जेल जाने से घोसी जीतने तक क्या है सुधाकर सिंह की कहानी?

घोसी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार को हराने वाले सपा नेता सुधाकर सिंह 20 साल की उम्र में छात्रसंघ के अध्यक्ष बन गए थे और तब से वे राजनीति कर रहे हैं

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ सुधाकर सिंह
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ सुधाकर सिंह

कहावत है कि पूत के पांव पालने में दिखाई देने लगते हैं. घोसी विधानसभा उपचुनाव में भाजपा के हाई प्रोफाइल प्रत्याशी दारा सिंह चौहान को धूल चटाने वाले सपा उम्मीदवार सुधाकर सिंह पर यह कहावत बिल्कुल फिट बैठती है. महज 16 साल की उम्र में सुधाकर सिंह ने कुछ ऐसा किया कि उसी दिन हर कोई समझ गया था कि ये कहानी यहीं नहीं रुकने वाली.

मऊ जिले के घोसी में एक गांव है दादनपुर अहरौली. जहां एक किसान परिवार में सुधाकर सिंह का जन्म हुआ. 11 नवंबर, 1958 को जन्मे सुधाकर बचपन से ही जुझारू तेवर रखते थे. शुरुआती शि‍क्षा गांव के ही प्राइमरी स्कूल से ही पूरी करने के बाद उन्होंने सर्वोदय डिग्री कालेज, घोसी (मऊ) से इं‍टरमीडिएट किया. इसी दौरान वे समाजवादी नेताओं से प्रभावित होकर छात्रों और किसानों के लिए आवाज उठाने लगे थे.

जून, 1975 में जब देश में आपातकाल लगा था तब उस वक्त 16 वर्ष की उम्र में सुधाकर समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 19 महीना, 18 दिन जेल में बंद रहे थे. जेल से छूटने के बाद वे छात्रों के बीच नायक बनकर उभरे. साल 1978 में सुधाकर सर्वोदय डिग्री कॉलेज, घोसी के छात्रसंघ अध्यक्ष चुने गए. इसके बाद वाराणसी के महाराजा बलवंत सिंह पीजी कॉलेज, राजा तालाब वाराणसी में छात्रसंघ महामंत्री चुने गए. स्नातकोत्तर करने के दौरान वर्ष 1983 में सुधाकर शिबली नेशनल कालेज, आजमगढ़ में छात्रसंघ अध्यक्ष निर्वाचित हुए.

सुधाकर सिंह ने सक्रिय चुनावी राजनीति में प्रवेश वर्ष 1985 में किया. उन्होंने मऊ की नत्थूपुर विधानसभा सीट से लोकदल प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा लेकिन कुछ मतों से हार का सामना करना पड़ा. 1989 में वे निर्दलीय विधानसभा चुनाव लड़े. इस बार भी  भाग्य ने साथ नहीं दिया और वे 1000 से कम मतों से चुनाव हार गए. सुधाकर ने पहली बार चुनावी जीत का स्वाद 1996 में चखा जब उन्होंने विधानसभा चुनाव में तत्कालीन वरिष्ठ कांग्रेसी नेता कल्पनाथ राय की पत्नी सुधा राय को भारी मतों से हराया. इसके बाद दूसरी जीत का स्वाद पाने के लिए सुधाकर को डेढ़ दशक से अधिक का इंतजार करना पड़ा. वर्ष 2009 के बाद नत्थूपुर विधानसभा का नाम बदलकर घोसी कर दिया गया. सपा ने 2012 के विधानसभा चुनाव में सुधाकर को फिर से अपना उम्मीदवार बनाया, तब उन्होंने फागू चौहान को हराकर सीट जीती, जिन्होंने उस समय बसपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में मुख्तार अंसारी ने अपने संगठन कौमी एकता दल के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा था.

