TMC के 'वेलफेयर' प्रयोग कैसे ममता सरकार की कामयाब नीतियां बनकर उभरे?
'दुआरे चिकित्सा' (घर-घर स्वास्थ्य) जैसे चुनावी वादे दिखाते हैं कि ममता बनर्जी की रणनीति ऐसी गवर्नेंस देने की है जो लोगों तक पहुंच, डिलीवरी और विजिबिलिटी पर टिकी हो

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 2026 के चुनावी मेनिफेस्टो के केंद्र में हेल्थकेयर है. लेकिन इसका सबसे बड़ा प्रस्ताव, 'दुआरे चिकित्सा' यानी घर-घर स्वास्थ्य सेवाएं, असल में जमीन पर परखे जा चुके एक प्रयोग से निकला है.
जिसे आज पूरे राज्य के लिए एक सालाना हेल्थकेयर मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा है, वह असल में पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की ओर से अपने विधानसभा क्षेत्र डायमंड हार्बर और कुछ अन्य चुनिंदा जगहों पर 'सेवाश्रय' कैंपों के जरिए शुरू किए गए एक मॉडल का ही विस्तार है.
20 मार्च को विधानसभा चुनाव का मेनिफेस्टो जारी करते हुए, सीएम ममता बनर्जी ने इसे 'डिलीवरी और विस्तार' पर टिके अपने कल्याणकारी मॉडल को ही आगे बढ़ाने वाला कदम बताया. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर उन्होंने लिखा: "आज, मैं बंगाल के लिए अपनी '10 प्रतिज्ञा' लोगों के सामने रख रही हूं." उनकी इन प्रतिज्ञाओं में गवर्नेंस के हर पहलू को छुआ गया है - महिलाओं, युवाओं, किसानों, भूमिहीन खेतिहर मजदूरों और बुजुर्गों को मजबूत करना; शिक्षा और स्वास्थ्य को आगे बढ़ाना; हर घर के लिए पक्का मकान और नल का पानी सुनिश्चित करना; प्रशासन को दुरुस्त करना; और बंगाल को पूर्वी भारत के व्यापार का 'गेटवे' बनाना.
उन्होंने आगे लिखा कि इन वादों के जरिए वह अपनी 'मां-माटी-मानुष' सरकार के चौथे कार्यकाल में उसी जोश के साथ विकास की रफ्तार बनाए रखने का संकल्प दोहरा रही हैं. बनर्जी ने सेवाओं की डिलीवरी पर बहुत जोर दिया. उन्होंने दावा किया, "कर्म ही हमारा धर्म है... हमने लोगों से जो भी वादे किए थे, उन्हें पूरा किया है और वादे से बढ़कर काम किया है."
उनका यह बयान बहुत अहम है. यह मेनिफेस्टो को सिर्फ वादों की एक लिस्ट के तौर पर नहीं, बल्कि पार्टी के उस गवर्नेंस मॉडल के विस्तार के तौर पर पेश करता है जिसे वे पहले ही 'सफल' बता चुकी हैं. मेनिफेस्टो के शुरुआती पन्नों में भी यही बात झलकती है, जहां बनर्जी गवर्नेंस को "सेवा का काम" बताती हैं और कहती हैं कि जनकल्याण और आर्थिक विकास दो अलग-अलग महत्वाकांक्षाएं नहीं, बल्कि एक ही अटूट मकसद हैं.
मेनिफेस्टो के इसी फ्रेमवर्क में 'दुआरे चिकित्सा' एक बहुत बड़ा कदम बनकर उभरता है. इसके तहत हर ब्लॉक और कस्बे में सालाना हेल्थकेयर कैंप लगाए जाएंगे, ताकि लोगों के दरवाजे तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें. यह प्रस्ताव 'दुआरे सरकार' (दरवाजे पर सरकार) की तर्ज पर ही तैयार किया गया है, जिसके तहत (मेनिफेस्टो के मुताबिक) राज्य भर में लाखों कैंपों के जरिए अब तक 10 करोड़ से ज्यादा पब्लिक सर्विस दी जा चुकी हैं.
इस मॉडल को हेल्थकेयर तक बढ़ाकर, पार्टी एक बड़ी स्ट्रक्चरल कमी को दूर करने की कोशिश कर रही है. 'स्वास्थ्य साथी' जैसी योजनाओं ने 2.45 करोड़ से ज्यादा परिवारों को इलाज के लिए आर्थिक मदद तो दी है, लेकिन अस्पतालों तक उनकी सीधी पहुंच अभी भी एक जैसी नहीं है. 'दुआरे चिकित्सा' का मकसद टेस्ट, डॉक्टर की सलाह और दवाइयां सीधे मोहल्लों तक पहुंचाकर इसी दूरी को पाटना है. हेल्थकेयर का यह वादा ऐसे समय में राजनीतिक रूप से बहुत मायने रखता है जब विपक्ष सरकारी अस्पतालों की सुविधाओं और सुरक्षा पर लगातार सवाल उठा रहा है. खासकर 2024 के आरजी कर रेप और मर्डर केस के बाद, जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया था. हाल ही में, उसी अस्पताल में दो दुर्भाग्यपूर्ण मौतें भी हुई हैं.
