सिर्फ 66 रुपए की दिहाड़ी! छत्तीसगढ़ में धरने से मिड-डे मील रसोइयों का खस्ताहाल कैसे उजागर हुआ?

छत्तीसगढ़ में बीते एक महीने से धरने पर बैठे मिड-डे मील रसोइयों में से अब तक दो लोगों की मौत हो चुकी है. ये सरकार से अपना मानदेय बढ़ाने की मांग कर रहे हैं

छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील रसोइए अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे
छत्तीसगढ़ में मिड-डे मील रसोइए अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे

इंदू ठाकुर छत्तीसगढ़ राजनांदगांव जिले की रहनेवाली हैं. वे हफ्ते के पांच दिन सुबह 10 बजे स्कूल आती हैं. बर्तन साफ करती हैं, सब्जी काटती हैं फिर पकने के लिए चावल और दाल चढ़ाती हैं. दोपहर 1 बजे बच्चों को खाना खिलाती हैं. कभी दो बजे तो कभी तीन बजे घर आती हैं. इस काम के उन्हें 66 रुपए मिलते हैं, यानी महीने के 1320 रुपए मात्र. इंदू 10 बजे से पहले या फिर 3 बजे के बाद कोई दूसरा काम नहीं कर पातीं जिससे कि उनको अतिरिक्त आमदनी हो.

ये हालात बदलने के लिए मिड डे मील बनाने वाले रसोइए, जिनमें 80 फीसदी महिलाएं हैं, बीते एक महीने के रायपुर में धरना दे रहे हैं. रुक्मिणी सिन्हा (45 साल) भी इन्हीं में से एक थीं. बीते 20 दिसंबर को धरना में शामिल होने बेमेतरा जिले के अपने गांव सिंवार सोंध से रायपुर पहुंची. चार दिन बाद उनकी तबीयत खराब हो गई.  उन्हें वापस गांव लौटना पड़ा और हालत इतने बिगड़े कि 25 दिसंबर को उनका निधन हो गया.

रुक्मिणी के बेटे देवेंद्र बताते हैं, "पिताजी की मृत्यु साल 2006 में ही हो गई थी. मां ने रसोइये का काम कर हमें पाला और पढ़ाया. एक भाई और बहन की शादी कराई. बहन ससुराल और भाई मामा के यहां रहता है. मैं विकलांग हूं. हालात इतने बुरे हैं कि मां के दाह-संस्कार के लिए 20 हजार रुपए चंदा जमा करना पड़ा है.’’ 

बीते 29 दिसंबर से अनिश्चितकालीन धरना पर बैठे रसोइयों का कहना है कि उनके भुगतान में कम से कम 50 फीसदी तक की बढ़ोत्तरी तत्काल होनी चाहिए. पूरे राज्य में 88 हजार से अधिक रसोइये इस वक्त कार्यरत हैं. इस धरने के बीच सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, चक्का जाम और सरकारी काम में बाधा पहुंचाने के आरोप में 600 से अधिक अज्ञात लोगों के खिलाफ बीते 31 जनवरी को भारतीय न्याय संहिता की धारा 126(2) और 191(2) के तहत मामला दर्ज किया है

यही नहीं, आंदोलन के दौरान ही बीते 25 जनवरी को एक और महिला की मौत हो गई है. दुलारी यादव बेमेतरा ज़िले के बेरला ब्लॉक के सलधा गांव में बने सरकारी स्कूल में रसोइए का काम करती थीं. धरना-प्रदर्शन के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ गई, जिसके बाद 25 जनवरी 2026 को उन्हें रायपुर के डॉ. भीमराव आंबेडकर स्मृति अस्पताल में भर्ती कराया गया. बाद में उन्हें एक निजी अस्पताल में रेफर किया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई. इस मौत पर प्रतिक्रिया देते हुए सीएम विष्णुदेव साय ने कहा, "मृतक रसोइया थी, लेकिन उनकी मौत का आंदोलन से कोई लेना देना नहीं है. जहां तक मिड-डे मील कर्मियों की मांगों का सवाल है तो हमारे शिक्षा विभाग के अधिकारियों ने आंदोलनरत रसोइयों से संपर्क किया है. उनकी मानदेय में 50 प्रतिशत बढ़ोतरी की मांग है. जिसमें सरकार अभी 25 प्रतिशत तक बढ़ाने के लिए तैयार भी है.’’  

