क्या तमिलनाडु में सिर्फ एक सीट जीतने वाली BJP बन गई है किंगमेकर!

तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में 108 सीटें जीतने के बावजूद अभिनेता विजय के लिए मुख्यमंत्री बनने की राह अब भी मुश्किल है

Election Results
विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद BJP मुख्यालय में पीएम मोदी (बाएं) और TVK प्रमुख विजय (दाएं)

तमिलनाडु की 2026 विधानसभा चुनाव परिणाम ने न सिर्फ द्रविड़ पार्टियों की दशकों पुरानी द्विध्रुवीय राजनीति को तोड़ा बल्कि एक नया राजनीतिक समीकरण भी रचा है. अभिनेता विजय की तमिलगा वेट्ट्री कजगम (TVK) 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. लेकिन 234 सदस्यों वाली विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 118 है और अब भी उनकी पार्टी इससे दूर दिख रही है. खुद विजय दो सीटों से चुनाव जीते हैं. इसलिए उनके विधायकों की संख्या 107 ही रहेगी.

हालांकि, ऐसी स्थिति में विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा भी 233 सीटों के आधार पर तय होगा और जादुई आंकड़ा 117 सीटों का होगा. कांग्रेस के पांच विधायकों को मिला भी लें तो विजय का समर्थन करने वाले विधायकों की संख्या 112 तक ही पहुंच रही है. ऐसी स्थिति में तमिलनाडु के राज्यपाल राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आरलेकर ने विजय को सरकार बनाने का न्यौता देने से इनकार कर दिया है और उनसे कम से कम 117 विधायकों के लिखित समर्थन की मांग की है.

तमिलनाडु के पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में प्रदेश में सिर्फ एक सीट जीतने वाली केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है. तमिलनाडु में कांग्रेस पार्टी की तरफ से पूरी स्थिति अपने पक्ष में करने में लगे नेताओं का कहना है कि केंद्र की BJP सरकार राज्यपाल की संस्था का दुरुपयोग करके विजय का रास्ता रोक रही है. इनका कहना है कि सबसे बड़े दल या सबसे बड़े गठबंधन के नेता के तौर पर विजय को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाने के बाद उन्हें विधानसभा में बहुमत पेश करने के लिए कहा जाना चाहिए लेकिन यहां उलटा किया जा रहा है.

इन आरोपों के बीच यह समझ लेना आवश्यक है कि ऐसी स्थिति में संवैधानिक व्यवस्था क्या है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164.1 के तहत यह राज्यपाल के विवेक पर निर्भर करता है कि वे किसे सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करते हैं. लेकिन इस मामले में कुछ बातें संवैधानिक परंपरा के तौर पर स्थापित हो गई हैं. इनमें सबसे बड़े दल के अलावा सबसे बड़े गठबंधन को पहले सरकार बनाने का न्यौता देने की बात शामिल है.

लेकिन जब केआर नारायणन भारत के राष्ट्रपति थे तो उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश करने वाले दल से समर्थन करने वाले सांसदों की चिट्ठी मांगी थी. तब से जब भी यह देखा जाता है कि किसी दल या गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत वाली संख्या नहीं है तो ऐसी स्थिति में समर्थन पत्र राज्यपाल भी मांगते रहे हैं. तमिलनाडु के राज्यपाल आर्लेकर ने इसी परंपरा के आधार पर विजय से समर्थन करने वाले विधायकों की सूची मांगी है.

दरअसल, BJP नेताओं की मानें तो विजय का मामला उस समय से गड़बड़ाया जब उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को पत्र लिखकर समर्थन मांगा. हालांकि, जो लोग राजनीति को समझते हैं, वे मानते हैं कि पत्र लिखने का सीधा सा मतलब यह होता है कि सहमति बन गई है और पत्र लिखकर सिर्फ उस सहमति को औपचारिक जामा पहनाया जा रहा है.

BJP सूत्रों की मानें तो पार्टी की तरफ से विजय को यह संकेत दिया गया था कि AIADMK के समर्थन से उनकी सरकार बन सकती है लेकिन विजय उसके साथ मिलकर सरकार बनाने को लेकर इच्छुक नहीं थे. इसलिए उन्होंने कांग्रेस से समर्थन मांगने की राह अपनाई. विजय का अनुमान यह था कि एक बार अगर कांग्रेस उनके पाले में आ जाएगी तो ​फिर उन्हें सिर्फ पांच सीटों की जरूरत रहेगी और ऐसे में कुछ और छोटी पाटियां उनका समर्थन कर देंगी. वह भी खास तौर पर उस परिस्थिति में जब राज्यपाल पहले उनका शपथ ग्रहण करा देंगे और उन्हें सदन में बहुमत साबित करने के लिए कुछ वक्त दे देंगे. लेकिन राज्यपाल ने ऐसा नहीं करके तमिलनाडु में नए राजनीतिक समीकरणों के बनने-बिगड़ने के लिए पर्याप्त सियासी जमीन मुहैया करा दी है.

