्यक्षों की नई लिस्ट जारी की और इसमें से कई नाम दागी और विवादित हैं

घोसी विधानसभा उपचुनाव में दलबदलू नेता दारा सिंह चौहान पर दांव लगाकर मुंह की खाने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कुछ ऐसा ही प्रयोग 15 सितंबर को जारी जिलाध्यक्षों की सूची में भी किया है. इस सूची में कुछ ऐसे नेताओं को जगह मिली है जिन्हें लेकर भगवा दल के जिलाध्यक्षों की तैनाती विवादों में घिर गई है. सबसे ज्यादा असंतोष बाराबंकी जिले के जिलाध्यक्ष अरविंद मौर्य को लेकर सामने आया.
अरविंद मौर्य 2017 से पहले बसपा में थे. स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा ज्वाइन करने के साथ अरविंद भी कमलगामी हो गए थे. इससे पहले 25 जुलाई 2019 को अपर सत्र न्यायाधीश ने एनडीपीएस एक्ट में अरविंद मौर्य को 50 हजार रुपए के अर्थदंड की सजा सुनाई थी. जुर्माना न अदा करने पर छह माह के कारावास की सजा से दंडित करने का आदेश दिया था, जिसके बाद जुर्माना जमा किया गया था.
भाजपा में शामिल होने के बाद वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने इनको बाराबंकी सदर सीट से अपना प्रत्याशी बनाया, मगर उनके ऊपर आपराधिक मामला दर्ज होने और सजा मिलने को लेकर विपक्षियों ने निशाना तान लिया. सकते में आए भाजपा नेतृत्व ने अरविंद मौर्य का नामांकन पत्र रद्द होने की आशंका में आनन-फानन में इनकी उम्मीदवारी रद्द कर दी. पार्टी ने अरविंद मौर्य की शिक्षक पत्नी राजकुमारी मौर्य से सरकारी नौकरी से इस्तीफा दिलाकर उन्हें प्रत्याशी बनाया. हालांकि मौर्य पर भाजपा का दांव बुरी तरह फेल रहा और सपा के सुरेश यादव तीसरी बार विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे.
मुजफ्फरनगर जिले के नवनियुक्त जिलाध्यक्ष सुधीर सैनी इस साल जून में नगरीय निकाय चुनावों के दौरान विवादों में घिर गए थे. जिले में खतौली नगरीय निकाय चुनाव में भाजपा उम्मीदवार रहे उमेश कुमार ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और संगठन महामंत्री धर्मपाल सिंह को लिखित रूप से की गई शिकायत में सुधीर सैनी पर पार्टी उम्मीदवार का विरोध करने का आरोप लगाया था. नगरीय निकाय चुनाव के बाद से मुजफ्फरनगर जिले में भाजपा संगठन सांसद संजीव बलियान और दूसरे नेताओं के बीच बंटा हुआ है. सुधीर सैनी को संजीव बलियान का करीबी माना जाता है. इसी गुटबाजी के कारण भाजपा को खतौली नगरीय निकाय चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. सुधीर सैनी के जिलाध्यक्ष बनने के बाद से संजीव बलियान के गुट को फिलहाल मजबूती मिली है. इस विवाद का असर आगामी लोकसभा चुनाव में देखने को मिल सकता है.
इसी तरह आगरा जिले में जिन नेताओं के खिलाफ ऑडियो वायरल हुआ था. उन्हीं को दोबारा भगवा दल के जिलाध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष बरकरार रखने का भी पार्टी का एक खेमा विरोध कर रहा है. उम्रदराज नेताओं को जिले की कमान देने पर भी भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष है. आमतौर पर 45 से 55 वर्ष की उम्र तक के नेताओं को जिले में भाजपा की कमान देने से वे पूरी सक्रियता से पार्टी के कामकाज में अपना योगदान देते हैं. अमरोहा, रायबरेली, अमेठी, प्रयागराज, आजमगढ़ और वाराणसी में उम्रदराज नेताओं को चुनावी वर्ष में भाजपा जिलाध्यक्ष की कुर्सी सौंपने का भी पार्टी के अंदरखाने असंतोष को जन्म दे रहा है.
लोकसभा चुनाव में एक साल से भी कम समय रह जाने के बीच उत्तर प्रदेश भाजपा ने 15 सितंबर को दो तिहाई जिला इकाइयों में बदलाव कर दिया. पार्टी ने 98 संगठनात्मक जिलों के अध्यक्षों की सूची की घोषणा की. भाजपा संगठन के लिहाज से राज्य के छह क्षेत्रों में से, पश्चिम यूपी में 17, कानपुर क्षेत्र में 13, ब्रज, काशी और अवध क्षेत्र में 10-10 और गोरखपुर में नौ जिला अध्यक्षों को बदल दिया है. सबसे ज्यादा बदलाव पश्चिम यूपी में किए गए हैं, जहां से भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और संगठन महामंत्री आते हैं. यहां पार्टी की 19 जिला इकाइयां हैं. क्षेत्र में केवल दो जिला इकाइयां जिनके नेताओं को बरकरार रखा गया, वे हैं गाजियाबाद महानगर और सहारनपुर जिला.