सुधाकर वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में फागू चौहान के खिलाफ चुनाव हार गए, जिन्होंने फिर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था. सुधाकर को दो साल बाद घोसी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में मौका मिला जब फागू ने बिहार के राज्यपाल के रूप में नियुक्ति के बाद सीट खाली कर दी थी. उपचुनाव में सुधाकर सपा के समर्थन से निर्दलीय उम्मीदवार थे. उन्हें सपा की ओर से आधिकारिक पत्र जारी करने में देरी की वजह से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ना पड़ा. हालांकि वे 1,773 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे. तब भाजपा के 30 वर्षीय कार्यकर्ता और उम्मीदवार विजय कुमार राजभर विजेता बने.

2022 के विधानसभा चुनाव में सुधाकर को चुनाव लड़ने का मौका नहीं मिला. असल में वे 2022 के विधानसभा चुनाव में भी घोसी से सपा की टिकट की दौड़ में थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने दारा सिंह चौहान पर भरोसा किया, जो तब भाजपा और योगी आदित्यनाथ मंत्रिमंडल छोड़कर सपा में शामिल हो गए थे. दारा 2017 में भाजपा के चुनाव चिन्ह पर मधुबन सीट से विधायक चुने गए थे, लेकिन 2022 में अपने निर्वाचन क्षेत्र में 'सत्ता विरोधी लहर' की आशंका के कारण घोसी चले गए. वे घोसी से सपा उम्मीदवार के तौर पर जीते थे.

समाजवादी पार्टी (सपा) में एक कार्यकर्ता और दो बार के विधायक के रूप में तीन दशक से अधिक लंबे कार्यकाल के बाद 64 वर्षीय सुधाकर सिंह 8 सितंबर को सुर्खियों में आ गए, जब उन्होंने भाजपा के हाई-प्रोफाइल ओबीसी उम्मीदवार दारा सिंह चौहान को हराया. उत्तर प्रदेश के मऊ जिले की घोसी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में सुधाकर सिंह को 42,759 वोटों से जीत मिली. राजपूत नेता, सुधाकर ने ऐसे समय में सपा के लिए सीट जीती जब पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव जाति जनगणना के अलावा 'पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक (पीडीए- पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक)' के सशक्तिकरण की वकालत कर रहे हैं.

स्थानीय सपा नेताओं के अनुसार, दारा की तुलना में सुधाकर उपचुनाव में घोसी के लोगों के लिए एक 'स्पष्ट पसंद' थे. मऊ के स्थानीय युवा सपा नेता इंद्रजीत यादव कहते हैं, "सुधाकर इलाके में किसी भी मदद के लिए हमेशा उपलब्ध रहते हैं. ऊंची जाति से आने वाले नेता होने के बावजूद वे दलितों और ओबीसी तक पहुंचते हैं. उनकी उपलब्धता और लोगों के साथ जुड़ाव ने उन्हें सत्तारूढ़ भाजपा के एक हाई-प्रोफाइल उम्मीदवार के खिलाफ जीतने में मदद की." सुधाकर सिंह के खि‍लाफ माहौल बनाने के लिए भाजपा सरकार के डेढ़ दर्जन मंत्री, सैकड़ों कार्यकर्ता घोसी विधानसभा सीट पर डेरा डाले रहे लेकिन सुधाकर की जनता के बीच अच्छी छवि से पार न पा सके.

जमीनी स्तर के सपा कार्यकर्ता के रूप में लंबे करियर के बावजूद, सुधाकर को अब तक पार्टी की राज्य और राष्ट्रीय इकाइयों में कोई पद नहीं मिला. हालांकि सपा के मऊ जिला अध्यक्ष दूधनाथ यादव के मुताबिक सुधाकर कई साल पहले मऊ में पार्टी के जिला अध्यक्ष थे. सुधाकर के सक्रिय राजनीतिक जीवन का असर उनके बेटों पर भी पड़ा है. सुधाकर के दो बेटे- अजीत प्रताप सिंह और सुजीत सिंह हैं. सुजीत सिंह ब्लॉक प्रमुख रहने के अलावा ब्लॉक प्रमुख संघ मऊ के अध्यक्ष भी रहे हैं. उनके चुनावी नामांकन हलफनामे के अनुसार, सुधाकर की आजीविका कृषि आय और 'लोकतंत्र सेनानी' पेंशन पर निर्भर करती है.

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