यूपी में अब आते रहेंगे 100 किमी की रफ्तार वाले तूफान?
पश्चिमी विक्षोभ, समुद्री नमी, 45 डिग्री की तपिश और जलवायु परिवर्तन के खतरनाक मेल ने उत्तर प्रदेश में पैदा किया था 130 kmph रफ्तार वाला जानलेवा तूफान

उत्तर प्रदेश में पिछले हफ्ते आई आंधी और तूफानों ने सिर्फ पेड़, बिजली के खंभे और मकान नहीं गिराए, बल्कि मौसम विज्ञान की दुनिया में भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए. 25 जिलों में कम से कम 111 लोगों की मौत और सैकड़ों लोगों के घायल होने के पीछे कोई एक सामान्य मौसमी घटना जिम्मेदार नहीं थी.
यह कई अलग-अलग मौसम प्रणालियों के ऐसे टकराव का नतीजा था, जो आम तौर पर एक साथ इतनी तीव्रता में नहीं दिखाई देते. प्रयागराज, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी और आसपास के जिलों में जो कुछ हुआ उसे मौसम विज्ञान की भाषा में भले ‘आंधी’ कहा जाए लेकिन उसकी ताकत किसी सामान्य प्री-मॉनसून तूफान जैसी नहीं थी.
कई जगहों पर हवा की रफ्तार 100 से 130 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच गई. इतनी तेज हवाएं आम तौर पर समुद्री चक्रवातों में देखी जाती हैं, न कि उत्तर भारत के अंदरूनी इलाकों में. वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना एक उभरते हुए खतरनाक पैटर्न की तरफ इशारा करती हैं, जिसमें जलवायु परिवर्तन के कारण प्री-मॉनसून तूफान ज्यादा हिंसक और ज्यादा अनिश्चित होते जा रहे हैं.
जब कई मौसम प्रणालियां एक साथ टकराईं
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत एक ‘पश्चिमी विक्षोभ’ से हुई. पश्चिमी विक्षोभ एक कम दबाव वाली मौसमी प्रणाली होती है जो भूमध्यसागर और ईरान-अफगानिस्तान के इलाके से चलकर पाकिस्तान होते हुए उत्तर भारत तक पहुंचती है. सर्दियों और वसंत के मौसम में यही सिस्टम उत्तर भारत में बारिश और बर्फबारी कराता है. लेकिन इस बार समस्या सिर्फ पश्चिमी विक्षोभ नहीं था.
मई का मध्य तक आते-आते आम तौर पर इसकी ताकत कमजोर पड़ जाती है लेकिन इस बार यह काफी सक्रिय अवस्था में उत्तर भारत पहुंचा. उसी समय बंगाल की खाड़ी और अरब सागर से भारी मात्रा में नमी वाली हवाएं भी उत्तर प्रदेश की ओर खिंच आईं. इन हवाओं ने निचले स्तर पर गर्म और नमी से भरी हवा तैयार कर दी. ऊपर से पश्चिमी विक्षोभ के कारण ठंडी और सूखी हवाएं मौजूद थीं. नतीजा यह हुआ कि वातावरण में भारी अस्थिरता पैदा हो गई. मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक यही स्थिति बड़े गरज-चमक वाले तूफानों को जन्म देती है.
गर्मी ने तूफान को बनाया और खतरनाक
तूफान के लिए सिर्फ नमी काफी नहीं होती. उसे ऊर्जा भी चाहिए होती है, और इस बार वह ऊर्जा उत्तर प्रदेश की झुलसती गर्मी से मिली. तूफान से पहले प्रदेश के कई हिस्सों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास या उससे ऊपर पहुंच चुका था. लगातार कई दिनों की तेज गर्मी ने जमीन को असामान्य रूप से गर्म कर दिया था. जब जमीन इतनी गर्म हो जाती है, तो उसके ऊपर की हवा तेजी से गर्म होकर ऊपर उठने लगती है.
अगर उसी समय वातावरण में पर्याप्त नमी मौजूद हो तो ऊपर उठती गर्म हवा तेजी से बादलों में बदलती है. इस प्रक्रिया में भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है जिसे मौसम विज्ञान में ‘लेटेंट हीट’ यानी गुप्त ऊष्मा कहा जाता है. यही ऊर्जा तूफानों को और ताकतवर बनाती है. 13 मई को उत्तर प्रदेश के ऊपर ठीक यही हुआ. जमीन की सतह से गर्म हवा तेजी से ऊपर उठी, ऊपर मौजूद ठंडी हवा से टकराई और देखते ही देखते विशाल ‘क्यूम्युलोनिम्बस’ या सामान्य भाषा में वर्षाभकपासी बादलों का निर्माण हो गया.
मौसम विशेषज्ञ दुर्गेश श्रीवास्तव के अनुसार इस बार बने क्यूम्युलोनिम्बस बादलों की ऊंचाई करीब 16 किलोमीटर तक पहुंच गई थी. यह ऊंचाई सामान्य नहीं मानी जाती. भारत के ऊपर वायुमंडल की निचली परत, जिसे ‘क्षोभमंडल’ कहा जाता है, लगभग 16 किलोमीटर तक ही फैली होती है. जब कोई बादल इस सीमा तक पहुंच जाता है तो वह अत्यधिक शक्तिशाली तूफानी तंत्र बन जाता है. ऐसे बादलों में भीषण बिजली कड़कना, मूसलाधार बारिश, ओले और बेहद तेज हवाएं पैदा करने की क्षमता होती है. इन्हीं बादलों ने उत्तर प्रदेश के ऊपर ‘स्क्वॉल लाइन’ नाम की खतरनाक संरचना बनाई.
