संभल हिंसा में FIR के आदेश पर अदालत और पुलिस आमने-सामने क्यों हैं?
पूरा मामला 24 नवंबर 2024 का है, जब कोर्ट के आदेश पर जामा मस्जिद का सर्वे किया जा रहा था और इस दौरान उग्र भीड़ और पुलिस के बीच टकराव हो गया

पश्चिमी यूपी के संभल में जामा मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की हिंसा का मामला 13 महीने बाद एक बार फिर सियासी और प्रशासनिक हलकों में उबाल ले आया है. जिले में चंदौसी की मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) अदालत के 13 जनवरी के उस आदेश के बाद यह बहस और तेज हो गई है, जिसमें तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, तत्कालीन कोतवाली प्रभारी अनुज कुमार तोमर और 10 से 20 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं. अदालत ने साफ कहा है कि सात दिनों के भीतर आगे की कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए.
यह आदेश जहां एक तरफ पीड़ित परिवार के लिए उम्मीद की किरण माना जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस प्रशासन और सत्ता के गलियारों में इसे कानून व्यवस्था और पहले से हो चुकी जांच पर सवाल खड़े करने वाला कदम बताया जा रहा है.
पूरा मामला 24 नवंबर 2024 का है, जब कोर्ट के आदेश पर जामा मस्जिद का सर्वे किया जा रहा था. सर्वे से पहले ही इलाके में भारी पुलिस बल की तैनाती थी. प्रशासन के मुताबिक बाजार बंद थे, धारा 163 लागू थी और आम लोगों की आवाजाही पर पूरी तरह रोक थी. इसी दौरान मस्जिद के पिछले हिस्से से आई भीड़ उग्र हो गई. देखते ही देखते पथराव और फायरिंग शुरू हो गई. हालात इतने बेकाबू हुए कि हिंसा में पांच लोगों की मौत हो गई, जबकि एसपी समेत 29 पुलिसकर्मी घायल हुए. पुलिस ने इस मामले में 12 एफआईआर दर्ज कीं और करीब 2950 लोगों को आरोपी बनाया. अब तक 137 आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है, हालांकि 50 से ज्यादा आरोपी जमानत पर बाहर आ चुके हैं.
इसी हिंसा के बीच खग्गू सराय निवासी 24 वर्षीय आलम के घायल होने की कहानी सामने आती है, जो अब अदालत के आदेश के बाद फिर चर्चा में है. आलम के पिता यामीन का आरोप है कि उनका बेटा बिस्किट बेचने का काम करता है. 24 नवंबर की सुबह करीब आठ बजे वह तीन पहिया ठेले पर बिस्किट लेकर घर से निकला था. जैसे ही वह जामा मस्जिद के पास पहुंचा, तभी तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी, कोतवाली प्रभारी अनुज तोमर और अन्य पुलिसकर्मियों ने भीड़ पर जान से मारने की नीयत से फायरिंग कर दी. यामीन का दावा है कि आलम ठेला छोड़कर भागा, लेकिन उसकी पीठ में दो और हाथ में एक गोली लगी. किसी तरह वह घायल हालत में घर पहुंचा, जहां से परिजन उसे निजी अस्पताल ले गए. हालत गंभीर होने पर उसे हायर सेंटर रेफर किया गया और बाद में मेरठ में भर्ती कराया गया. ऑपरेशन के बाद उसकी जान बच सकी.
पीड़ित परिवार का कहना है कि घटना के बाद उन्होंने पुलिस और प्रशासन से कई बार गुहार लगाई, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई. डर के माहौल में इलाज भी कथित तौर पर छिपकर कराया गया. यामीन का आरोप है कि पुलिस ने उल्टे उनके बेटे को ही बवाल का आरोपी बना दिया और उसका मामला अभी भी विचाराधीन है. आखिरकार, उन्होंने 6 फरवरी 2025 को अदालत का दरवाजा खटखटाया. करीब एक साल बाद, 9 जनवरी 2026 को CJM कोर्ट ने सुनवाई के बाद एफआईआर दर्ज करने का आदेश दे दिया.
अदालत के इस आदेश ने जैसे ही सार्वजनिक रूप लिया, संभल की राजनीति गरमा गई. पुलिस प्रशासन ने आदेश पर सवाल खड़े कर दिए. संभल के एसपी कृष्ण कुमार विश्नोई ने साफ कहा कि उन्हें अभी कोर्ट का आदेश प्राप्त नहीं हुआ है, लेकिन उनका मानना है कि यह आदेश अवैध है और इस पर एफआईआर दर्ज नहीं की जाएगी. एसपी का तर्क है कि इस पूरे मामले की पहले ही न्यायिक जांच हो चुकी है, जिसमें पुलिस की कार्रवाई को सही ठहराया गया है. उन्होंने कहा कि पुलिस इस आदेश के खिलाफ उचित फोरम पर अपील करेगी. एसपी विश्नोई ने पीड़ित पक्ष की कहानी को संदिग्ध बताते हुए कई सवाल उठाए. उनका कहना है कि जामा मस्जिद सर्वे के दिन इलाके में थ्री लेयर सुरक्षा थी. बाजार पूरी तरह बंद थे और आम लोगों की आवाजाही पर पाबंदी थी. ऐसे में कोई युवक बिस्किट से भरा ठेला लेकर मस्जिद के नजदीक पहुंच ही नहीं सकता. उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि हिंसा सुबह 7.45 बजे से पहले शुरू हो चुकी थी, जबकि आलम के घर से निकलने का समय सुबह आठ बजे बताया जा रहा है. फिर वह जामा मस्जिद तक कैसे पहुंचा.
