दादरी की रैली और मिहिर भोज की विरासत : सपा की नई सोशल इंजीनियरिंग
मिहिर भोज की विरासत के सहारे सपा का गुर्जर वोट बैंक साधने की कोशिश कर रही है. दादरी रैली से पश्चिमी यूपी में 2027 के लिए नई सामाजिक और राजनीतिक जमीन तैयार करने की रणनीति

समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने 29 मार्च को गौतमबुद्धनगर के दादरी में जिस तरह अपनी "समाजवादी समानता भाईचारा रैली" के लिए मिहिर भोज डिग्री कॉलेज के मैदान को चुना, वह महज एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं था. इसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की रणनीतिक शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है.
दादरी वही जगह है जहां 2021 में मिहिर भोज की प्रतिमा को लेकर गुर्जर और राजपूत समुदाय आमने-सामने आ गए थे. यह अब सपा की नई सामाजिक इंजीनियरिंग का मंच बनता दिख रहा है. इस चयन के जरिए अखिलेश यादव ने साफ संकेत दिया कि उनकी राजनीति अब केवल पारंपरिक यादव-मुस्लिम समीकरण तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जटिल जातीय और ऐतिहासिक पहचान को साधने की कोशिश करेगी.
मिहिर भोज: इतिहास से राजनीति तक
मिहिर भोज, गुर्जर-प्रतिहार वंश के 9वीं सदी के शक्तिशाली शासक माने जाते हैं. उनका साम्राज्य उत्तर भारत के बड़े हिस्से में फैला था और कन्नौज उनकी राजधानी रही. दिलचस्प बात यह है कि कन्नौज अखिलेश यादव का संसदीय क्षेत्र है और यह तथ्य भी मिहिर भोज की विरासत को आज की राजनीति में प्रासंगिक बनाता है.
पश्चिमी यूपी में मिहिर भोज की विरासत पहचान की राजनीति का केंद्र रही है. गुर्जर और राजपूत समुदाय दोनों ही उन्हें अपना पूर्वज मानते हैं. 2021 में जब दादरी में उनकी प्रतिमा का अनावरण हुआ, तो शिलालेख पर 'गुर्जर' शब्द के इस्तेमाल को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया. विरोध इतना बढ़ा कि प्रशासन को दखल देना पड़ा और मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया. अब उसी स्थल पर रैली करके सपा ने इस विवाद को एक नए राजनीतिक अवसर में बदलने की कोशिश की है.
गुर्जर वोट बैंक पर सपा की नजर
दादरी की रैली का सबसे अहम संदेश गुर्जर समुदाय की ओर था. पश्चिमी यूपी में गुर्जर 'किंगमेकर' की भूमिका निभाने वाला समुदाय माना जाता है. मेरठ के राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेंद्र शर्मा का कहना है, "गुर्जर और जाट ऐसी जातियां हैं जो अकेले चुनाव नहीं जिता सकतीं, लेकिन सत्ता के समीकरण तय करने में इनकी भूमिका अहम रहती है. हर पार्टी इन्हें अपने साथ रखना चाहती है." उनके मुताबिक, इस तरह की रैलियों का सीधा असर वोट ट्रांसफर में भले न दिखे, लेकिन ये माहौल बनाती हैं और दूसरे दलों पर दबाव डालती हैं. वे कहते हैं, "सपा इस रैली से यह संदेश देना चाहती है कि गुर्जर भी पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के साथ आ रहे हैं. इससे BJP पर भी दबाव बनेगा कि वह इस समुदाय को लेकर नई रणनीति बनाए."
BJP से नाराज गुर्जर, सपा के लिए मौका
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति पूरे राज्य की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाती है. यहां 130 से ज्यादा विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से कई पर जातीय समीकरण बेहद जटिल हैं. गुर्जर समुदाय को करीब 60 विधानसभा सीटों पर प्रभावी माना जाता है. दादरी, नोएडा, जेवर, लोनी, हस्तिनापुर, गंगोह, कैराना, सरधना और मेरठ दक्षिण जैसी सीटों पर इनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है.
2022 में सपा-रालोद गठबंधन ने कुछ जिलों- जैसे शामली, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर- में अच्छा प्रदर्शन किया था, लेकिन गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद और बुलंदशहर जैसे इलाकों में उसे संघर्ष करना पड़ा. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन ने बेहतर प्रदर्शन कर वापसी के संकेत जरूर दिए, लेकिन विधानसभा स्तर पर अभी भी काफी काम बाकी है.
प्रदेश में कुल 8 गुर्जर विधायक हैं जिनमें BJP के 5 विधायक हैं. तेजपाल नागर (दादरी), नंद किशोर गुर्जर (लोनी), सोमेंद्र तोमर (मेरठ), मुकेश चौधरी (सरसावा) और किरत सिंह (गंगोह) गुर्जर समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. बाकी तीन विधायक रालोद और सपा से हैं. गुर्जर समाज के नेता अशोक कटारिया, नरेंद्र भाटी और विरेंद्र सिंह यूपी विधान परिषद के सदस्य हैं. BJP के राज्यसभा सांसद सुरेंद्र नागर भी गुर्जर समुदाय से ही ताल्लुक रखते हैं.
