योग से बदलेगा बिहार! स्कूलों-कॉलेजों के लिए क्या है सम्राट चौधरी का प्लान?

पटना में बिहार के मुख्यमंत्री ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को सिर्फ शारीरिक क्षमता के उत्सव तक सीमित नहीं रखा, उन्होंने इसे राजनीतिक अनुशासन और धैर्य के प्रदर्शन में भी बदल दिया

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर योग करते मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी

21 जून की सुबह पटना के पाटलिपुत्र स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स का लाल मैदान किसी खेल मैदान से ज्यादा एक सार्वजनिक कैनवास जैसा दिख रहा था. इसी मैदान पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी नंगे पैर और शांत भाव से पहुंचे. 

उनके सफेद कुर्ते पर पड़ा भगवा गमछा मानो उनके इरादे की एक चमकदार रेखा था. उनके चारों ओर पंक्तियों में बैठे लोगों ने योग मैट पर उनकी तरह बैठना शुरू किया. अंतरराष्ट्रीय योग दिवस था और कुछ मिनटों के लिए ऐसा लगा मानो पूरा बिहार संतुलन साधने का अभ्यास कर रहा हो.

मुख्यमंत्री का योग प्रदर्शन सिर्फ उनकी शारीरिक सहनशक्ति का प्रदर्शन नहीं था. इससे यह भी दिखा कि वे वही करते हैं जिसकी बात करते हैं. चौधरी ने अगले शैक्षणिक सत्र से बिहार के स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में योग को शामिल करने की घोषणा की. साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह प्रस्ताव ऐसे व्यक्ति की ओर से आ रहा है जो अपने दैनिक जीवन में नियमित रूप से योग करता है.

पहले आसन में शांत एकाग्रता के साथ बैठे चौधरी मानो यह संदेश दे रहे थे कि प्रशासन के लिए स्थिरता भी एक गुण है. इसके बाद पीछे की ओर झुकने वाले आसनों में खुली छाती और झुकी हुई रीढ़ ने लचीलेपन और मजबूती, दोनों का संकेत दिया. बिहार जैसे राज्य में यह नेतृत्व के लिए उपयोगी गुण हैं जहां शासन की राह कभी सीधी नहीं होती और हर फैसले को समावेशी विकास, प्रशासनिक दक्षता और जनता की लगातार बढ़ती अपेक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है.

खड़े होकर किए जाने वाले स्ट्रेच में जब उनके हाथ ऊपर उठे तो ऐसा लगा मानो वह अपनी पहुंच का अभ्यास कर रहे हों. विभागों से लेकर जिलों तक और उस विशाल राज्य तक जो लगातार अपने मुख्यमंत्री से सर्वोत्तम प्रयास की अपेक्षा करता है.

56 वर्षीय चौधरी की लंबाई छह फीट से भी अधिक है. बोलने से पहले ही उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली नजर आता है. लेकिन पटना के इस कार्यक्रम में सबसे अलग जो बात दिखी, वह सिर्फ उनकी लंबाई नहीं बल्कि उनकी ऊर्जा थी. कठिन स्ट्रेच, झुकने और संतुलन वाले आसनों की पूरी श्रृंखला के दौरान उन्होंने ऐसा लचीलापन और सहनशक्ति दिखाई जिससे कई युवा नेता भी ईर्ष्या कर सकते हैं. योग मैट पर उनकी मौजूदगी एक महीन संदेश दे रही थी कि शासन चलाने के लिए सहनशक्ति जरूरी है. वे यह दिखाने के लिए प्रतिबद्ध नजर आए कि शारीरिक फिटनेस सिर्फ व्यक्तिगत शौक नहीं बल्कि पेशेवर जरूरत भी है.

शायद इसी वजह से यह दृश्य इतना प्रभावशाली लगा. बिहार में ऐसे नेताओं की कमी नहीं रही जिन्होंने रूपक के अर्थों में सही मुद्रा या पोश्चर अपनाने की कला सीखी हो. लेकिन चौधरी यह दिखा रहे थे कि मुद्रा का अर्थ वास्तविक भी हो सकता है. वे खुद को योगी के रूप में पेश नहीं कर रहे थे. बल्कि यह दिखा रहे थे कि दबाव के अभाव में नहीं बल्कि दबाव के बावजूद एक नेता कैसे खुद पर नियंत्रण बनाए रखता है.