सबसे अहम तर्क गोली के बोर को लेकर दिया गया. एसपी के मुताबिक आलम के शरीर से जो गोली निकली, वह 7.65 एमएम की है, जिसे पुलिस इस्तेमाल नहीं करती. यह वही बोर है, जिसकी गोलियां शारिक साटा गिरोह के गुर्गों से बरामद की गई हैं. पुलिस का दावा है कि बवाल के दौरान फायरिंग इसी गिरोह ने करवाई थी और उनके पास से हथियार भी बरामद हो चुके हैं. पुलिस का कहना है कि इसलिए पुलिस पर गोली चलाने के आरोप पूरी तरह निराधार हैं.
इस मामले में जिला प्रशासन भी पुलिस के सुर में सुर मिलाता दिख रहा है. डीएम राजेंद्र पैंसिया का कहना है कि सर्वे के दिन धारा 163 लागू थी, बाजार बंद थे और आम लोगों की आवाजाही रोकी गई थी. उनके मुताबिक ऐसी स्थिति में बिस्किट बेचने वाला ठेला लेकर कोई व्यक्ति जामा मस्जिद के पास पहुंच ही नहीं सकता. डीएम का कहना है कि पुलिस पर लगाए गए आरोप तथ्यों से मेल नहीं खाते. दूसरी तरफ, अदालत के आदेश को पीड़ित परिवार और विपक्षी दल न्याय की दिशा में बड़ा कदम बता रहे हैं.
उनका कहना है कि यह पहली बार है जब पुलिस अधिकारियों की भूमिका को लेकर अदालत ने सीधे एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया है. इससे पहले चार मृतकों के परिजनों ने भी अज्ञात के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कराई थी. एसआईटी जांच में शारिक साटा गिरोह का नाम सामने आया और उसके तीन गुर्गों को जेल भेजा गया. बाद में शारिक साटा को भी साजिश का आरोपी बनाया गया. हालांकि अब सवाल यह उठ रहा है कि अगर गोली गिरोह ने चलाई थी, तो फिर आलम के घायल होने की जिम्मेदारी किसकी है और पुलिस की भूमिका की जांच क्यों न हो.
संभल हिंसा की साजिश को लेकर पहले ही राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल चुका है. पुलिस ने जामा मस्जिद कमेटी के सदर जफर अली और सांसद जियाउर्रहमान बर्क पर भी साजिश का आरोप लगाया था. जफर अली को जेल भेजा गया, हालांकि वे फिलहाल जमानत पर हैं. सांसद बर्क को हाईकोर्ट से राहत मिली हुई है.
इन तमाम पहलुओं के बीच CJM कोर्ट का यह आदेश सत्ता पक्ष के लिए असहज करने वाला माना जा रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अदालत के आदेश ने दो बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं. पहला, क्या न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट अंतिम सच मानी जाए या अदालत के निर्देश के बाद नए सिरे से जांच का रास्ता खुलेगा. दूसरा, अगर पुलिस प्रशासन अदालत के आदेश को अवैध बताकर एफआईआर दर्ज करने से इनकार करता है, तो यह न्यायपालिका और कार्यपालिका के टकराव की स्थिति पैदा कर सकता है. विपक्ष इसे कानून के राज पर हमला बता रहा है, जबकि सरकार समर्थक इसे पुलिस का मनोबल गिराने की कोशिश बता रहे हैं.
इस पूरे विवाद में तत्कालीन सीओ अनुज चौधरी का नाम भी खासा चर्चा में है. वे न सिर्फ पुलिस अधिकारी हैं, बल्कि एक चर्चित पूर्व पहलवान भी रहे हैं. उन्होंने 2004 एथेंस ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया था और 2002 व 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीते थे. उन्हें अर्जुन अवॉर्ड भी मिल चुका है. 2012 में उन्होंने स्पोर्ट्स कोटा से यूपी पुलिस जॉइन की थी. फिलहाल वे फिरोजाबाद में एएसपी ग्रामीण के तौर पर तैनात हैं. उनके समर्थक इसे एक साजिश करार दे रहे हैं, जबकि आलोचक कह रहे हैं कि कानून सभी के लिए बराबर होना चाहिए.
फिलहाल संभल में माहौल फिर से संवेदनशील हो गया है. एक तरफ पीड़ित परिवार अदालत के आदेश के बाद जांच की उम्मीद लगाए बैठा है, वहीं दूसरी तरफ पुलिस और प्रशासन अपने पुराने स्टैंड पर कायम हैं. सवाल यह भी है कि क्या एफआईआर दर्ज होगी या पुलिस ऊपरी अदालत से राहत हासिल कर लेगी. साथ ही यह भी देखना होगा कि अगर जांच आगे बढ़ती है तो क्या नए तथ्य सामने आते हैं या फिर पहले से मौजूद जांच रिपोर्ट ही अंतिम आधार बनेगी.