'दुआरे चिकित्सा' की जड़ें 'सेवाश्रय' में खोजी जा सकती हैं, जो पिछले एक साल में चलाए गए बड़े पैमाने के मेडिकल आउटरीच प्रोग्राम्स की एक सीरीज थी. ये कैंप, खासकर डायमंड हार्बर और नंदीग्राम में, सीधे तौर पर अभिषेक बनर्जी से जुड़े थे और इन्हें किसी चुनावी कैंपेन की तरह चलाया गया था. 2 जनवरी से 20 मार्च 2025 के बीच डायमंड हार्बर में चला 'सेवाश्रय' का पहला फेज 75 दिनों तक चला और इसमें 12.35 लाख से ज्यादा मरीजों को मेडिकल सेवाएं दी गईं. इसके बाद 1 दिसंबर 2025 से 28 जनवरी 2026 के बीच 'सेवाश्रय 2.0' चला, जो 5 लाख और लोगों तक पहुंचा.
फिर आया नंदीग्राम का नंबर, जहां 15 जनवरी से 31 जनवरी 2026 के बीच यह प्रोग्राम चलाया गया. यह दिखाता है कि यह मॉडल कितने बड़े पैमाने पर काम कर सकता है. वहां करीब 45,000 लोगों ने रजिस्ट्रेशन कराया, 28,000 से ज्यादा टेस्ट हुए, 30,000 से ज्यादा मरीजों को मुफ्त दवाइयां मिलीं और करीब एक हजार लोगों को आगे के इलाज के लिए रेफर किया गया. नंदीग्राम को एक सोची-समझी रणनीति के तहत चुना गया था क्योंकि यह बीजेपी नेता और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी का इलाका है, और इस अभियान की अगुवाई खुद अभिषेक बनर्जी कर रहे थे. हावड़ा और बैरकपुर में भी इस प्रोग्राम के छोटे वर्जन चलाए गए, जो बताते हैं कि यह मॉडल अपनी शुरुआती जगह से बाहर भी कॉपी किया जा रहा था.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 'सेवाश्रय' की कामयाबी ने ही सीधे तौर पर 'दुआरे चिकित्सा' का आइडिया दिया. एक से दूसरे की तरफ यह शिफ्ट स्केल और नीयत, दोनों में बदलाव को दिखाता है. सेवाश्रय एक तय इलाके, तय समय और नेता के दम पर चलने वाला प्रोग्राम था. जबकि 'दुआरे चिकित्सा' को पूरे राज्य में चलने वाले एक ऐसे प्रोग्राम के तौर पर डिजाइन किया जा रहा है जो प्रशासनिक ढांचे का ही हिस्सा होगा. यह बदलाव 'दुआरे सरकार', 'आमादेर पाड़ा आमादेर समाधान' और 'सोरसोरी मुख्यमंत्री' जैसी पुरानी पहलों के विकास से मेल खाता है, जो मिलकर टीएमसी की 'पार्टिसिपेटरी और डोरस्टेप गवर्नेंस' की रीढ़ बनाते हैं.
यह मेनिफेस्टो 'दुआरे चिकित्सा' को सिर्फ हेल्थकेयर इकोसिस्टम तक ही सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे सामाजिक सुरक्षा के एक बड़े फ्रेमवर्क का हिस्सा बनाता है. यह 'स्वास्थ्य साथी' के तहत 2.45 करोड़ परिवारों के लिए कैशलेस इलाज, लगभग 100 फीसद इंस्टीट्यूशनल डिलीवरी और हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर के विस्तार जैसी उपलब्धियों को भी गिनाता है. साथ ही, यह हेल्थकेयर को पोषण, सामाजिक सुरक्षा और लोकल गवर्नेंस डिलीवरी सिस्टम से जोड़ता है. फिर भी, 'सेवाश्रय' के अनुभव से यह बात सामने आई कि कवरेज और लोगों की पहुंच के बीच अभी भी एक फासला है. स्वास्थ्य सेवाओं को सीधे समुदायों तक ले जाकर, पार्टी आखिरी छोर तक पहुंचने की इस चुनौती को हल करने की कोशिश कर रही है.
'दुआरे चिकित्सा' असल में "दीदीर 10 प्रतिज्ञा" के तहत किए गए उन बड़े वादों का हिस्सा है, जो सिर्फ घोषणाएं नहीं हैं, बल्कि एक तरह का आर्थिक और प्रशासनिक दखल हैं. इनमें 'लक्ष्मीर भंडार' में 500 रुपए की बढ़ोतरी (जिससे सामान्य महिलाओं के लिए मासिक सहायता 1,500 रुपए और SC/ST महिलाओं के लिए 1,700 रुपए हो जाएगी), 'बांगलार जुबो-साथी' के तहत बेरोजगार युवाओं को हर महीने 1,500 रुपए की मदद, और किसानों की आय बढ़ाने व भूमिहीन मजदूरों को सपोर्ट करने के लिए 30,000 करोड़ रुपए का कृषि बजट शामिल है. इसके अलावा, हर घर के लिए पक्का मकान और नल का पानी देने का वादा भी है.