सियासत तेज 

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज ने सवाल उठाया है कि इन मौत की जिम्मेदारी कौन लेगा. उन्होंने कहा, "किसानों की मौत होती है तो सरकार उन्हें किसान मानने को तैयार नहीं है. यहां तो धरना पर बैठी रसोइये की मौत हुई है और सरकार इसे भी नहीं मान रही. यह एक तरीके से दिवालिया मानसिकता की निशानी है. बजाय ऐसी बयानबाजी के, सरकार को सीधे धरनास्थल पर पहुंचकर आंदोलनरत कर्मियों से बातचीत करनी चाहिए.’’  

यह कोई पहली बार नहीं है जब रसोइए अपनी मांगों को लेकर सड़क पर उतरे हैं. इससे पहले कई बार राष्ट्रीय स्तर पर भी आंदोलन हुए हैं. दिसंबर 2024 में देश के 14 राज्यों से सैकड़ों मिड-डे मील कामगार, मिड-डे मील वर्कर्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (MDMWFI) के बैनर तले इकट्ठा हुए थे. इन लोगों ने रोजगार के नियमितीकरण, साल में 12 महीने के लिए 26,000 रुपए प्रति माह का न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा लाभ और अपने लिए पेंशन आदि की मांग की थी. 

छत्तीसगढ़ में चल रहे धरने पर रसोइया संघ के अध्यक्ष रामराज्य कश्यप कहते हैं, "मृतकों को किसी तरह का कोई मुआवजा नहीं दिया गया. यहां आंदोलन कर रहे लोगों में 35 से अधिक लोग बीमार हैं. लगभग सभी को सर्दी, खांसी की शिकायत है. हम सरकार से केवल अपना वाजिब हक ही तो मांग रहे हैं. किसी स्कूल में अगर छात्र-छात्राओं की संख्या कम हो जाती है तो रसोइयों को निकाल दिया जाता है. ऐसे फैसले तुरंत बंद होने चाहिए. साथ ही हमें अशंकालिक से पूर्णकालिक किया जाना चाहिए.’’  

रसोइयों को मिलने वाले पैसे का हिसाब क्या है 

देश में 25 लाख के करीब मिड डे मील वर्कर काम कर रहे हैं जो देश के 12 करोड़ बच्चों के लिए दोपहर का भोजन बनाते हैं.  इनके लिए तय राशि का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार देती है और 40 प्रतिशत राज्य सरकार.  हालांकि पहाड़ी राज्यों में केंद्र का हिस्सा 90 प्रतिशत तक रहता है. 

रसोइयों को ग्रीष्मावकाश के दो महीने मई-जून को छोड़कर 10 महीने का मानदेय दिया जाता है. 13 दिसंबर 2023 को संसद में तत्कालीन शिक्षा राज्य मंत्री अन्नपूर्णा देवी की ओर से दिए गए बयान के मुताबिक केरल सबसे ज्‍यादा 12,000 रुपए का भुगतान करता है तो वहीं दिल्ली, गोवा और कई पूर्वोत्तर राज्यों सहित 10 राज्यों में यह सिर्फ 1,000 रुपए मासिक है. 

देश में राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी 5,340 रुपए प्रति माह यानी लगभग 178 रुपए प्रति दिन है. इसके नीचे कोई भी राज्य अपना न्यूनतम वेतन तय नहीं कर सकता. चूंकि रसोइया-सह-सहायक (सीसीएच) को श्रमिक के रूप में मान्यता नहीं दी गई है, इसलिए सरकार न्यूनतम मजदूरी देने के लिए बाध्य नहीं है. अपने उसी जवाब में अन्नपूर्णा देवी ने संसद को बताया था कि सीसीएच मानद कार्यकर्ता हैं, जो सामाजिक सेवाएं प्रदान करने के लिए आगे आए हैं.  

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