ढांचे में बदलाव और पसमांदा पर दांव; RSS यूपी में दखल बढ़ाने के लिए और क्या कर रहा?
मथुरा के वृंदावन स्थित केशव धाम में हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की अखिल भारतीय कार्यकारिणी बैठक में ऐसे कई मुद्दों पर चर्चा हुई जिनका यूपी की राजनीति पर असर पड़ना तय है

मथुरा के वृंदावन स्थित केशव धाम में 5 जनवरी से शुरू हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारिणी की बैठक सिर्फ एक नियमित संगठनात्मक आयोजन नहीं थी. इस बैठक ने साफ कर दिया कि संघ आने वाले समय में उत्तर प्रदेश को राजनीतिक, सामाजिक और सांगठनिक स्तर पर अपनी सबसे बड़ी प्रयोगशाला के तौर पर देख रहा है.
2027 के विधानसभा चुनाव को केंद्र में रखते हुए यहां संघ ने हिंदुत्व, सामाजिक समरसता, ओबीसी और पसमांदा मुस्लिम रणनीति के साथ-साथ BJP सरकार और संगठन के साथ अपने रिश्तों को नए सिरे से परिभाषित करने का रोडमैप तैयार किया है. इस बैठक का सबसे अहम निष्कर्ष संघ की ढांचागत व्यवस्था में प्रस्तावित बड़ा बदलाव है.
अब तक प्रांत स्तर पर काम कर रहे प्रांत प्रचारकों की भूमिका को पुनर्गठित करने की तैयारी है. योजना के मुताबिक प्रांत प्रचारक का पद खत्म कर उन्हें प्रदेश स्तर पर प्रचारक बनाया जाएगा, जबकि संभाग स्तर पर नए प्रचारकों की तैनाती होगी. इसका सीधा मतलब है कि संघ अब और नीचे, मोहल्लों और बस्तियों तक सीधे पहुंच बनाना चाहता है.
संघ से जुड़े एक वरिष्ठ पदाधिकारी के मुताबिक, “बीते कुछ वर्षों में संगठन का विस्तार तो हुआ, लेकिन कई इलाकों में संपर्क कमजोर पड़ा. अब लक्ष्य है कि प्रचारक स्थानीय स्तर पर सक्रिय रहें, निष्क्रिय स्वयंसेवकों को फिर से जोड़ें और जो लोग किसी कारण संघ से दूर हो गए हैं, उन्हें वापस लाया जाए.”
मार्च से देशभर में इस नई व्यवस्था को लागू करने की तैयारी है. यूपी में इसे विशेष प्राथमिकता दी जा रही है, क्योंकि संघ मानता है कि 2027 की जीत का रास्ता 2025-26 में किए गए सांगठनिक काम से तय होगा.
हिंदुत्व को प्रखर करने का संदेश
बैठक के तीसरे दिन संघ प्रमुख मोहन भागवत का संदेश साफ और सीधा था. हिंदुत्व को और प्रखर करते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक संघ को पहुंचाना. उन्होंने खास तौर पर पूर्वोत्तर राज्यों का जिक्र किया, जहां गली-गली हिंदू सम्मेलन आयोजित करने का आह्वान किया गया. हालांकि यूपी के संदर्भ में यह संदेश और भी व्यापक था. संघ के एक प्रचारक के अनुसार, “हिंदुत्व अब सिर्फ प्रतीकों या बड़े मुद्दों तक सीमित नहीं रहेगा. इसे रोजमर्रा की सामाजिक गतिविधियों, शिक्षा, स्वास्थ्य और सेवा कार्यों के जरिए जमीन पर उतारा जाएगा.”
यूपी में इसका मतलब साफ है. मंदिर आंदोलन या धार्मिक ध्रुवीकरण के पुराने फ्रेम से आगे बढ़कर संघ अब सामाजिक नेटवर्क और सांस्कृतिक सक्रियता के जरिए हिंदू समाज को जोड़ना चाहता है. यह रणनीति BJP के लिए भी मददगार मानी जा रही है, खासकर तब जब शहरी और अर्ध-शहरी इलाकों में पार्टी को 2024 के लोकसभा चुनाव में कुछ सीटों पर नुकसान झेलना पड़ा था. 2024 के लोकसभा चुनावों में राज्य में BJP की सीटों की संख्या 62 से घटकर 33 हो गई थी.
ओबीसी और सामाजिक संतुलन की नई कवायद
बैठक में ओबीसी रणनीति पर भी गंभीर मंथन हुआ. संघ का आकलन है कि हिंदू समाज के भीतर सामाजिक और आर्थिक असमानता अगर गहराती है, तो उसका राजनीतिक नुकसान सीधे BJP को झेलना पड़ सकता है. इसी वजह से पिछड़े वर्ग को अधिक सक्षम बनाने, उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ने और सामाजिक नेतृत्व के नए चेहरे तैयार करने पर जोर दिया गया. संघ से जुड़े एक प्रचारक कहते हैं, “ओबीसी वर्ग को अगर लगेगा कि संघ उनके साथ खड़ा है, तो हिंदुत्व की व्यापक अवधारणा ज्यादा मजबूत होगी.” यूपी में यह रणनीति इसलिए भी अहम है क्योंकि ओबीसी वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता रहा है. समाजवादी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दलों की पकड़ इसी वर्ग में रही है. संघ की कोशिश है कि सामाजिक समरसता के नाम पर इस वर्ग को वैचारिक रूप से अपने साथ जोड़ा जाए.
