कर्नाटक में सिद्धारमैया सरकार और राज्यपाल के बीच क्यों ठनी?

तमिलनाडु और केरल की तरह कर्नाटक में भी राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव बढ़ गया, जब राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने अभिभाषण पढ़ने से इनकार कर सदन से वॉकआउट कर दिया

मनरेगा के मुद्दे पर राज्यपाल थावरचंद गहलोत और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया में टकराव  (Photo: File)
मनरेगा के मुद्दे पर राज्यपाल थावरचंद गहलोत और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया में टकराव (Photo: File)

22 जनवरी को जब कर्नाटक विधानसभा का सत्र शुरू हुआ, तो सभी की निगाहें राज्यपाल थावरचंद गहलोत पर टिकी थीं. परंपरा के मुताबिक, इस बार भी विधानमंडल के संयुक्त सत्र को संबोधित करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था.

इस दौरान वही हुआ, जिसका पहले से अंदेशा था. पहले तो राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सरकार के जरिए तैयार अभिभाषण को पढ़ने से इनकार कर दिया, बाद में पढ़ने को तैयार हुए तो केवल दो-तीन लाइनें पढ़ीं और सदन से वॉकआउट कर गए.

इसके बाद राज्य सरकार और राज्यपाल के बीच टकराव और बढ़ गया है. दरअसल, साल का पहला सत्र होने के नाते परंपरा के मुताबिक राज्यपाल थावरचंद गहलोत को सरकार की ओर से अभिभाषण की कॉपी भेजी गई थी. इस कॉपी में मनरेगा को बदलकर लाए गए नए VB-G RAM G कानून की खामियों को गिनाया गया था.

साथ ही भद्रा परियोजना में केंद्र सरकार की उदासीनता, GST और टैक्स डेवोल्यूशन में अन्याय, तथा गैर-BJP शासित राज्यों के साथ सौतेले व्यवहार का भी जिक्र था. इसके बाद खबर आई कि राज्यपाल गहलोत इस पारंपरिक अभिभाषण को पूरी तरह नहीं पढ़ पाएंगे.

यह खबर सामने आते ही विधानसभा अध्यक्ष यू.टी. खादर, विधान परिषद अध्यक्ष बसवराज होरट्टी, कानून मंत्री एच.के. पाटिल, अधिवक्ता जनरल और मुख्यमंत्री के कानूनी सलाहकार सहित एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने पहुंचा.

इस मुलाकात के बाद राज्यपाल भाषण देने के तैयार हुए, लेकिन कर्नाटक मंत्रिमंडल के जरिए तैयार किए गए 122 अनुच्छेदों के भाषण को पढ़ने के बजाय उन्होंने सिर्फ उस स्पीच के पहले और अंतिम वाक्य ही पढ़े.

तमिलनाडु और केरल जैसे दक्षिणी पड़ोसी राज्यों के विपरीत, अब तक कर्नाटक में राज्यपाल शांतिपूर्ण तरीके से भाषण देते थे. इस बार ऐसा नहीं हो पाया. कर्नाटक की इस घटना से एक दिन पहले ही तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि ने अपना भाषण देने से इनकार कर दिया था. वे सदन से बाहर चले गए. जबकि केरल में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने हाल ही में खुद ही भाषण के उन अंशों को पढ़कर सुनाया, जिसे राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने नहीं पढ़ा था.

कर्नाटक की इस घटना पर सीएम सिद्धारमैया ने राज्यपाल को केंद्र की कठपुतली बताते हुए जोरदार हमला किया. सीएम सिद्धारमैया ने कहा, "आज उन्होंने मंत्रिमंडल के जरिए तैयार भाषण पढ़ने के बजाय, संविधान के प्रावधानों के विरुद्ध स्वयं से तैयार किया गया भाषण दिया." उन्होंने आगे कहा कि ऐसा करके राज्यपाल ने संविधान का उल्लंघन किया है. बतौर सिद्धारमैया, संविधान के अनुच्छेद 176 और 163 इस संबंध में राज्यपाल के कर्तव्यों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं.

कर्नाटक के कानून मंत्री पाटिल ने इसे लोकतंत्र के लिए "काला दिन" बताते हुए कहा कि राज्यपाल के संबोधन के जरिए कर्नाटक अपने किसानों के अधिकारों की आवाज उठा रहा था. इस बीच, BJP के कर्नाटक अध्यक्ष बी.वाई. विजयेंद्र ने कहा, "राज्यपाल ने केंद्र के खिलाफ झूठी और भ्रामक जानकारी फैलाने वाले भाषण को पढ़ने से इनकार किया. राज्य सरकार भाषण के जरिए केंद्र के खिलाफ दुष्प्रचार करना चाहती थी." उन्होंने कहा कि सरकार ने अब तक आठ विधानसभा सत्रों में केंद्र के खिलाफ पांच प्रस्ताव पारित किए हैं.

राज्यपाल के मूल संबोधन के दूसरे पैराग्राफ में कर्नाटक को उसके टैक्स हिस्से में हुई नाइंसाफी का जिक्र था.साथ ही उम्मीद जताई गई थी कि आगामी 16वें वित्त आयोग की घोषणा में इसे सुधारा जाएगा. जबकि पैराग्राफ 3 से 11 में मनरेगा पर विस्तार से चर्चा की गई थी. कर्नाटक में विधानसभा सत्र ऐसे समय में हो रहा है, जब कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर मनरेगा को बहाल करने के लिए विरोध प्रदर्शन कर रही है. कर्नाटक सरकार VB-G RAM G अधिनियम का कई कारणों से विरोध कर रही है. पहला, इसे राज्यों से परामर्श किए बिना लाया गया; दूसरा, अब राज्यों को कुल खर्च का 40 फीसद वहन करना होगा, जबकि पहले मनरेगा में केंद्र 90 फीसद से ज्यादा खर्च खुद करता था.  

विरोध का तीसरा कारण यह भी है कि केंद्रीकृत मानदंडों के जरिए ग्राम सभाओं की शक्ति सीमित कर दी गई है. इसके अलावा, कर्नाटक सरकार का मानना है कि इस कानून के लागू होने पर ग्राम सभा अधिनियम ग्रामीण विकास पर फोकस करने के बजाय "कॉर्पोरेट पूंजी हितों की रक्षा" करेगा.

राज्यपाल के तैयार भाषण में कहा गया था, “इन सभी कारणों से मेरी सरकार केंद्र सरकार से मांग करती है कि वह ठेकेदार-केंद्रित वीबी-जी रामजी कानून को तत्काल रद्द करे, जो बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है. इसकी जगह पर सरकार दोबारा से मनरेगा को बहाल करे, जो गरीबों, कृषि श्रमिकों, ग्रामीण संपत्ति सृजन, बेरोजगारी भत्ता और निवास स्थान पर रोजगार की रक्षा करता है.”

कर्नाटक में कांग्रेस सरकार और गहलोत के बीच पिछली बार टकराव 2024 में हुआ था, जब राज्यपाल ने मैसूरु में आवास स्थलों के आवंटन पर BJP कार्यकर्ताओं के जरिए सवाल उठाए जाने के बाद सिद्धारमैया के खिलाफ जांच का आदेश दिया था. हालांकि इससे कुछ समय के लिए संबंध खराब हुए, लेकिन धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो गई थी.
 

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