यूपी में अफसरों के खिलाफ सपा को कैसे मिला BJP का साथ!
उत्तर प्रदेश विधानसभा में जब सपा विधायकों ने सरकारी अधिकारियों पर उनकी अनदेखी का आरोप लगाया तो कुछ ऐसे ही आरोप सत्ता पक्ष की तरफ से भी सुनने को मिले

उत्तर प्रदेश की राजनीति में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखा टकराव आम बात है, लेकिन बजट सत्र के दौरान एक ऐसा मुद्दा सामने आया, जिस पर दोनों पक्ष एक सुर में दिखे. सवाल था, क्या अफसर जनप्रतिनिधियों को तवज्जो दे रहे हैं या नहीं?
विधानसभा के बाद विधान परिषद में भी यही शिकायत गूंज उठी कि अधिकारी फोन नहीं उठाते, बात टालते हैं और कई बार तो उनके स्टाफ का व्यवहार भी अपमानजनक होता है. इस बहस ने एक बड़े सवाल को जन्म दिया है, आखिर क्यों अफसर विधायकों और एमएलसी के निशाने पर हैं?
20 फरवरी को विधान परिषद की कार्यवाही में शिक्षक दल के ध्रुव कुमार त्रिपाठी ने बस्ती के डीएम को फोन लगाने का अपना अनुभव साझा किया. उनका कहना था कि डीएम का सीयूजी नंबर खुद अधिकारी नहीं उठाते, अर्दली फोन रिसीव करते हैं और उल्टे पूछते हैं कि एमएलसी कौन होता है. सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के सदस्यों ने इसका समर्थन किया. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के उमेश द्विवेदी ने कहा कि उन्होंने पांच महीनों में कई बार अपने जिले की डीएम को फोन किया, लेकिन हर बार यही जवाब मिला कि मैडम व्यस्त हैं.
BJP के सुरेंद्र चौधरी ने बिजली विभाग के एमडी के पीआरओ पर खुद को एमडी बताकर बात करने का आरोप लगाया. सपा सदस्य जासमीर अंसारी ने कहा कि जब सत्ता पक्ष के विधायक और मंत्री तक धरने पर बैठने को मजबूर हैं, तो विपक्ष की कौन सुनेगा. हालांकि संबंधित जिलों के जिलाधिकारी कार्यालय ने इन आरोपों का खंडन किया है.
इससे पहले विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडे ने यह मुद्दा उठाया था. उन्होंने कहा कि अगर विधायक जनहित के सवालों पर फोन करते हैं, तो अफसरों का कर्तव्य है कि वे जवाब दें. उनका आरोप था कि कार्यपालिका विधायिका पर हावी होती दिख रही है और अगर यही हाल रहा तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होगी. सपा के कमाल अख्तर, संग्राम सिंह यादव और रागिनी सोनकर ने भी कहा कि समस्या सिर्फ विपक्ष की नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष के सदस्य भी यही शिकायत कर रहे हैं.
सरकार की ओर से जवाब देते हुए संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने इस आरोप को खारिज किया कि कार्यपालिका विधायिका पर हावी है. उन्होंने माना कि अगर कोई अधिकारी फोन नहीं उठाता तो यह गलत है और सरकार ऐसे रवैये के साथ नहीं है. सामाजिक कल्याण मंत्री असीम अरुण ने साफ कहा कि कुछ अधिकारी सुस्त, बदतमीज और बेईमान भी हो सकते हैं. उन्होंने सुझाव दिया कि जिला और राज्य स्तर पर एक अलग नंबर हो, जहां विधायक ऐसी शिकायत दर्ज करा सकें.
विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने इसे गंभीर चिंता का विषय बताया. उन्होंने कहा कि सरकारी आदेशों का पालन न करना सेवा नियमों का उल्लंघन है और ऐसे मामलों में अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विधायक जनहित के कामों के लिए संपर्क करते हैं और अधिकारियों का संवैधानिक दायित्व है कि वे उन्हें समय और सम्मान दें. उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 164(2) और 194 का हवाला देते हुए कहा कि मंत्रिपरिषद सदन के प्रति जवाबदेह है और सदस्यों को अपने दायित्व निभाने के लिए विशेषाधिकार प्राप्त हैं. उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने विधान परिषद में कहा कि वे संबंधित जिलों के डीएम से सीधे बात करेंगे और स्थिति सुधारने का प्रयास होगा. विधान परिषद सभापति ने भी निर्देश दिए कि सभी जिलों के डीएम से इस विषय पर संवाद कर हालात बेहतर किए जाएं.
