हिल स्टेशन माथेरान में पैदल घूमना हुआ खतरनाक! घोड़े कैसे फैला रहे प्रदूषण?

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के एक पैनल ने NGT को सूचित किया है कि अनोखे माथेरान हिल स्टेशन में घोड़ों के कारण प्रदूषण फैल रहा है

हिल स्टेशन माथेरान पर घोड़े की सवारी (फाइल फोटो)
हिल स्टेशन माथेरान पर घोड़े की सवारी (फाइल फोटो)

महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) की एक संयुक्त समिति ने अपनी रिपोर्ट में हिल स्टेशन माथेरान में तेजी से फैल रहे प्रदूषण का जिक्र किया है. इस रिपोर्ट के मुताबिक, घोड़े के गोबर के कारण यहां का मिट्टी, पानी और वायु प्रदूषित हो रहे हैं.

मुंबई से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित माथेरान की स्थापना ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने 1850 के दशक में की थी. इस कस्बे में एंबुलेंस और अग्निशमन जैसी आपातकालीन सेवाओं को छोड़कर ईंधन से चलने वाले किसी भी तरह के वाहनों की एंट्री पर रोक है.

माथेरान की चढ़ाई शुरू करने से पहले पर्यटकों को अपने वाहन दस्तूरी नाका पर पार्क करने होते हैं, जो लगभग पहाड़ी से करीब 3 किलोमीटर दूर है. यह हिल स्टेशन एक पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) है. यहां रहने वाले स्थानीय निवासियों और पर्यटकों के परिवहन के लिए 74 हाथ से खींचे जाने वाला रिक्शा, 460 घोड़े और एक नैरो-गेज 'टॉय ट्रेन' शामिल हैं. इस टॉय ट्रेन को नेरल से माथेरान तक 20 किलोमीटर की दूरी तय करने में करीब दो घंटे लगते हैं.

सामान और अन्य आवश्यक वस्तुओं को ढोने के लिए यहां 127 लाइसेंस प्राप्त कुलियों को इजाजत दी गई है. वहीं, 200 से अधिक टट्टुओं की मदद से भी सामान पहाड़ी पर लाया जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने यहां फिलहाल 20 ई-रिक्शाओं को चलने की अनुमति दी है.

कुछ स्थानीय निवासियों की शिकायत है कि मोटर चालित परिवहन की सीमाओं के कारण, माथेरान के छात्रों को लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है. इसके कारण उन्हें काफी शारीरिक मेहनत करनी होती है, जिससे पढ़ाई के लिए उनके पास समय और ऊर्जा की कमी हो जाती है.

वृद्ध, दिव्यांग और अस्वस्थ लोगों को भी अपनी आवाजाही सीमित करनी पड़ती है या अपने घरों में ही रहना पड़ता है. हालांकि, कुछ अन्य लोगों को आशंका है कि ई-वाहनों के आने से अन्य प्रकार के मोटर चालित वाहनों के लिए भी रास्ता खुल सकता है. माथेरान निवासी और सेवानिवृत्त शिक्षक सुनील शिंदे ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) में अपनी याचिका में दावा किया था कि घोड़े के गोबर से पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचता है. इसके कारण होने वाले प्रदूषण से लोगों के स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.

30 जनवरी को महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) के जरिए बनाए गई संयुक्त समिति ने सुनवाई के दौरान पुणे में NGT को अपनी रिपोर्ट सौंपी. इस समिति की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि माथेरान हिल स्टेशन पर पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र में घोड़े की सवारी के कारण पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है. घोड़ों के गोबर से इस पूरे इलाके में प्रदूषण फैल रहा है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि माथेरान की वायु गुणवत्ता, पीने के पानी के स्रोतों, मिट्टी और पारिस्थितिक तंत्र की प्रभावी सुरक्षा केवल नदी के निचले हिस्से की सफाई से हासिल नहीं की जा सकती. इसमें आगे कहा गया है कि इस हिल स्टेशन को अगर प्रदूषण से बचाना है तो यहां घोड़ों की सवारी को लेकर सख्त नियम बनाने की जरूरत है. 

घोड़ों की संख्या में चरणबद्ध कमी पर योजना बनाने की जरूरत है. माथेरान एक पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्र है. ऐसे में इसकी सीमा से बाहर अस्तबल बनाया जाना चाहिए और साथ ही घोड़े के रास्तों को अलग-अलग जोन में बांटकर उसकी सफाई और निगरानी करने की जरूरत है.

इतना ही नहीं इस क्षेत्र में पीने के पानी वाले स्रोतों की सुरक्षा के लिए भी एक मजबूत योजना बनाने की जरूरत है. इन योजनाओं पर तीन से पांच वर्षों तक निरंतर निगरानी के जरिए ही प्रदूषण की समस्या को कम किया जा सकता है.  

रिपोर्ट में कहा गया है, “अगर समिति की सिफारिशों को लागू किया जाता है, तो माथेरान पर्यावरण पर्यटन का एक राष्ट्रीय मॉडल बन सकता है. इसके लिए जरूरी है कि यहां केवल पैदल चलने वाली पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन व्यवस्था हो, जो पूरी तरह सावधानी के सिद्धांत और इसकी क्षमता के मुताबिक ही पर्यटकों को यहां आने की इजाजत दे. इतना ही नहीं पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र के नियमों के भी अनुरूप हो."