योग के प्रति चौधरी का उत्साह एक बड़े सांस्कृतिक अभियान का भी हिस्सा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरणा लेते हुए,  जिन्हें उन्होंने योग को घरेलू अभ्यास से वैश्विक आंदोलन बनाने का श्रेय दिया, बिहार के मुख्यमंत्री योग को स्वास्थ्य का माध्यम भी मानते हैं और सभ्यतागत विरासत भी. बिहार के शिक्षा पाठ्यक्रम में योग को शामिल करने का उनका प्रस्ताव इसी सोच को दर्शाता है. चौधरी के अनुसार योग सिर्फ व्यायाम नहीं है. यह सनातन मूल्यों, अनुशासन, संतुलन, आत्मसंयम और अपने परिवेश के साथ सामंजस्य की अभिव्यक्ति है. शिक्षा व्यवस्था में योग को संस्थागत रूप देने की कोशिश के जरिए वे इन मूल्यों को बिहार के सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनाना चाहते हैं.

मुख्यमंत्री अपने भाषणों में भी यही बात कहते रहे हैं. उनके अनुसार योग सिर्फ भारत की प्राचीन परंपरा या औपचारिक आयोजनों का हिस्सा नहीं है. यह बेहतर स्वास्थ्य, संतुलन और लंबी आयु का व्यावहारिक रास्ता है. इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने घोषणा की कि बिहार सरकार स्कूलों और कॉलेजों के पाठ्यक्रम में योग को शामिल करना चाहती है ताकि बच्चे और युवा इसे रोजमर्रा की शिक्षा का हिस्सा बना सकें. विचार सरल है और आकर्षक भी. अगर राज्य अंकगणित, नागरिक शास्त्र और विज्ञान पढ़ा सकता है तो वह श्वास, शरीर और मन के अनुशासन की शिक्षा भी दे सकता है. उद्देश्य योग को हर व्यक्ति और हर दिन का अभ्यास बनाना है.

शब्दों का यह चयन महत्वपूर्ण है. चौधरी सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि एक आदत का प्रस्ताव रख रहे हैं. सिर्फ एक पाठ नहीं बल्कि एक संस्कृति की बात कर रहे हैं. ऐसे राज्य में जहां सार्वजनिक विमर्श अक्सर विकास की कमियों, कानून-व्यवस्था की चिंताओं और नौकरियों के कठोर गणित के इर्द-गिर्द घूमता है, वहां योग पर उनका जोर पहली नजर में थोड़ा अप्रत्याशित लगता है. लेकिन इसमें तर्क भी है. कोई सरकार अपने नागरिकों से लचीला और मजबूत बनने की अपेक्षा नहीं कर सकती अगर वह खुद ऐसा उदाहरण पेश न करे.

आखिरकार वे ऐसे राज्य का शासन चला रहे हैं जो कठिन दौर से गुजर रहा है. बिहार अपने मुख्यमंत्री से एक साथ कई कामों की अपेक्षा करता है. सरकारी मशीनरी को सतर्क रखना, पुलिस को जवाबदेह बनाए रखना, नौकरशाही को दक्ष बनाना, निवेशकों की रुचि बनाए रखना, युवाओं की उम्मीद कायम रखना, राजनीतिक सहयोगियों को संतुष्ट रखना और जनता को यह भरोसा दिलाना कि भविष्य का निर्माण अभी भी जारी है. यह बेहद कठिन जिम्मेदारी है. ऐसा नेता जो भीड़ के सामने खड़े होकर अपने पैरों की उंगलियों तक भी नहीं पहुंच सकता, रूपक के तौर पर ही सही, वह दूसरों से कठिनाइयों को सहने की अपेक्षा कैसे कर सकता है.

उस दिन की तस्वीरें अपनी कहानी खुद कह रही थीं. एक तस्वीर में चौधरी पद्मासन में बैठे थे, आंखें बंद थीं और चेहरे पर असामान्य सहजता थी. मानो राज्य ने कुछ क्षणों के लिए खुद को निजी समय दे दिया हो. दूसरी तस्वीर में वह रीढ़ को पीछे की ओर गहराई से मोड़ते दिखे. उनके कंधे पीछे थे और छाती आकाश की ओर उठी हुई थी. यह मुद्रा स्थिरता पर आधारित आत्मविश्वास का संदेश दे रही थी. आखिर नेतृत्व का मतलब दबाव के सामने टूटना नहीं बल्कि उसे सहना है. उठी हुई छाती और स्थिर नजरें मानो यह बता रही थीं कि वह चुनौतियों का सीधे सामना करने और संयम बनाए रखने को तैयार हैं. एक अन्य तस्वीर में वह सीधे खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर उठाए हुए दिखाई दिए. यह आकांक्षा और सार्वजनिक संकल्प का संकेत था.