पसमांदा मुस्लिमों पर फोकस, बड़ा लेकिन संवेदनशील दांव
इस बैठक का सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला फैसला पसमांदा मुस्लिमों को लेकर रहा. 8 जनवरी को हुई कोर ग्रुप की बैठक में तय किया गया कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े पसमांदा मुस्लिमों को संघ की विचारधारा से जोड़ने का काम तेज किया जाएगा. इसकी जिम्मेदारी राष्ट्रीय मुस्लिम मंच को सौंपी गई है.
पसमांदा मुस्लिम समाज का बड़ा हिस्सा कारीगर, बुनकर और मजदूर वर्ग से आता है. संघ के आंतरिक आकलन के मुताबिक यह शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में काफी पीछे है. संघ का मानना है कि इस वर्ग को मुख्यधारा से जोड़कर न सिर्फ सामाजिक न्याय की बात की जा सकती है, बल्कि मुस्लिम समाज के भीतर एक वैकल्पिक विमर्श भी खड़ा किया जा सकता है. राजनीतिक विश्लेषक और बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर सुशील पांडेय कहते हैं, “यह संघ का सबसे जोखिम भरा लेकिन दूरगामी कदम है. पसमांदा मुस्लिमों को लेकर संघ अगर सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर भरोसा बना पाता है, तो यूपी की राजनीति में यह बड़ा बदलाव ला सकता है. हालांकि इसमें वक्त लगेगा और विरोध भी होगा.” संघ की योजना है कि जल्द ही राष्ट्रीय मुस्लिम मंच की बैठक बुलाकर पूरी कार्ययोजना तैयार की जाए, जिसमें शिक्षा, कौशल विकास और सामाजिक संवाद को प्राथमिकता दी जाएगी.
BJP और RSS का समन्वय, 2024 से सबक
केशव धाम में बैठक के दौरान हुई एक अहम समन्वय बैठक ने राजनीतिक हलकों में खासा ध्यान खींचा. BJP के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष, ब्रज क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष दुर्ग विजय सिंह शाक्य और अन्य पदाधिकारी संघ प्रमुख मोहन भागवत व वरिष्ठ प्रचारकों से मिले. यह बैठक यूपी के लिहाज से बेहद अहम मानी जा रही है. 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में BJP को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं.
संघ का मानना है कि संगठन और सरकार के बीच तालमेल की कमी इसका एक बड़ा कारण रही. इसी कड़ी में बीते कुछ महीनों में योगी आदित्यनाथ और मोहन भागवत के बीच हुई बैठकों को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. 26 नवंबर को अयोध्या में और फिर लखनऊ में हुई उच्चस्तरीय बैठकों में साफ संदेश दिया गया कि अंदरूनी मतभेद चुनाव से पहले खत्म होने चाहिए. एक वरिष्ठ BJP नेता बताते हैं, “संघ ने साफ कहा है कि सरकार और संगठन अगर अलग-अलग दिशा में चलेंगे, तो नुकसान तय है. 2027 को देखते हुए अब फीडबैक, फॉलो-अप और समन्वय पर खुलकर बात हो रही है.”
योगी आदित्यनाथ पर भरोसा, लेकिन शर्तों के साथ
संघ की बैठकों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर भी साफ संदेश गया है. संघ नेतृत्व का मानना है कि योगी यूपी में BJP का सबसे मजबूत चेहरा हैं, लेकिन सरकार को जमीन पर संगठन की बात सुननी होगी. राजनीतिक विशेषज्ञ सुशील पांडेय के अनुसार, “संघ और योगी के रिश्ते भरोसे पर टिके हैं, लेकिन संघ अब ज्यादा सक्रिय भूमिका चाहता है. वह चाहता है कि सरकार की नीतियों में सामाजिक संतुलन और संगठन की प्राथमिकताएं साफ दिखें.” घुमंतू जनजातियों का डेटा तैयार करना, उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ना और आधार जैसी सुविधाएं देना, इसी दिशा में उठाए गए कदम माने जा रहे हैं.
कुल मिलाकर मथुरा की यह बैठक संघ की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह खुद को सिर्फ वैचारिक संगठन नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाली ताकत के रूप में स्थापित करना चाहता है. हिंदुत्व को व्यापक सामाजिक एजेंडे से जोड़ना, ओबीसी और पसमांदा मुस्लिमों पर फोकस, और BJP सरकार व संगठन के साथ बेहतर समन्वय, ये सभी पहलू 2027 की तैयारी की कड़ियां हैं. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि आने वाले महीनों में यूपी में संघ की गतिविधियां और तेज होंगी. मोहल्लों, बस्तियों और गांवों में प्रचारकों की बढ़ी मौजूदगी सीधे तौर पर चुनावी माहौल को प्रभावित करेगी.