'ठाकुर' के बहाने ममता बनर्जी ने क्यों लिया मोदी को निशाने पर?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर आई एक सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सवाल उठाया है

आज 19 फरवरी को रामकृष्ण परमहंस जयंती है. यह दिन सिर्फ एक आध्यात्मिक स्मृति का मौका भर नहीं है. यह भारत की उस परंपरा को याद करने का दिन भी है जहां भक्ति, अनुभव और करुणा को ज्ञान के बराबर रखा गया. 19वीं सदी के बंगाल में जन्मे रामकृष्ण परमहंस ने धर्म को किताबों से निकाल कर जीवन के अनुभव में उतारा. उन्होंने कहा कि ईश्वर तक पहुंचने के रास्ते अनेक हो सकते हैं लेकिन सत्य एक है. इसी सोच ने आगे चलकर भारत के आध्यात्मिक पुनर्जागरण को नई दिशा दी.
रामकृष्ण परमहंस जयंती हर साल माघ महीने में मनाई जाती है. बंगाल में इसे विशेष श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. कोलकाता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर से लेकर बेलूर मठ तक इस दिन प्रार्थना और भक्ति का माहौल रहता है. आज का दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रामकृष्ण परमहंस को सिर्फ एक संत नहीं माना जाता बल्कि उस सेतु की तरह देखा जाता है जिसने मध्यकालीन भक्ति परंपरा और आधुनिक भारत के विचार जगत को जोड़ा.
लेकिन इस बार जयंती का दिन एक राजनीतिक विवाद की वजह से भी चर्चा में है. सोशल मीडिया पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक तीखी बहस देखने को मिली. विवाद की जड़ रामकृष्ण परमहंस के नाम के साथ ‘स्वामी’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर है.
दरअसल हाल के एक राजनीतिक संबोधन और उससे जुड़े सोशल मीडिया पोस्ट में रामकृष्ण परमहंस के नाम के आगे ‘स्वामी’ शब्द का इस्तेमाल किया गया. इस पर ममता बनर्जी ने आपत्ति जताई. उन्होंने कहा कि रामकृष्ण परमहंस को बंगाल में कभी ‘स्वामी’ नहीं कहा गया. उन्हें ‘ठाकुर’ कहा जाता है. ममता बनर्जी का तर्क था कि धार्मिक परंपराओं और संतों की पहचान को राजनीतिक भाषणों में गलत तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए.
इसके जवाब में नरेंद्र मोदी समर्थक नेताओं और सोशल मीडिया यूजर्स ने कहा कि ‘स्वामी’ एक सम्मानसूचक शब्द है और इसमें आपत्ति की कोई वजह नहीं होनी चाहिए. कुछ ही घंटे में मुद्दा सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा. कुछ लोग इसे आस्था से जोड़कर देख रहे थे तो कुछ इसे बंगाल की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा सवाल बता रहे थे.
इस विवाद को समझने के लिए रामकृष्ण परमहंस के जीवन और परंपरा को समझना जरूरी है. रामकृष्ण का जन्म 1836 में बंगाल के कामारपुकुर गांव में हुआ था. उनका बचपन का नाम गदाधर चट्टोपाध्याय था. छोटी उम्र से ही उनमें आध्यात्मिक झुकाव दिखाई देने लगा था. बाद में वे दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी बने. यहीं उन्होंने गहरे आध्यात्मिक अनुभव किए. वे अलग-अलग साधना पद्धतियों से गुजरे. काली भक्ति, वैष्णव परंपरा, तंत्र साधना. यहां तक कि इस्लाम और ईसाई धर्म के अभ्यास भी किए.
रामकृष्ण परमहंस की खास बात यह थी कि वे खुद को किसी एक धार्मिक पहचान में सीमित नहीं करते थे. वे कहते थे कि जैसे एक ही पानी को अलग अलग नाम दिए जाते हैं वैसे ही ईश्वर भी एक है. रास्ते अलग हैं. यही विचार आगे चलकर उनके शिष्यों के जरिए, जिनमें स्वामी विवेकानंद भी एक रहे, दुनिया भर में फैला.
इसमें कोई दो राय नहीं कि, बंगाल में रामकृष्ण परमहंस को ‘ठाकुर’ कहा जाता है. यह शब्द वहां आत्मीयता और श्रद्धा का प्रतीक है. ठाकुर सिर्फ सम्मान का संबोधन नहीं बल्कि दशकों के भावनात्मक जुड़ाव को भी दिखाता है. बंगाल के घरों में आज भी रामकृष्ण परमहंस को ठाकुर, उनकी पत्नी सारदा को मां और इनके शिष्य विवेकानंद को स्वामी जी कहा जाता है. उनकी तस्वीरों के नीचे यही नाम लिखा मिलता है. ठाकुर, मां और स्वामी जी.
‘स्वामी’ शब्द का प्रयोग आमतौर पर उनके प्रमुख शिष्य स्वामी विवेकानंद के लिए किया जाता है. विवेकानंद ने ही रामकृष्ण परमहंस के विचारों को संगठित रूप दिया. उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की और बाद में रामकृष्ण मठ की परंपरा को मजबूत किया. इसलिए बंगाल की सांस्कृतिक स्मृति में ‘स्वामी’ शब्द विवेकानंद के साथ ज्यादा जुड़ा हुआ है.
रामकृष्ण मठ और मिशन से प्रकाशित कई पुस्तकों में भी यही परंपरा दिखती है. ‘श्रीश्री रामकृष्ण वचनामृत’ जिसे महेंद्रनाथ गुप्ता ने लिखा. इसमें हर जगह उन्हें ‘ठाकुर’ कहा गया है. इसी तरह ‘श्री रामकृष्ण लीला प्रसंग’ और ‘रामकृष्ण परमहंस की जीवनी’ जैसी किताबें भी यही संबोधन इस्तेमाल करती हैं. ये किताबें आज भी रामकृष्ण मठ और मिशन से प्रकाशित होती हैं और प्रमाणिक मानी जाती हैं.
इस पूरे विवाद से एक बात साफ होती है. भारत में संत सिर्फ धार्मिक नहीं होते. वे संस्कृति और पहचान का हिस्सा होते हैं. उनके नाम और संबोधन भी लोगों की भावनाओं से जुड़े होते हैं. रामकृष्ण परमहंस जयंती के दिन उठा ये सवाल हमें याद दिलाता है कि आस्था की भाषा में थोड़ी-सी चूक भी बड़ा विवाद खड़ा कर सकती है.