मेनिफेस्टो में कुछ और भी अहम वादे किए गए हैं: 'बांगलार शिक्षायतन' के तहत सभी सरकारी स्कूलों का होलिस्टिक अपग्रेडेशन, ज्यादा लोगों को कवर करते हुए वृद्धावस्था पेंशन का विस्तार, और प्रशासनिक पहुंच को बेहतर बनाने के लिए बशीरहाट, राणाघाट और सुंदरबन समेत सात नए जिले बनाना. 'मिशन महानगर' के तहत डायमंड हार्बर, सिलीगुड़ी और दुर्गापुर समेत 25 कस्बों को 'मॉडल अर्बन सेंटर्स' के रूप में विकसित करने की बात भी कही गई है. साथ ही, इसमें 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने और पेंडिंग महंगाई भत्ते के बकाए को चुकाने का प्रस्ताव है, जो साफ तौर पर सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी दूर करने की एक कोशिश है.
कल्याणकारी कार्यक्रमों के इन वादों के साथ-साथ, मेनिफेस्टो एक बड़ा आर्थिक रोडमैप भी पेश करता है. इसका लक्ष्य अगले पांच सालों में बंगाल को 40 लाख करोड़ रुपए की अर्थव्यवस्था में बदलना और एक दशक के भीतर इसे भारत की तीसरी सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करना है. यह रणनीति बंगाल को एक ग्लोबल ट्रेड सेंटर बनाने, डीप-सी और रिवर पोर्ट नेटवर्क का विस्तार करने, और बंगाल को पूर्वी भारत के गेटवे के रूप में स्थापित करने के लिए लॉजिस्टिक्स हब विकसित करने पर केंद्रित है. दस्तावेज का तर्क है कि पिछले 15 सालों में बंगाल की जीडीपी पहले ही करीब छह गुना बढ़ चुकी है, प्रति व्यक्ति आय तीन गुना हो गई है और बेरोजगारी काफी कम हुई है. यह पूरा आर्थिक नैरेटिव वेलफेयर डिलीवरी से बहुत करीब से जुड़ा हुआ है.
इस मेनिफेस्टो में एक कड़ा राजनीतिक संदेश भी छिपा है. बनर्जी ने इसकी लॉन्चिंग का इस्तेमाल बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार की तीखी आलोचना करने के लिए किया. उन्होंने आरोप लगाया कि बंगाल की प्रशासनिक स्वायत्तता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कमजोर करने की कोशिशें हो रही हैं. दस्तावेज दावा करता है कि केंद्र ने मनरेगा (MGNREGA), ग्रामीण आवास और पीने के पानी जैसी योजनाओं के लगभग 2 लाख करोड़ रुपए के बकाए रोक रखे हैं. यह बीजेपी पर वोटर लिस्ट के 'स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन' (SIR) जैसी कवायदों के जरिए बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को खत्म करने और वोटरों को उनके अधिकारों से वंचित करने का भी आरोप लगाता है. इस तरह यह चुनाव को लोकतंत्र और संघवाद की एक बड़ी लड़ाई के रूप में पेश करता है.
बुनियादी तौर पर देखें तो, 'सेवाश्रय' से 'दुआरे चिकित्सा' तक का यह सफर तृणमूल कांग्रेस के बदलते गवर्नेंस मॉडल को दिखाता है. प्रोग्राम्स को पहले 'लक्षित दखल' के जरिए टेस्ट किया जाता है, फिर राजनीतिक और प्रशासनिक फीडबैक के जरिए उन्हें निखारा जाता है, और आखिर में उन्हें एक स्थाई तंत्र के रूप में बड़े पैमाने पर लागू कर दिया जाता है.
व्यवहारिक रूप से इसका मतलब यह है कि मेडिकल आउटरीच, जो कभी खास राजनीतिक पहलों पर निर्भर था, अब गवर्नेंस का एक रूटीन हिस्सा बन सकता है. राजनीतिक मायनों में, यह पार्टी की उस दलील को मजबूत करता है कि 'वेलफेयर' कोई ठहरी हुई चीज नहीं है; इसका लगातार विस्तार किया जाता है, इसे वक्त के हिसाब से ढाला जाता है और इसे एक सिस्टम बना दिया जाता है. जैसे-जैसे राज्य चुनाव की तरफ बढ़ रहा है, 'दुआरे चिकित्सा' सिर्फ एक नीतिगत प्रस्ताव से कहीं बढ़कर है. यह एक ऐसी रणनीति को दिखाता है जहां गवर्नेंस को 'पहुंच, डिलीवरी और विजिबिलिटी' से परिभाषित किया जाता है, और जहां पायलट प्रोजेक्ट्स को पूरे राज्य के लिए किए गए वादों में बदल दिया जाता है.