लखनऊ में क्यों नहीं गूंज पाया अविमुक्तरेश्वरानंद का 'धर्मयुद्ध शंखनाद'

लखनऊ में 11 मार्च को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का 'धर्मयुद्ध शंखनाद' के नाम से आयोजित कार्यक्रम फीका रहा लेकिन इस दौरान उन्होंने एक और बड़े आंदोलन की घोषणा कर दी

स्वामी अवमुक्तेश्वरानंद की गौ रक्षा यात्रा शुरू. (File Photo: ITG)
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (फाइल फोटो)

लखनऊ के कांशीराम स्मृति स्थल पर 11 मार्च को आयोजित “धर्म युद्ध शंखनाद” कार्यक्रम से जिस बड़े धार्मिक-सामाजिक आंदोलन की शुरुआत की उम्मीद की जा रही थी, वह ज़मीन पर उस रूप में दिखाई नहीं दी. मंच सजा था, कुर्सियां लगी थीं, विपक्षी नेताओं की मौजूदगी भी थी और सरकार के खिलाफ तीखे बयान भी दिए गए, लेकिन भीड़ उम्मीद से काफी कम रही.  

यह कार्यक्रम फीके रहने पर कई सवाल उठ रहे हैं क्योंकि कार्यक्रम ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की अगुवाई में हो रहा था और उनको विपक्ष का पूरा समर्थन था. इस दौरान उन्होंने न केवल गोरक्षा के मुद्दे पर बड़ा आंदोलन छेड़ने की घोषणा की बल्कि सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनौती भी.

शंकराचार्य ने इस मौके पर घोषणा की कि वे 3 मई से मुख्यमंत्री गृह जिले गोरखपुर से 81 दिन की 'गविष्ठी यात्रा' निकालेंगे. गविष्ठी दो शब्दों से मिलकर बना - गो (गाय) और इष्टि (खोज या युद्ध). इस तरह गविष्ठी का मतलब हुआ गायों की खोज या उनके लिए युद्ध. 

सभा के दौरान स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने गाय को “राष्ट्र माता” घोषित करने और गोहत्या पर सख्त कानून बनाने की मांग दोहराई. उन्होंने कहा कि 52 दिन की तैयारी के बाद 3 मई से गोरखपुर से यात्रा शुरू होगी और 23 जुलाई को वहीं समाप्त होगी. इस दौरान साधु-संत और समर्थक उत्तर प्रदेश के गांव-गांव जाकर गोरक्षा के लिए जनजागरण करेंगे. लेकिन जिस कार्यक्रम को आंदोलन की शुरुआत माना जा रहा था, वही अपने शुरुआती चरण में अपेक्षित ऊर्जा पैदा नहीं कर पाया. 

सभा में भीड़ कम होने पर अविमुक्तेश्वरानंद ने इसे अलग अंदाज में समझाने की कोशिश की. उन्होंने कहा कि बड़ी भीड़ “शराब की दुकान पर लगती है, दूध की दुकान पर नहीं”, इसलिए कम लोग होना इस बात का संकेत है कि यहां “शुद्ध काम” हो रहा है. इसके बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी घोषणा के बावजूद सीमित जनसमर्थन कई सवाल खड़े करता है.

दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम पिछले दो महीनों से चल रहे उस विवाद की कड़ी है, जिसमें स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और योगी सरकार आमने-सामने दिखाई दे रहे हैं. जनवरी में प्रयागराज में माघ मेले के दौरान मौनी अमावस्या पर त्रिवेणी संगम में स्नान को लेकर प्रशासन के साथ उनका टकराव हुआ था. इसके बाद प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने उनसे ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य पद के उपयोग को लेकर भी सवाल पूछे थे. इसी पृष्ठभूमि में स्वामी ने मुख्यमंत्री को 40 दिन का अल्टीमेटम देते हुए दो प्रमुख मांगें रखीं- उत्तर प्रदेश में गाय को “राज्य माता” का दर्जा दिया जाए और बीफ निर्यात पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाए. 

जब इन मांगों पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई तो उन्होंने राज्यव्यापी आंदोलन का ऐलान कर दिया. 7 मार्च से वे वाराणसी से लखनऊ तक यात्रा करते हुए पहुंचे और कांशीराम स्मृति स्थल पर सभा की. हालांकि पुलिस ने कार्यक्रम की अनुमति दी, लेकिन 16 शर्तों के साथ. इन शर्तों में भड़काऊ भाषण न देने, किसी समुदाय या धर्म के खिलाफ टिप्पणी से बचने, ट्रैफिक बाधित न करने और लाउडस्पीकर के सीमित इस्तेमाल जैसे नियम शामिल थे.

स्वामी के समर्थकों ने इन शर्तों को लेकर भी नाराजगी जताई. उनके प्रवक्ता संजय पांडे ने कहा कि अनुमति तो दी गई है, लेकिन शर्तें ऐसी हैं कि “स्वामी जी को बोलने ही नहीं दिया जाएगा.” वहीं पुलिस का कहना था कि यह सामान्य प्रक्रिया है और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसी शर्तें जरूरी होती हैं. लेकिन लखनऊ की सभा में कम भीड़ के पीछे सिर्फ प्रशासनिक शर्तें ही वजह नहीं मानी जा रहीं. 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि गोरक्षा का मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहले से ही एक स्थापित विमर्श है और इस पर सबसे मजबूत राजनीतिक पकड़ खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मानी जाती है. ऐसे में इसी मुद्दे पर सरकार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करना आसान नहीं है. लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर दुर्गेश श्रीवास्तव का कहना है कि गोरक्षा का सवाल उत्तर प्रदेश में दशकों से मौजूद है, लेकिन इसे बड़े जनांदोलन में बदलना मुश्किल होता है. उनके मुताबिक, “जब सत्ता में पहले से ही एक ऐसी सरकार हो जो खुद को हिंदुत्व और गोरक्षा के एजेंडे से जोड़ती है, तो उसी मुद्दे पर उसके खिलाफ जनसमर्थन जुटाना स्वाभाविक रूप से कठिन हो जाता है.” 