लोकसभा चुनाव में प्रदेश की सभी 80 सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल ही भाजपा के लिए पश्चिमी यूपी चुनौती बना हुआ है. भाजपा पश्चिम यूपी में अपने प्रदर्शन में सुधार करने का लक्ष्य लेकर चल रही है, जिसमें 14 लोकसभा क्षेत्र हैं. भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी 14 सीटें जीतीं, लेकिन पांच साल बाद समाजवादी पार्टी (सपा), बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) की संयुक्त ताकत का सामना करना पड़ा. वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की सात सीटें ही भाजपा के खाते में आईं. भाजपा उम्मीद कर रही है कि ताजा संगठनात्मक सुधार 2024 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी में फिर से क्लीन स्वीप करने का माहौल पैदा करेगा. भाजपा के एक पदाधिकारी बताते हैं, "पश्चिमी यूपी में भाजपा ने ज्यादातर उन नेताओं को जिलाध्यक्ष बनाया है जो सांसदों के करीबी हैं. इनमें से कई नेताओ के विरोध में पार्टी में स्थानीय स्तर पर गुटबाजी बढ़ रही थी."
भाजपा ने 15 जिला इकाइयों में से 14 के अध्यक्षों को बदल दिया, जिसके अंतर्गत वे 16 लोकसभा सीटें आती हैं जो वर्ष 2019 के लोकसभा चुनावों में हार गईं. एकमात्र जिला जौनपुर अछूता रह गया है. हालांकि पार्टी ने पिछले साल उपचुनावों में रामपुर और आज़मगढ़ सीटें विपक्ष से छीन लीं, लेकिन फिर भी उसने इन जिलों में अपने अध्यक्ष बदल दिए. घोषित किए गए भाजपा के जिला संगठन बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण मऊ जिले के अध्यक्ष को हटाने का निर्णय था, जहां पार्टी इस महीने की शुरुआत में घोसी विधानसभा उपचुनाव हार गई थी. पार्टी ने प्रवीण गुप्ता की जगह नूपुर अग्रवाल को नया जिला अध्यक्ष नियुक्त किया है.
मुजफ्फरनगर में जिला अध्यक्षों को बदल दिया गया है, जहां पार्टी दिसंबर 2022 में खतौली विधानसभा उपचुनाव हार गई थी. साथ ही मैनपुरी में भी भाजपा की बदलाव की बयार बही. जहां पार्टी को पिछले साल लोकसभा उपचुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं "कुछ जिला अध्यक्षों को उनके खिलाफ शिकायतों के कारण बदला गया है. कुछ नेताओं को जातिगत समीकरणों के आधार पर तैनाती दी गई है." जिलाध्यक्षों की सूची में 36 ओबीसी, 21 ब्राह्मण, 20 क्षत्रिय, 8 वैश्य, 5 कायस्थ, 5 दलित और 3 भूमिहार को जगह दी गई है.
वाराणसी और गोरखपुर जैसे हाई-प्रोफाइल जिलों के महानगर और जिला अध्यक्षों को बरकरार रखा गया है. वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र है जबकि गोरखपुर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का गृह क्षेत्र है. वाराणसी में, विद्यासागर राय को भाजपा के महानगर अध्यक्ष के रूप में बरकरार रखा गया है, जबकि हंसराज विश्वकर्मा जिला इकाई में पार्टी के मामलों के प्रभारी बने रहेंगे. इस साल की शुरुआत में विश्वकर्मा के यूपी विधान परिषद के सदस्य बनने के बाद वाराणसी जिला इकाई में बदलाव की उम्मीद की जा रही थी.
विद्यासागर राय को दूसरा कार्यकाल और हंसराज विश्वकर्मा को लगातार तीसरा कार्यकाल मिला है. शायद इसलिए क्योंकि लोकसभा चुनाव नजदीक है और पीएम वाराणसी से सांसद हैं, इसलिए पार्टी ने यहां अनुभवी नेताओं को बरकरार रखा है. भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी का कहना है कि नए जिला अध्यक्षों की नियुक्ति करते समय लोकसभा चुनाव से पहले उभरते राजनीतिक परिदृश्य पर भी विचार किया गया है. ये बदलाव कितने कारगर साबित होते हैं यह तो 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे ही बताएंगे.