हालांकि गुर्जर समाज के नेता आबादी के अनुपात में अपनी बिरादरी को कम प्रतिनिधित्व मिलने का आरोप लगा रहे हैं. मेरठ विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर रतनजीत सिंह बताते हैं, "राजनीतिक आवाज न होने के कारण गुर्जर समाज को जितनी भागीदारी मिलनी चाहिए, उतनी नहीं मिल पाती. यही वजह है कि बराबर आबादी होने के बावजूद जाट समुदाय को सरकार में अपेक्षाकृत अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है, वहीं गुर्जर समाज का केवल एक ही मंत्री सोमेंद्र तोमर प्रदेश सरकार में है."
पश्चिमी यूपी में BJP का गुर्जर चेहरा रहे चौधरी हुकुम सिंह लगातार प्रदेश कैबिनेट का हिस्सा रहे थे. BJP और बसपा की मिली-जुली सरकार के दौरान तीन गुर्जर नेताओं को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था. इसलिए गुर्जर सत्ता में पर्याप्त भागीदारी न मिलने से BJP से नाराज हैं और सपा उन्हें पर्याप्त हिस्सेदारी का भरोसा देकर लुभाने में जुटी है.
पश्चिमी यूपी में यादव की भरपाई गुर्जर वोट से
दादरी विधानसभा सीट सपा के लिए आसान नहीं रही है. 2022 के विधानसभा चुनाव में BJP के तेजपाल सिंह नागर ने यहां 2.18 लाख वोट (61 फीसदी से ज्यादा) हासिल कर भारी जीत दर्ज की थी. सपा के उम्मीदवार राजकुमार भाटी, जो खुद गुर्जर समुदाय से आते हैं, करीब 79,850 वोटों के साथ काफी पीछे रह गए थे. यह आंकड़ा रेखांकित करता है कि केवल जातीय पहचान के आधार पर वोट ट्रांसफर संभव नहीं है.
यही वजह है कि सपा अब 'प्रतीक + पहचान + राजनीतिक संदेश' के कॉम्बिनेशन पर काम कर रही है. राजकुमार भाटी इस बार रैली के प्रमुख आयोजकों में शामिल रहे, जो दिखाता है कि पार्टी स्थानीय नेतृत्व को सक्रिय कर रही है. अखिलेश यादव ने रैली में बार-बार 'पीडीए' यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ की बात दोहराई. उनका कहना था कि यह सिर्फ चुनावी नारा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दीर्घकालिक लड़ाई है. रैली में उन्होंने गुर्जर समाज के नायकों- मिहिर भोज, विजय सिंह पथिक और धनसिंह गुर्जर का उल्लेख कर यह संदेश देने की कोशिश की कि सपा इस समुदाय को सम्मान देने के लिए प्रतिबद्ध है.
यह रणनीति स्पष्ट रूप से सपा के पारंपरिक वोट बैंक के विस्तार की ओर इशारा करती है. पश्चिमी यूपी में यादव वोट अपेक्षाकृत कम हैं, ऐसे में पार्टी को नए सामाजिक आधार की जरूरत है. नोएडा के राजनीतिक विश्लेषक दिनेश मिश्र बताते हैं, "पश्चिमी यूपी में सपा के पास मजबूत यादव वोट बैंक नहीं है, इसलिए पार्टी गुर्जरों पर फोकस कर रही है ताकि अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत कर सके." हालांकि वे यह भी जोड़ते हैं कि गुर्जर वोट पूरी तरह किसी एक पार्टी के साथ नहीं जाता. यह समुदाय टिकट और स्थानीय समीकरण देखता है. जो पार्टी उन्हें प्रतिनिधित्व देती है, उसके प्रति झुकाव होता है. यह बात सपा के लिए चुनौती भी है और अवसर भी.
BJP की तैयारी
सपा की इस नई रणनीति का असर BJP पर भी पड़ सकता है. विश्लेषकों का मानना है कि अगर गुर्जर वोट में हलचल होती है, तो BJP भी इस समुदाय को साधने के लिए बड़े कदम उठा सकती है. दिनेश मिश्र का कहना है, "ऐसी स्थिति में BJP पश्चिमी यूपी से किसी बड़े गुर्जर चेहरे को योगी मंत्रिमंडल में जगह दे सकती है या संगठन में अहम भूमिका दे सकती है."
हालांकि दादरी की रैली में भारी भीड़ ने सपा को मनोवैज्ञानिक बढ़त जरूर दी है. गाजियाबाद, मेरठ, बुलंदशहर, बागपत और सहारनपुर जैसे जिलों से लोगों का जुटना यह दिखाता है कि पार्टी पश्चिम में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. अखिलेश यादव ने अपने भाषण में BJP सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों को लेकर हमला बोला. साथ ही उन्होंने जेवर एयरपोर्ट, जमीन अधिग्रहण और मुआवजे जैसे स्थानीय मुद्दों को उठाकर क्षेत्रीय जुड़ाव बनाने की कोशिश की.