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की “गविष्ठी यात्रा” की घोषणा का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि उन्होंने यात्रा की शुरुआत के लिए गोरखपुर को चुना है, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक कर्मभूमि है. गोरखपुर न सिर्फ योगी की संसदीय सीट रहा है बल्कि गोरखनाथ मठ की वजह से धार्मिक-राजनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह चयन प्रतीकात्मक होने के साथ-साथ राजनीतिक संदेश भी देता है. राजनीतिक विश्लेषक डॉ. अजय कुमार कहते हैं, “गोरखपुर से यात्रा शुरू करने का मतलब सीधे योगी आदित्यनाथ के प्रभाव क्षेत्र में चुनौती देना है. यह सिर्फ धार्मिक अभियान नहीं बल्कि राजनीतिक संकेत भी है कि स्वामी सरकार की नीतियों से असहमत हैं.” 

हालांकि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद खुद लगातार यह कहते रहे हैं कि उनका आंदोलन राजनीतिक नहीं है. उनका कहना है कि संतों का काम सत्ता चलाना नहीं बल्कि शासकों को सही रास्ता दिखाना है. उन्होंने यहां तक कहा कि अगर कोई राजा गलत दिशा में जाता है तो संतों को उसका “कान पकड़कर सही रास्ते पर लाना चाहिए.” फिर भी उनके कार्यक्रम में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के नेताओं की मौजूदगी ने इस आंदोलन को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं. उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और समाजवादी पार्टी के विधायक रविदास मल्होत्रा समेत विपक्ष के कई नेता इस कार्यक्रम में शामिल हुए. 

अगले दिन 11 मार्च को सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अविमुक्तरेश्वरानंद सरस्वती से मिलने पहुंचे. इससे BJP समर्थक वर्ग में यह धारणा मजबूत हुई कि शंकराचार्च का आंदोलन कहीं न कहीं विपक्ष के राजनीतिक एजेंडे से जुड़ता जा रहा है. राजनीतिक विश्लेषक इस मुद्दे पर बंटे हुए हैं. कुछ का मानना है कि विपक्ष धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल करके योगी सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है. लखनऊ में कान्यकुब्ज कालेज में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रोफेसर ब्रजेश मिश्र कहते हैं, “उत्तर प्रदेश में BJP की सबसे बड़ी ताकत उसका हिंदुत्व नैरेटिव है. अगर कोई धार्मिक नेता उसी नैरेटिव के भीतर रहकर सरकार पर सवाल उठाता है, तो विपक्ष स्वाभाविक रूप से उसे समर्थन देगा.”

दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ इस आरोप को अतिशयोक्ति मानते हैं. उनके अनुसार, संत-समाज का सत्ता से टकराव नया नहीं है और इसे सीधे विपक्ष की राजनीति से जोड़ना सही नहीं होगा. धर्म और समाज पर अध्ययन करने वाले शोधकर्ता डॉ. मनीष पांडे का कहना है, “भारत में धार्मिक परंपरा में संतों द्वारा सत्ता की आलोचना का इतिहास रहा है. यह जरूरी नहीं कि हर विरोध किसी राजनीतिक दल के इशारे पर हो.”

फिर भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या यह आंदोलन वास्तव में जनाधार बना पाएगा. लखनऊ की सभा में सीमित भीड़ इस बात का संकेत देती है कि जमीन पर समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा. उत्तर प्रदेश में पहले से ही कई बड़े धार्मिक संगठन और अखाड़े सक्रिय हैं, जिनमें से कई सरकार के साथ संतुलित संबंध बनाए रखते हैं. स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने अपने भाषण में 'सरकारी संतों' पर भी तीखा हमला किया और कहा कि समाज को ऐसे संतों की जरूरत है जो सत्ता के बजाय जनता के साथ खड़े हों. उन्होंने 'शंकराचार्य चतुरंगिनी' नाम से एक नई संगठनात्मक संरचना बनाने की भी घोषणा की, जिसे उन्होंने साधुओं और अनुयायियों की एक 'संगठित सेना' बताया. उन्होंने यह भी कहा कि अगर अखाड़े उनके रुख का समर्थन नहीं करते हैं तो उन्हें अपनी अलग संरचना बनानी पड़ेगी. 

हालांकि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के कई नेताओं ने अब तक इस आंदोलन को लेकर खुला समर्थन नहीं दिया है, जिससे इसकी व्यापकता को लेकर संदेह बना हुआ है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह अभियान धार्मिक आंदोलन बनता है या सीमित दायरे में ही रह जाता है. 3 मई से शुरू होने वाली 81 दिन की यात्रा अगर वास्तव में गांव-गांव तक पहुंचती है तो यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया विमर्श भी पैदा कर सकती है. लेकिन फिलहाल लखनऊ की सभा ने यह संकेत जरूर दिया है कि बड़े घोषणाओं और तीखे बयानों के बावजूद जनसमर्थन जुटाना आसान नहीं है. 

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