घोषणापत्र कैसे बने तमिलनाडु की राजनीति का सबसे बड़ा हथियार?

तमिलनाडु में पार्टियों के घोषणापत्र न केवल वादों की सूची पेश करते हैं, बल्कि शासन और राज्य की जिम्मेदारी को सक्रिय रूप से आकार भी देते हैं

DMK का घोषणापत्र जारी करते मुख्यमंत्री एमके स्टालिन

तमिलनाडु में चुनाव घोषणापत्र कभी भी महज कागजी औपचारिकता नहीं रहे हैं. उन्होंने राजनीतिक पटकथा के रूप में काम किया है. ये ऐसे दस्तावेज हैं जो न केवल वादों की सूची पेश करते हैं, बल्कि शासन और राज्य की जिम्मेदारी के अर्थ को सक्रिय रूप से आकार देते हैं. 

दशकों से राज्य में घोषणापत्रों ने वैचारिक आग्रह, जन-कल्याण के ब्लूप्रिंट और राजनीतिक जवाबदेही के औजार के रूप में काम किया है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अक्सर चुनाव के नैरेटिव (विमर्श) को परिभाषित किया है.

1950 के दशक के वैचारिक मंथन से लेकर 1967 के बड़े राजनीतिक बदलाव तक, और 20वीं सदी के अंत में कल्याणकारी योजनाओं की मजबूती से लेकर 2026 में उभरती तकनीकी महत्वाकांक्षाओं तक, ये घोषणापत्र एक ऐसा निरंतर सूत्र प्रदान करते हैं जिसके माध्यम से राज्य की राजनीतिक कल्पना को समझा जा सकता है.

1952 और 1957 के चुनावों के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि तमिलनाडु की घोषणापत्र वाली राजनीति एक गहरे वैचारिक संदर्भ से उभरी थी. यह दौर जाति-विरोधी आंदोलनों, भाषाई अस्मिता और संघीय मांगों से प्रभावित था. इन शुरुआती घोषणापत्रों ने एक स्पष्ट राजनीतिक नजरिया पेश किया. उन्होंने भारतीय संघ के भीतर राज्यों के लिए अधिक शक्तियों की मांग की, हिंदी थोपने का विरोध किया और सामाजिक न्याय को मुख्य सिद्धांत के रूप में सामने रखा. तब शिक्षा को केवल एक सेवा के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के एक उपकरण के रूप में देखा गया था.

केंद्र के प्रभुत्व का विरोध भी उतना ही प्रमुख था. घोषणापत्रों में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया कि शासन में क्षेत्रीय आकांक्षाओं, भाषाई पहचान और स्थानीय जरूरतों की झलक मिलनी चाहिए.

1957 तक, जिस वर्ष द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने पहली बार किसी बड़े चुनाव में हिस्सा लिया, एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दिया. वैचारिक दावों के साथ-साथ, घोषणापत्रों में शासन के तत्वों को भी शामिल किया जाने लगा: जैसे कीमतों में स्थिरता, आवश्यक वस्तुओं तक पहुंच और रोजमर्रा के आर्थिक जीवन में सरकार की भूमिका. यह उस बदलाव के शुरुआती चरण थे जो तमिलनाडु के राजनीतिक मॉडल का केंद्र बनने वाला था: यानी विचारधारा को कार्यक्रमों में बदलना.

यहीं से DMK ने अपनी वह ताकत विकसित करनी शुरू की जो आगे चलकर उसकी पहचान बनी: अमूर्त राजनीतिक सिद्धांतों को ठोस नीतिगत प्रतिबद्धताओं में बदलने की क्षमता.

तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव 1967 में आया. इस चुनाव ने न केवल सरकारें बदलीं, बल्कि राज्य की राजनीति के व्याकरण को ही बदल दिया. सामाजिक न्याय, तमिल पहचान और हिंदी थोपने के विरोध पर केंद्रित DMK का घोषणापत्र केवल नीतियों की रूपरेखा तक सीमित नहीं था. इसने चुनाव को ही गरिमा, पहचान और संघीय स्वायत्तता पर एक जनमत संग्रह के रूप में पेश कर दिया. 1950 के दशक के वैचारिक सूत्रों को अब एक ऐसे विशाल चुनावी कार्यक्रम में पिरो दिया गया था, जो विविध सामाजिक समूहों को एकजुट करने में सक्षम था.

इसका परिणाम निर्णायक रहा. 1967 के चुनाव ने तमिलनाडु में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रभुत्व को खत्म कर दिया और द्रविड़ पार्टियों को राज्य की राजनीति के मुख्य केंद्र के रूप में स्थापित किया. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने इस विचार को संस्थागत रूप दिया कि घोषणापत्र न केवल नीतिगत एजेंडे को, बल्कि राजनीतिक चेतना को भी आकार दे सकते हैं.

इस चरण में, जो वैचारिक पुनर्वितरण के रूप में शुरू हुआ था, वह भौतिक पुनर्वितरण में बदल गया और जन-कल्याण तमिलनाडु के राजनीतिक ढांचे का एक केंद्रीय हिस्सा बन गया.

2000 के दशक तक, राज्य का कल्याणकारी मॉडल इसके शासन के तरीके की एक खास पहचान बन गया था. इन उपायों ने राज्य की जिम्मेदारी की बढ़ती समझ को दर्शाया, विशेष रूप से रोजमर्रा की आर्थिक कमजोरियों को दूर करने के मामले में. जैसा कि पिछले घोषणापत्रों की निरंतरता से पता चलता है, ये पहल कोई अलग-थलग कदम नहीं थे, बल्कि सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के व्यापक प्रयास का हिस्सा थे.

