SIT ने राम मंदिर ट्रस्ट के बड़े लोगों को बचा लिया?
राम मंदिर दान हेराफेरी मामले में आठ कर्मचारियों पर कार्रवाई के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या जांच केवल निचले स्तर तक सीमित रही या शीर्ष जिम्मेदारों की जवाबदेही भी तय होगी?

25 जून की शाम अयोध्या के रामजन्मभूमि थाने में दर्ज हुई एक एफआइआर ने श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और राम मंदिर की दान व्यवस्था को लेकर पूरे देश में नई बहस छेड़ दी. एफआइआर दर्ज होने के कुछ ही समय बाद पुलिस ने आठ लोगों को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया.
इनमें दान की नकदी गिनने वाले कर्मचारी, उनका सुपरवाइजर और पिलग्रिम फैसिलिटी सेंटर के काउंटिंग रूम के इंचार्ज शामिल थे. भारतीय न्याय संहिता की चोरी, कर्मचारी द्वारा आपराधिक विश्वासघात, आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया.
पहली नजर में यह कार्रवाई सख्त और निर्णायक दिखाई देती है, लेकिन जैसे-जैसे जांच की परतें खुलने लगीं, उससे कहीं बड़ा सवाल सामने आ गया. क्या करोड़ों रुपये के चढ़ावे और दान का प्रबंधन करने वाली व्यवस्था में केवल निचले स्तर के कर्मचारी ही जिम्मेदार हो सकते हैं? या फिर एसआइटी ने अपनी शुरुआती रिपोर्ट में उन लोगों तक पहुंचने से परहेज किया, जिनके हाथों में पूरी व्यवस्था की निगरानी थी?
यही सवाल इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू बन गया है. क्योंकि यह मामला केवल कुछ लाख या करोड़ रुपये की कथित हेराफेरी का नहीं, बल्कि उस संस्था की विश्वसनीयता का है, जिसके साथ करोड़ों हिंदुओं की आस्था जुड़ी हुई है.
राम मंदिर आंदोलन की दशकों की यात्रा के बाद बने इस मंदिर में आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु यह मानकर दान देता है कि उसकी एक-एक पाई भगवान के कार्य और मंदिर व्यवस्था में लगेगी. ऐसे में यदि दान प्रबंधन पर सवाल उठते हैं तो उनका प्रभाव केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक भी होता है.
पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब 07 जून को मंदिर में दान की राशि और कीमती सामान के प्रबंधन में कथित अनियमितताओं की बातें सामने आने लगीं. शुरुआत में ट्रस्ट ने इसे गंभीरता से लेते हुए आंतरिक जांच शुरू कराई. बाद में स्वयं राज्य सरकार से स्वतंत्र जांच की मांग की गई. इसके बाद लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय एसआइटी गठित हुई, जिसमें लखनऊ रेंज की आईजी किरण एस और वित्त विभाग के विशेष सचिव नीलरतन कुमार को भी शामिल किया गया.
टीम ने दान पेटियों से राशि निकलने से लेकर गिनती, रिकॉर्डिंग, सुरक्षित रखने, बैंक तक पहुंचाने और पूरी निगरानी व्यवस्था का परीक्षण किया. कर्मचारियों, अधिकारियों और संबंधित एजेंसियों से पूछताछ की गई तथा दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी खंगाले गए.
एसआइटी ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट सरकार को सौंपी और उसके दो दिन बाद ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन की शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई. शिकायत में कहा गया कि एसआइटी की प्रारंभिक रिपोर्ट तथा उपलब्ध मौखिक, दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि दान की गिनती में लगे
कुछ कर्मचारियों ने बार-बार चोरी और हेराफेरी की. एफआइआर में अनुकल्प मिश्रा, लवकुश मिश्रा, सुभाष श्रीवास्तव, टिन्नू यादव, अविनाश शुक्ला, मनीष यादव, करुणेश पांडे और रमाशंकर मिश्रा को नामजद किया गया. यहीं से बहस का दूसरा दौर शुरू होता है. एफआइआर में शामिल अधिकांश लोग दान की गिनती या उससे जुड़े संचालन कार्य में लगे कर्मचारी हैं. सुभाष श्रीवास्तव काउंटिंग रूम के इंचार्ज थे.
