ओडिशा में खारे पानी के मगरमच्छों की संख्या बढ़ी; पर्यावरण के लिए क्या है इसकी अहमियत?
ओडिशा देश का अकेला राज्य है जहां खारे पानी के मगरमच्छ पाए जाते हैं

ओडिशा में खारे पानी के मगरमच्छों (एस्टुअराइन/सॉल्टवॉटर क्रोकोडाइल) की आबादी में लगातार बढोतरी देखी जा रही है. पिछले साल के मुकाबले इस साल इनकी संख्या में 32 का और इजाफा हो गया. अब यह संख्या बढ़कर 1,858 हो गई है. वन विभाग की ओर से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2000 में जहां इनकी संख्या 1192 थी, वहीं 2026 आते-आते 1858 हो गई. यानी बीते 25 सालों में 666 मगरमच्छ बढ़ गए. बढ़ोतरी का यह आंकड़ा इस वर्ष राज्य के वन एवं पर्यावरण विभाग द्वारा पायलट ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण शुरू किए जाने के बाद सामने आई है.
ओडिशा में प्राकृतिक आवास में खारे पानी के मगरमच्छों की देश की सबसे बड़ी आबादी पाई जाती है. पिछले पांच साल के आंकड़ों को देखें तो साल 2020 में इनकी संख्या 1757, साल 2021 में 1768, साल 2022 में 1784, साल 2023 में 1793, साल 2024 में 1811, साल 2025 में 1826 थी.
नदियों में मगरमच्छ का होना एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) का संकेत है, जो यह दिखाता है कि नदी में पर्याप्त मछलियां और अन्य जलीय जीव उपलब्ध हैं. ये शिकारी जलीय खाद्य श्रृंखला को नियंत्रित करते हैं और नदियों के पारिस्थितिकीय संतुलन को बनाए रखते हैं. हालांकि, यह आसपास रह रहे इंसानों के लिए एक संभावित खतरा और सतही जल में सुरक्षा संबंधी जोखिम का भी संकेत होता है.
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) के कार्यालय के अनुसार, कुल 1,858 मगरमच्छ गिने गए. जिनमें 531 हैचलिंग (28.58 फीसदी), 442 इयरलिंग (23.79 फीसदी), 365 जुवेनाइल (19.64 फीसदी), 167 सब-एडल्ट (8.99 फीसदी) और 353 एडल्ट (19 फीसदी) शामिल हैं. 6 फीट से अधिक लंबाई वाले मगरमच्छों को सब-एडल्ट और एडल्ट श्रेणी में रखा गया और उनकी गणना दिन के समय की गई. हैचलिंग - 2 फीट, इयरलिंग- 2 से 3 फीट और जुवेनाइल- 3 से 6 फीट होते हैं. इन मगरमच्छों में से अधिकतम 1,424 (76.64 फीसदी) कानिका वन्यजीव रेंज में पाए गए, जिसमें खोला से भितरकनिका–पाथासाला संगम तक के वन खंड और नदियां शामिल हैं.
राजनगर वन्यजीव रेंज में 292 (15.72 फीसदी) मगरमच्छ दर्ज किए गए. महाकालपाड़ा रेंज के महानदी डेल्टा में 99 (5.33 फीसदी) मगरमच्छ पाए गए. जबकि गहिरमाथा वन्यजीव रेंज में कुल 43 (2.31 फीसदी) मगरमच्छों की गणना की गई. सर्वेक्षण के परिणाम जनवरी-2025 की गणना (1,858 मगरमच्छ) की तुलना में 32 मगरमच्छों की वृद्धि देखी गई है. विभाग के अनुसार, कुल 24 जनगणना दलों को 54 खंडों में मगरमच्छों की गणना के लिए तैनात किया गया था. सौ से अधिक लोगों की टीम ने आबादी का आकलन व्यक्तिगत गणना के माध्यम से किया, जिसमें दिन और रात दोनों समय नाव-आधारित सर्वेक्षण किए गए.
राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) पीके झा ने बताते हैं, "ड्रोन-आधारित पायलट सर्वेक्षण दिसंबर में किया गया था, ताकि मगरमच्छों के आकलन में ड्रोन के उपयोग का मूल्यांकन किया जा सके. ड्रोन-आधारित सर्वेक्षण प्रोटोकॉल के मानकीकरण के लिए उड़ान की ऊंचाई, समय, ट्रांसेक्ट डिज़ाइन, पहचान की दर और जानवरों की प्रतिक्रिया जैसे प्रमुख सर्वेक्षण मानकों को दर्ज किया गया.’’
वे आगे यह भी कहते हैं कि भविष्य की रणनीति के तहत चयनित नदी खंडों में ड्रोन और कैमरों का उपयोग कर विशिष्ट शारीरिक विशेषताओं के आधार पर एक-एक मगरमच्छों की पहचान और प्रोफाइलिंग की जाएगी. यह तरीका मगरमच्छों के वितरण व संख्या आधारित डाटाबेस को मजबूत करेगा.
बढ़ती आबादी के मायने क्या हैं
ओडिशा वन विभाग के पूर्व वन्यजीव शोधकर्ता और प्रसिद्ध हर्पेटोलॉजिस्ट (सरीसृप वैज्ञानिक) सुधाकर कर विस्तार से इसके मायने बताते हैं, "मगरमच्छ पर्यावरणीय बदलावों के प्रति संवेदनशील होते हैं. उन्हें साफ पानी, पर्याप्त मछलियां और घोंसला बनाने तथा आराम करने के लिए सुरक्षित स्थानों की आवश्यकता होती है. उनकी संख्या में होने वाली थोड़ी-सी बढ़ोतरी भी इस बात का संकेत देती है कि उनका आवास अधिक स्वस्थ हो रहा है और जीवन के लिए पहले से ज्यादा अनुकूल बन रहा है.’’
संयोगवश, ओडिशा देश का एकमात्र राज्य है जहां घड़ियाल, मगर (मगरमच्छ) और खारे पानी के मगरमच्छ यानी तीनों प्रजातियां पाई जाती हैं. राज्य सरकार ने 1975 में इन मगरमच्छ प्रजातियों के संरक्षण के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया था. जहां तक खारे पानी के मगरमच्छ और मगर के संरक्षण का सवाल है, इस पहल से सकारात्मक परिणाम मिले हैं, लेकिन घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम में यह प्रयास सफल नहीं हो पाया.
सुधाकर कर आगे कहते हैं, "ओडिशा में मगरमच्छों की आबादी सैचुरेशन प्वाइंट यानी 1000 से अधिक हो जाने के कारण वन विभाग ने 2024 में उद्यानों में मगरमच्छ प्रजनन और पालन कार्यक्रम बंद कर दिया था. हालांकि, हर साल पर्यटकों के लिए उद्यान के भीतर दंगमाल स्थित मगरमच्छ प्रजनन परिसर में अंडों से मगरमच्छ तैयार करने के लिए घोंसलों से अंडे जरूर एकत्र किए जाते हैं.”
साल 1975 में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के सहयोग से ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान में मगरमच्छ संरक्षण परियोजना की शुरुआत की थी. बीते 17 जून 2024 को इस परियोजना ने अपने 50 वर्ष पूरे कर लिए.
मगरमच्छ संरक्षण परियोजना का मुख्य उद्देश्य जानवरों के प्राकृतिक आवास की रक्षा करना और कैद में प्रजनन (कैप्टिव ब्रीडिंग) के माध्यम से उनकी आबादी को तेजी से पुनर्जीवित करना था. क्योंकि शिकार के कारण प्राकृतिक परिस्थितियों में मगरमच्छ के बच्चों की जीवित रहने की दर काफी कम थी. इस संरक्षण परियोजना के चलते भारत में मगरमच्छों की आबादी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. सुधाकर कर को ‘क्रोकोडाइल मैन’ के नाम से भी जाना जाता है. उनका इस परियोजना की सफलता में महत्वपूर्ण योगदान रहा है.