क्या होती है स्क्वॉल लाइन?
मौसम वैज्ञानिक ‘स्क्वॉल लाइन’ को गंभीर तूफानों की लगातार बनी रहने वाली कतार कहते हैं. यह कई किलोमीटर लंबी हो सकती है और एक साथ बड़े इलाके में तबाही मचा सकती है. इस बार उत्तर-पश्चिम उत्तर प्रदेश से शुरू हुई तूफानों की यह कतार पूर्वी यूपी तक फैल गई. इसी कारण नुकसान भी बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र में हुआ.
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस तूफान में स्क्वॉल लाइन के सभी लक्षण मौजूद थे. स्क्वॉल लाइन बनने के लिए सिर्फ गर्म हवा और नमी काफी नहीं होती. इसके लिए ‘विंड शियर’ भी जरूरी होता है. विंड शियर का मतलब है ऊंचाई के साथ हवा की दिशा और गति में बदलाव. अगर विंड शियर न हो तो कोई भी सामान्य तूफान लगभग एक घंटे के भीतर खत्म हो जाता है क्योंकि उसकी ऊपर उठती और नीचे गिरती हवाएं एक-दूसरे को कमजोर कर देती हैं. लेकिन जब ऊपरी स्तर पर हवाएं अलग दिशा में और तेज चल रही हों तो तूफान झुक जाता है. उसकी ऊपर उठने वाली हवा और नीचे गिरने वाली हवा अलग-अलग हो जाती हैं. इससे तूफान कई घंटों तक जिंदा रह सकता है.
दुर्गेश श्रीवास्तव के मुताबिक इस बार ऊपर की परतों में पश्चिमी विक्षोभ से आई पछुआ हवाएं थीं, जबकि निचले स्तर पर बंगाल की खाड़ी से आने वाली पुरवाई हवाएं मौजूद थीं. दोनों के बीच के अंतर ने जबरदस्त विंड शियर पैदा कर दिया. यही कारण था कि तूफान बिखरने के बजाय एक संगठित कतार में बदल गया और सैकड़ों किलोमीटर तक फैल गया.
क्यों बढ़ रही हैं ऐसी घटनाएं?
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन अब इन तूफानों को ज्यादा हिंसक बना रहा है. IMD के वैज्ञानिक ओपी श्रीजीत के मुताबिक, जैसे-जैसे औसत तापमान बढ़ रहा है, हवा की नमी सोखने की क्षमता भी बढ़ रही है. गर्म हवा के अणु अपेक्षाकृत ज्यादा दूर होते हैं और यह ज्यादा जलवाष्प धारण कर सकती है. विज्ञान की भाषा में इसे ‘क्लॉसियस-क्लैपेरॉन संबंध’ कहा जाता है. इसके अनुसार तापमान में हर एक डिग्री सेल्सियस वृद्धि पर हवा लगभग 7 प्रतिशत ज्यादा नमी पकड़ सकती है. इसका सीधा मतलब यह है कि आज के मुकाबले 20-30 साल पहले के वातावरण की तुलना में अब हवा में कहीं ज्यादा नमी मौजूद रहती है.
जब यह नमी किसी पश्चिमी विक्षोभ जैसे सिस्टम से टकराती है, तो उससे बनने वाले तूफान पहले की तुलना में ज्यादा ऊर्जा वाले और ज्यादा विनाशकारी हो जाते हैं. यही कारण है कि अब कम समय में बहुत ज्यादा बारिश, बड़ी संख्या में बिजली गिरने की घटनाएं और अत्यधिक तेज हवाएं देखने को मिल रही हैं.
क्या पूर्वानुमान नाकाम रहा?
मौसम विभाग का कहना है कि उसने समय रहते चेतावनी जारी की थी. IMD के शुरुआती अनुमान में हवा की रफ्तार 60 kmph तक रहने की संभावना जताई गई थी जिसे बाद में बढ़ाकर 70 kmph और नाउकास्ट (तात्कालिक चेतावनियों) में 80-90 kmph तक किया गया.
हालांकि वास्तविकता इससे कहीं ज्यादा खतरनाक निकली. कई जिलों में हवाएं 100 kmph से ऊपर चलीं और कुछ जगहों पर 130 kmph तक पहुंच गईं. मौसम वैज्ञानिक मानते हैं कि ऐसे तूफानों का सटीक अनुमान लगाना बेहद कठिन होता है क्योंकि ये बहुत कम समय में विकसित होते हैं और इनका प्रभाव क्षेत्र भी तेजी से बदलता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि असली चुनौती सिर्फ पूर्वानुमान नहीं, बल्कि चेतावनी को लोगों तक समय पर पहुंचाना है. ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में लोग खुले खेतों, सड़कों या अस्थायी ढांचों में काम करते हैं. अचानक आने वाली तेज आंधी और बिजली गिरने से उनके पास बचने का समय बहुत कम होता है. मौसम विज्ञान अब काफी विकसित हो चुका है. उपग्रह, डॉप्लर रडार, ऑटोमेटेड मौसम स्टेशन और हाई-रिजोल्यूशन मॉडल पहले की तुलना में कहीं बेहतर पूर्वानुमान दे रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भी हजारों निगरानी स्टेशन सक्रिय हैं. लेकिन इसके बावजूद मौतों की संख्या बताती है कि तकनीक और आम लोगों के बीच अभी बड़ा अंतर मौजूद है.