तमिलनाडु की राजनीति में DMK और AIADMK के साथ मिलकर सरकार बनाने की संभावनाओं को टटोलने की भी चर्चा है. दोनों क्षे​त्रीय पार्टियां एक-दूसरे की धुर विरोधी हैं और ऐसे में इनके एक साथ आने की बात हैरान करने वाली है. लेकिन ऐसा नहीं है कि भारत में पहले दो धुरविरोधी क्षेत्रीय पार्टियां साथ आई ही नहीं हों. 2019 के लोकसभा चुनाव में ही उत्तर प्रदेश में धुर विरोधी माने जाने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी एक साथ मिलकर गठबंधन में चुनाव लड़ी थी. कांग्रेस के समर्थन से विजय को सरकार बनाने से रोकने के लिए अब ऐसी ही संभावनाएं तमिलनाडु में बनती दिख रही हैं.

DMK के विधायकों की संख्या 59 है. वहीं AIADMK ​के पास 47 विधायक हैं. दोनों को ​मिला दें तो इनके कुल विधायकों की संख्या 106 पर पहुंच जाती है. यानी TVK से सिर्फ एक कम. अब कहानी में ट्विस्ट इसके बाद की संख्या से आने की उम्मीद है. विजय के पास कांग्रेस की संख्या मिलाकर 112 विधायकों का समर्थन है और यह संख्या पिछले 48 घंटे से जस की तस है. वहीं AIADMK-DMK के विधायकों की संख्या 106 है. यह तय माना जा रहा है कि अगर यह गठबंधन बनता है तो इसे PMK के चार विधायकों और AMMK  के एक विधायक का समर्थन निश्चित तौर पर हासिल होगा. यानी इनकी संख्या 111 पर पहुंच जाएगी.

बाकी बचे 10 विधायकों में से इसे छह और विधायकों का समर्थन चाहिए होगा. अगर BJP का एक विधायक किसी आंतरिक सहमति के साथ इस गठबंधन में शामिल नहीं होता तो दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के चार विधायकों समेत IUML के दो विधायकों, VCK के दो विधायक और DMDK के एक विधायक का समर्थन इस गठबंधन को मिल सकता है. इनमें से अधिकांश पार्टियां ऐसी हैं, जिनके लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि वे कांग्रेस या BJP के समर्थन से सरकार बनने से रोकें.

BJP के एक नेता यह भी बताते हैं कि AIADMK के विधायकों को पांडिचेरी के एक रिसॉर्ट में शिफ्ट करना भी उसकी रणनीति का ही हिस्सा है. पांडिचेरी में एनडीए की ही सरकार थी और अभी तमिलनाडु के साथ ही हुए विधानसभा चुनाव में फिर से एनडीए को ही बहुमत मिला है. ये नेता बताते हैं, ''BJPकी तरफ से जिस फॉर्मेशन में तमिलनाडु में सरकार बनवाने की कोशिश हो रही है, उसमें यह फार्मूला आगे बढ़ाया गया है कि AIADMK के नेतृत्व में सरकार बने. DMK बाहर से समर्थन करे. दूसरी छोटी पार्टियां सरकार का हिस्सा बनें. लेकिन सभी स्टेकहोल्डर्स में इस बात को लेकर सहमति है कि ऐसी किसी कोशिश से पहले तमिलनाडु की जनता को स्पष्ट तौर पर यह दिखे कि विजय बहुमत नहीं जुटा पाए और इसके बाद जो राजनीतिक परिस्थितियां बनी हैं, उसके बाद यह नए तरह के गठबंधन की सरकार बनी है.''

दरअसल, BJP यह नहीं चाह रही है कि दक्षिण भारत के किसी एक और राज्य की सरकार में कांग्रेस की भूमिका हो. हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों के जरिए कांग्रेस ने केरल की सत्ता में वापसी की. कर्नाटक और तेलंगाना में पहले से कांग्रेस की सरकार है. ऐसे में BJP किसी भी कीमत पर नहीं चाह रही कि तमिलनाडु की सरकार में भी कांग्रेस की भूमिका हो.

इसी तरह से DMK भी कांग्रेस का रास्ता रोकने के लिए काफी कुछ करने को तैयार है. कांग्रेस ने DMK के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और राहुल गांधी के आश्वासन के बावजूद कांग्रेस ने पाला बदलने में 24 घंटे का भी समय नहीं लगाया. DMK का नेतृत्व इस बात को लेकर बहुत नाराज है.

यानी कुल मिलाकर तमिलनाडु में स्थिति यह बन रही है कि कांग्रेस का रास्ता रोकने के लिए पारंपरिक तौर पर धुर-विरोधी मानी जानी वाली पार्टियां प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से एक-दूसरे का समर्थन करने को तैयार दिख रही हैं. अगर वाकई ऐसा हो पाता है तो इसका सबसे अधिक खमियाजा पहला चुनाव लड़कर और सबसे अधिक सीटें जीतकर आए विजय को भुगतना पड़ेगा और उन्हें इस बात का अहसास होगा कि असली राजनीति भी कम फिल्मी नहीं है और यहां भी क्लाइमेक्स क्या होगा, इसके लिए लोगों को अंत तक इंतजार करना पड़ता है.

Read more!