टिन्नू यादव सुपरविजन से जुड़ी भूमिका निभाते थे और लंबे समय तक ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय के ड्राइवर भी रहे थे. लेकिन ट्रस्ट से जुड़े रहे किसी शीर्ष पदाधिकारी का नाम एफआइआर में नहीं है. बताया जा रहा है कि एफआइआर दर्ज होने के कुछ देर बाद ही चंपत राय और अनिल मिश्रा ने अपना इस्तीफा श्रीराम जन्म भूमि तीर्थक्षेत्र के ट्रस्ट नृत्य गोपाल दास को सौंप दिया.
हालांकि एफआइआर में महासचिव चंपत राय, वरिष्ठ ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा, ट्रस्ट से जुड़े गोपाल राव अथवा दान प्रबंधन की प्रशासनिक निगरानी करने वाले अन्य किसी वरिष्ठ व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाया गया. यही वह बिंदु है जिसने पूरे विवाद को केवल आपराधिक जांच से निकालकर जवाबदेही की बहस में बदल दिया है.
राजनीतिक दलों का कहना है कि यदि दान की गिनती में व्यवस्थित तरीके से कथित हेराफेरी होती रही तो केवल गिनती करने वाले कर्मचारियों को दोषी मान लेना पर्याप्त नहीं हो सकता. दान में गड़बड़ी को सबसे पहले उठाने वाले अयोध्या के पूर्व सपा विधायक पवन पांडेय के अनुसार किसी भी संस्थान में वित्तीय नियंत्रण की जिम्मेदारी कई स्तरों पर तय होती है. यदि निगरानी प्रणाली प्रभावी होती तो कथित अनियमितताएं इतनी लंबी अवधि तक कैसे चलतीं? विपक्ष का आरोप है कि एसआइटी ने केवल निचले स्तर पर कार्रवाई करके शीर्ष जिम्मेदारों को जांच के दायरे से बाहर रखा है.
हालांकि दूसरी तरफ ट्रस्ट और उससे जुड़े लोगों का पक्ष इससे बिल्कुल अलग है. ट्रस्ट से जुड़े लोगों का कहना है कि इस पूरे मामले का खुलासा किसी बाहरी एजेंसी ने नहीं बल्कि स्वयं ट्रस्ट ने किया. सबसे पहले संदेह ट्रस्ट के भीतर पैदा हुआ. उसके बाद आंतरिक जांच शुरू हुई और फिर राज्य सरकार से एसआइटी जांच की मांग की गई. यदि ट्रस्ट का शीर्ष नेतृत्व मामले को दबाना चाहता तो स्वतंत्र जांच की मांग करने का कोई कारण नहीं था.्
विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने भी इस मामले में उल्लेखनीय रुख अपनाया है. विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक कुमार ने कथित चोरी को अत्यंत दुखद बताते हुए साफ कहा कि दोषी चाहे किसी भी पद पर हो, उसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए. उन्होंने फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा चलाने और जल्द सजा दिलाने की भी मांग की. यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण माना गया क्योंकि विहिप ने इसे राजनीतिक षड्यंत्र कहकर खारिज करने के बजाय पारदर्शी जांच का समर्थन किया. इसके बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि क्या जांच वास्तव में पूरी श्रृंखला तक पहुंचेगी?
पूर्व पुलिस अधिकारियों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में एफआइआर अंतिम निष्कर्ष नहीं होती. जांच एजेंसियां शुरुआत उन लोगों से करती हैं जिनके खिलाफ प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध होते हैं. पूछताछ, बैंक रिकॉर्ड, मोबाइल डेटा, डिजिटल ट्रेल, वित्तीय लेनदेन और अन्य साक्ष्यों के आधार पर बाद में नए नाम जोड़े जा सकते हैं. इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ट्रस्ट के पूर्व शीर्ष पदाधिकारियों को पूरी तरह क्लीनचिट दे दी गई है.
अयोध्या में तैनात एक पुलिस अधिकारी बताते हैं “जांच एजेंसी किसी बड़े अधिकारी का नाम केवल इसलिए नहीं जोड़ सकती कि वह प्रशासनिक रूप से जिम्मेदार पद पर है. उसके लिए आपराधिक मंशा या प्रत्यक्ष भूमिका के प्रमाण जरूरी होते हैं. यदि ऐसे साक्ष्य नहीं हैं तो जल्दबाजी में नाम जोड़ना अदालत में पूरे मामले को कमजोर भी कर सकता है.” लेकिन प्रशासनिक विशेषज्ञ कैलाश चंद्र रमेश इस तर्क को अधूरा मानते हैं.