तमिलनाडु में कल्याणकारी योजनाओं ने लगातार महिलाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को निशाना बनाया है और उन्हें प्रत्यक्ष व ठोस सहायता प्रदान की है. चाहे वह रियायती भोजन हो, वित्तीय सहायता हो या आवश्यक वस्तुओं तक पहुंच, इन योजनाओं ने राज्य की जिम्मेदारी के विचार को आम आदमी की राहत में बदल दिया है.

2021 के चुनावों में एक महत्वपूर्ण विकास हुआ. DMK ने अपने घोषणापत्र को केवल वादों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे दस्तावेज के रूप में पेश किया जिसे लागू किया जाएगा और जिसका मूल्यांकन होगा. अगले पांच वर्षों के दौरान, पार्टी ने बार-बार अपनी पूरी की गई प्रतिबद्धताओं को रेखांकित किया, विशेष रूप से महिलाओं पर केंद्रित योजनाओं में. यह 'वादा करने' से 'वादा निभाने के ट्रैक रिकॉर्ड' की ओर एक बड़ा बदलाव था.

2026 का चुनाव इस प्रणाली की परिपक्वता और इसकी सीमाओं, दोनों को दिखाता है. अब DMK और AIADMK दोनों एक ही तरह के कल्याणकारी ढांचे के भीतर काम कर रहे हैं और लगभग एक जैसी प्रतिबद्धताएं जता रहे हैं.

दशकों की घोषणापत्र प्रतिस्पर्धा ने यह परिणाम दिया है. लगातार कल्याणकारी वादों का विस्तार करके, पार्टियों ने प्रभावी रूप से उनका मानकीकरण कर दिया है. अब मतदाता यह मानकर चलते हैं कि सत्ता में कोई भी पार्टी हो, उन्हें एक निश्चित स्तर तक सरकारी सहायता मिलेगी ही.

नतीजतन, अब मुकाबले का मैदान बदल रहा है. चूंकि तत्काल मिलने वाले लाभों पर दोनों दल लगभग एक समान हैं, इसलिए पार्टियों को अपनी विश्वसनीयता, शासन क्षमता और दीर्घकालिक विजन के माध्यम से खुद को अलग साबित करना होगा. खासकर टेक्नोलॉजी, रोजगार और आर्थिक बदलाव जैसे क्षेत्रों में.

उदाहरण के लिए, DMK के घोषणापत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए एक समर्पित खंड है. यह शासन और आर्थिक योजना में उभरती प्रौद्योगिकियों को शामिल करने का एक स्पष्ट प्रयास है. हालांकि, AI को किसी अलग या विघटनकारी एजेंडे के रूप में पेश करने के बजाय, इसे कौशल विकास, उच्च शिक्षा और औद्योगिक विकास के व्यापक ढांचे के भीतर रखा गया है. 

AI को द्रविड़ मॉडल से अलग नहीं, बल्कि उसके अगले चरण के रूप में देखा जा रहा है: एक ऐसा उपकरण जो विकास को बनाए रखने, शासन की दक्षता में सुधार करने और सेवाओं को बेहतर बनाने में मदद करेगा, जबकि पुराना कल्याणकारी ढांचा भी साथ-साथ बना रहेगा.

घोषणापत्र समिति की अध्यक्ष के रूप में, DMK सांसद कनिमोझी ने इसे "जनता का घोषणापत्र" बताया है. यह विभिन्न सामाजिक समूहों के साथ निरंतर जुड़ाव के माध्यम से बनाया गया है और इसे पूरा करने की उम्मीदों पर आधारित है. उनकी बात तमिलनाडु की चुनावी राजनीति में इस दस्तावेज की केंद्रीयता को दर्शाती है: "घोषणापत्र किसी भी चुनाव का नायक (हीरो) होता है. इस बार यह नायिका (हीरोइन) होगी." यह फ्रेमिंग घोषणापत्र को केवल वादों के समूह के रूप में नहीं, बल्कि अभियान के मुख्य विमर्श के रूप में रखती है, जिसमें महिला-केंद्रित कल्याण और राजनीतिक एकजुटता पर विशेष जोर है.

1952 की वैचारिक स्पष्टता से लेकर 1957 के कार्यक्रम संबंधी बदलाव तक, और 1967 के परिवर्तनकारी आंदोलन से लेकर उसके बाद बने कल्याणकारी ढांचे तक, तमिलनाडु के राजनीतिक इतिहास को उसके घोषणापत्रों के माध्यम से समझा जा सकता है.

इन दस्तावेजों ने पीढ़ियों से राजनीतिक पहचान को परिभाषित किया है, कल्याणकारी प्रणालियों को तैयार किया है, जवाबदेही के तंत्र बनाए हैं और मतदाताओं की उम्मीदों को आकार दिया है.

2026 में, घोषणापत्र अब केवल वादों पर मुकाबला नहीं कर रहे हैं. वे विश्वसनीयता, निरंतरता और एक लंबी व विकसित होती राजनीतिक परंपरा पर अपना दावा पेश करने के लिए होड़ कर रहे हैं.

यह विचार कि घोषणापत्र राजनीति का हिस्सा मात्र नहीं बल्कि उसका केंद्र है- द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की सबसे स्थाई विरासतों में से एक है.

और जैसे-जैसे तमिलनाडु हिंदी विरोधी आंदोलनों की अपनी विरासत को आगे बढ़ाते हुए AI जैसी आधुनिक आकांक्षाओं को अपना रहा है, यह स्पष्ट है कि घोषणापत्र न केवल इरादे के दस्तावेज के रूप में, बल्कि राज्य के राजनीतिक भविष्य के ब्लूप्रिंट के रूप में काम करता रहेगा.

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