ये सिर्फ योगासन नहीं थे. ये क्रमबद्ध तरीके से पेश किए गए राजनीतिक रूपक थे. भीतर की ओर ध्यान, परिश्रम और ऊंचाई की ओर बढ़ना. पूरी प्रस्तुति लगभग जरूरत से ज्यादा व्यवस्थित लग रही थी और शायद इसी वजह से प्रभावी भी थी. फिर भी चौधरी की सबसे मजबूत छवि नाटकीयता की नहीं बल्कि दृढ़ता की रही. वे फिटनेस को शासन का हिस्सा बनाकर पेश करने के लिए प्रतिबद्ध दिखाई दिए.

इसमें एक तरह की यथार्थवादी सोच भी है. बिहार को ऐसे नेता की जरूरत है जिसमें लंबी दौड़ की क्षमता हो. ऐसा नेता जो जनता की बड़ी उम्मीदों और रोजमर्रा की निराशाओं के बोझ से सार्वजनिक मनोबल को गिरने न दे. ऐसे में मुख्यमंत्री सिर्फ प्रशासक नहीं होता. इस अर्थ में चौधरी एक तरह के संरक्षक खिलाड़ी भी हैं.

यही वजह है कि स्कूलों और कॉलेजों के टाइम टेबल में योग शामिल करने की उनकी बात राजनीतिक रूप से भी समझदारी भरी लगती है. इससे शरीर को शिक्षा से, शिक्षा को संस्कृति से और संस्कृति को शासन-कला से जोड़ा जाता है. यह संदेश दिया जाता है कि स्वास्थ्य कोई निजी शौक नहीं बल्कि सार्वजनिक नीति का विषय है. यह भी संकेत मिलता है कि योग से परिचित होकर बड़ी होने वाली पीढ़ी में आत्मअनुशासन, एकाग्रता और संयम जैसे गुण अधिक विकसित हो सकते हैं. ऐसे गुण जिनकी राज्य को सख्त जरूरत है.

स्वाभाविक रूप से इसमें प्रतीकात्मकता भी है. चौधरी के समर्थक इसमें ऐसे नेता को देखेंगे जो सिर्फ कुर्सी पर बैठकर शासन नहीं करना चाहता बल्कि सबके साथ योग मैट पर भी खड़ा होना चाहता है. उनके आलोचक इसे ऊर्जा से भरी एक सावधानीपूर्वक तैयार की गई छवि मान सकते हैं. दोनों बातें सही हो सकती हैं. लेकिन राजनीति का मूल्यांकन अक्सर इस बात से होता है कि वह अपने बारे में कैसी कहानी सुनाना चाहती है. उस सुबह बिहार के मुख्यमंत्री ने संतुलन की कहानी सुनाने का फैसला किया. एक ऐसे नेता की कहानी, जो दबाव में है लेकिन टूटे बिना झुकता है और आगे बढ़ते हुए भी अपना संतुलन नहीं खोता.

राजनीति गति को पुरस्कृत करती है जबकि शासन धैर्य को. आज का बिहार रोजगार, बुनियादी ढांचे, निवेश, कानून-व्यवस्था और जनता की विशाल अपेक्षाओं के प्रबंधन जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है. ऐसे समय में चौधरी की ध्यान मुद्रा में बैठी, संतुलन बनाकर खड़ी या आकाश की ओर हाथ बढ़ाती तस्वीरें केवल औपचारिकता नहीं रह जातीं. वे शासन के उनके तरीके का बयान बन जाती हैं. मुख्यमंत्री मानते दिखाई देते हैं कि किसी राज्य का सफल संचालन करने के लिए सबसे पहले स्वयं पर नियंत्रण होना जरूरी है. पटना के लाल योग मैट पर उन्होंने इसी सोच की एक झलक पेश की.

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