साथ ही रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर इस दिशा में कदम नहीं उठाए गए, तो धीरे-धीरे और शायद स्थायी रूप से यहां के पर्यावरण का नुकसान होगा. इससे इस हिल स्टेशन की सेहत के साथ-साथ पर्यटन अर्थव्यवस्था को भी गहरा नुकसान पहुंचेगा.

NGT ने इस पूरे मामले में घोड़े पालने वालों के संगठन मुलवासी अश्वपाल संगठन, स्थानिक अश्वपाल संगठन और स्थानिक अश्वल संगठन के वकीलों को अपनी बात रखने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है. NGT ने कहा, “इस हिल स्टेशन पर मानसून से पहले, मानसून के दौरान और मानसून के बाद वायु गुणवत्ता का आकलन किया गया था, जिससे पता चलता है कि PM10 और PM2.5 का स्तर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के मानकों से अधिक था. 

इसका मूल कारण घोड़ों का गोबर करना और कच्ची सड़कों से उड़ने वाली धूल है. सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) जैसे प्रदूषक नियंत्रण में हैं, जिससे यह साफ होता है कि माथेरान का वायु प्रदूषण औद्योगिक नहीं बल्कि एक वाहन-मुक्त लेकिन घोड़ों पर निर्भर पारिस्थितिकी तंत्र की अनूठी चुनौती है.”

NGT ने जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा, “जल प्रदूषण के संबंध में यह पाया गया है कि पांच स्थलों (WS1 से WS5) से एकत्र किए गए नमूनों में, झील स्थलों (WS1-WS3) में ई. कोलाई की मात्रा 5-10 CFU/100 mL थी, जबकि नदी स्थल WS4 पर यह 25 CFU तक और स्थिर सिम्पसन टैंक WS5 पर 100 CFU तक थी. 

ये मात्राएं पेयजल मानकों का उल्लंघन करती हैं. भारतीय मानक ब्यूरो और विश्व स्वास्थ्य संगठन दोनों के मुताबिक, 100 mL में 0 CFU होना चाहिए. ई. कोलाई की उपस्थिति मल प्रदूषण की पुष्टि करती है, जो लगभग निश्चित रूप से घोड़े के गोबर से हुआ है.”  

साथ ही NGT ने कहा, “मिट्टी के प्रदूषण की अगर बात करें तो मानसून के दौरान मिट्टी गुणवत्ता मूल्यांकन से पता चलता है कि माथेरान में घोड़ों की गतिविधि बरसात के मौसम में पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा पैदा करती है. मिट्टी में मल संकेतक बैक्टीरिया और सैल्मोनेला काफी ज्यादा मात्रा में पाए गए हैं.”

हालांकि, घोड़ों के मालिकों के संगठन, मुलवासी अश्वपाल संघटना के सदस्य लाहु शिंगाडे ने अपनी आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा, “हम तीन-चार पीढ़ियों से घोड़े पाल रहे हैं.”

शिंगाडे ने आगे कहा कि माथेरान एक संरक्षित क्षेत्र होने के बावजूद, वहां अवैध लॉजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. कई होटल अपना सीवेज सीधे जल निकायों में बहा रहे हैं. उन्होंने सवाल उठाया कि जब घोड़ों के मालिकों को निशाना बनाया जा रहा है तो इस पर आपत्ति क्यों नहीं जताई जा रही है. हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि दस्तूरी नाका पर घोड़ों का गोबर साफ करना जरूरी है.

माथेरान का विकास ब्रिटिश शासनकाल में हुआ था. मई 1850 में ठाणे के जिला कलेक्टर ह्यू पॉयंट्ज़ मैलेट को पश्चिमी घाट में एक रमणीय स्थान दिखाई दिया, जिसे धीरे-धीरे एक हिल स्टेशन के रूप में विकसित किया गया. 

लोककथाओं के अनुसार, इस कस्बे का नाम माथेरान तब पड़ा जब एक ग्रामीण ने मराठी में मैलेट से कहा, 'माथे रान हाय' यानी ऊपर जंगल है. धीरे-धीरे ब्रिटिश और औपनिवेशिक अभिजात वर्ग मुंबई की भीषण गर्मी से बचने के लिए माथेरान का उपयोग करने लगे. स्वतंत्रता के बाद भी घरेलू पर्यटकों ने इस परंपरा को जारी रखा.

संरक्षित वन्यजीव आवासों के अलावा, माथेरान और महाबलेश्वर-पंचगनी के पहाड़ी क्षेत्र और गुजरात की सीमा से लगे पालघर के तटीय शहर दहानू को भी संरक्षित क्षेत्र (ESZ) घोषित किया गया है. 

4 फरवरी 2003 को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने माथेरान को ESZ घोषित किया था. इसने पर्यावरण पर हानिकारक प्रभाव डालने वाली औद्योगिक और विकासात्मक गतिविधियों पर रोक लगा दी थी.

MPCB ने अप्रैल 2025 में NGT को सौंपी गई एक रिपोर्ट में कहा था कि हिल स्टेशन पर यात्रा और आवागमन के लिए घोड़ों के उपयोग से पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा है. 2011 की जनगणना के मुताबिक, माथेरान की जनसंख्या 4,393 है, जो 2001 में 5,139 थी. हर साल लगभग 8 लाख पर्यटक माथेरान आते हैं. मानसून के मौसम में भी इस पहाड़ी क्षेत्र में पर्यटन काफी लोकप्रिय हो रहा है.

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