यह विवाद सिर्फ फोन उठाने या न उठाने का नहीं है; इसके पीछे प्रशासनिक संस्कृति और सत्ता संतुलन का बड़ा सवाल है. योगी सरकार ने 2017 के बाद से अफसरों की जवाबदेही पर जोर दिया है. मुख्यमंत्री स्तर से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, समीक्षा बैठकों और सीएम हेल्पलाइन जैसी व्यवस्थाएं शुरू की गईं. जनसुनवाई पोर्टल और आईजीआरएस के जरिए शिकायतों के निस्तारण की समयसीमा तय की गई.
जिलों में तहसील दिवस और थाना दिवस की व्यवस्था को सक्रिय किया गया. सरकार का दावा है कि इन पहलों से पारदर्शिता बढ़ी है और अफसरों पर निगरानी मजबूत हुई है. फिर भी, जनप्रतिनिधियों की शिकायतें बताती हैं कि जमीनी स्तर पर समन्वय में खामियां हैं. कई विधायक निजी बातचीत में कहते हैं कि जिला प्रशासन उनसे दूरी बनाकर चलता है. उनका तर्क है कि जब जनता किसी समस्या को लेकर विधायक के पास आती है, तो समाधान के लिए उन्हें डीएम, एसपी या विभागीय अधिकारियों से बात करनी पड़ती है. अगर वहां से त्वरित प्रतिक्रिया नहीं मिलती, तो उनकी राजनीतिक साख प्रभावित होती है.
दूसरी ओर, कुछ प्रशासनिक अधिकारियों का तर्क है कि उन्हें प्रतिदिन सैकड़ों कॉल आते हैं. कई बार कॉल ऐसे मामलों में भी होते हैं, जो सीधे उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं होते. कुछ अधिकारी यह भी कहते हैं कि हर कॉल को तुरंत उठाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, लेकिन कॉल बैक और औपचारिक संवाद की व्यवस्था बेहतर होनी चाहिए. उनका कहना है कि प्रोटोकॉल और संस्थागत संवाद की स्पष्ट व्यवस्था बने, ताकि व्यक्तिगत स्तर पर टकराव की नौबत न आए.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव नई बात नहीं है. भारतीय राज्यों में अक्सर यह बहस होती रही है कि चुने हुए प्रतिनिधि और नियुक्त अधिकारी के बीच संतुलन कैसे बने. फर्क यह है कि इस बार उत्तर प्रदेश में सत्ता और विपक्ष दोनों ने मिलकर इस मुद्दे को उठाया है. इससे संकेत मिलता है कि समस्या व्यापक है, न कि किसी एक दल तक सीमित. राजनीतिक विश्लेषक और लखनऊ की प्रतिष्ठित अवध कालेज की प्राचार्य बीना राय कहती हैं, “योगी सरकार के लिए यह एक परीक्षा भी है. एक ओर वह कानून व्यवस्था और प्रशासनिक सख्ती की छवि पर खड़ी है, दूसरी ओर उसे यह भी सुनिश्चित करना है कि अफसर जनप्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह रहें. अगर विधायक और एमएलसी खुद को उपेक्षित महसूस करते हैं, तो संदेश नीचे तक जाता है कि राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन के बीच तालमेल में दरार है.”
सरकार ने पहले भी निर्देश जारी किए हैं कि अधिकारियों को जनप्रतिनिधियों के फोन नंबर अपने पास रखने चाहिए और समय पर प्रतिक्रिया देनी चाहिए. अब विधानसभा अध्यक्ष ने सख्त संदेश देते हुए कहा है कि आदेशों की अनदेखी सेवा नियमों का उल्लंघन मानी जाएगी. सवाल यह है कि क्या यह चेतावनी व्यवहार में बदलाव ला पाएगी.