उनके अनुसार आपराधिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक जवाबदेही दो अलग-अलग बातें हैं. यदि किसी संस्था में वित्तीय अनियमितता होती है तो यह जरूरी नहीं कि हर वरिष्ठ अधिकारी आपराधिक रूप से दोषी हो, लेकिन यह अवश्य देखा जाता है कि निगरानी प्रणाली कहां विफल हुई. यदि करोड़ों रुपये के दान की व्यवस्था में लगातार गड़बड़ी होती रही तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि नियंत्रण प्रणाली की जिम्मेदारी किसकी थी.
वित्तीय ऑडिट विशेषज्ञ रोहित गुप्ता का कहना है कि बड़े धार्मिक ट्रस्टों में दान प्रबंधन की बहुस्तरीय व्यवस्था होती है. दान पेटियों की सीलिंग, सीसीटीवी निगरानी, कई स्तरों पर गिनती, बैंक मिलान, स्वतंत्र ऑडिट और रिकॉर्ड सत्यापन जैसी प्रक्रियाएं इसलिए बनाई जाती हैं कि किसी एक व्यक्ति द्वारा गबन संभव न हो. यदि आरोप सही साबित होते हैं तो इसका मतलब केवल कर्मचारियों की बेईमानी नहीं बल्कि नियंत्रण प्रणाली की विफलता भी हो सकती है. और यह नियंत्रण प्रणाली किसकी देखरेख में काम कर रही थी, उसकी भी जिम्मेदारी तय होती है.
यहीं एक और पहलू सामने आता है. अयोध्या में लंबे समय से ट्रस्ट और मंदिर प्रबंधन के भीतर अलग-अलग प्रभाव समूहों की चर्चा होती रही है. स्थानीय स्तर पर यह माना जाता रहा है कि चंपत राय, ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा और मंदिर प्रबंधन से जुड़े कुछ अन्य प्रभावशाली लोगों के इर्द-गिर्द अलग-अलग समूह सक्रिय रहे हैं. कर्मचारियों की नियुक्ति, व्यवस्थाओं के संचालन और निर्णयों को लेकर अंदरूनी खींचतान की बातें समय-समय पर सामने आती रही हैं. हालांकि इन दावों की कभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई, लेकिन स्थानीय स्तर पर इन्हें लेकर चर्चाएं लगातार चलती रही हैं.
कुछ जानकारों का मानना है कि वर्तमान विवाद के पीछे भी यही अंदरूनी शक्ति संघर्ष एक कारण हो सकता है. उनके अनुसार कई बार संस्थानों के भीतर चल रही प्रतिस्पर्धा ही अनियमितताओं को उजागर करने का माध्यम बन जाती है. हालांकि इस दावे के समर्थन में अभी तक कोई आधिकारिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है.
इसी दौरान 25 जून को ट्रस्ट और विहिप के शीर्ष पदाधिकारियों की बैठक भी चर्चा का विषय बनी. बैठक का एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया, लेकिन माना गया कि दान विवाद, एसआइटी जांच और संगठन की साख पर उसके प्रभाव पर चर्चा हुई. इसके बाद चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के संभावित इस्तीफे की खबरें भी सामने आईं. शुरुआत में तो इसे नकारा गया लेकिन बाद में इस्तीफे की पुष्टि हुई.
स्पष्ट है कि विवाद का दबाव शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच चुका है. इसी कारण इस पूरे प्रकरण में चंपत राय ने एफआइआर न करवाकर ट्रस्ट के सदस्य कृष्ण मोहन ने एफआइआर दर्ज कराई. कृष्ण मोहन भारतीय वन सेवा के सेवानिवृत्त अधिकारी हैं. मूल रूप से हरदोई के रहने वाले कृष्ण मोहन को सितंबर 2025 में राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का नया ट्रस्टी नियुक्त किया गया था. ट्रस्ट में यह पद कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद खाली हुआ था. इससे यह संदेश देने की कोशिश भी दिखाई देती है कि ट्रस्ट मामले को कानूनी प्रक्रिया के जरिए आगे बढ़ाना चाहता है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जांच यहीं रुक जाएगी? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पूछताछ के दौरान यह सामने आता है कि कथित हेराफेरी किसी वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश, जानकारी या संरक्षण में हुई थी तो पुलिस पूरक एफआइआर या चार्जशीट के जरिए नए आरोपियों को भी शामिल कर सकती है. भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में यह पूरी तरह संभव है.
इसलिए वर्तमान एफआइआर को अंतिम सूची नहीं माना जा सकता. दूसरी ओर यदि जांच केवल कर्मचारियों तक सीमित रहती है और निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही तय नहीं होती तो यह विवाद लंबे समय तक बना रहेगा. तब यह सवाल लगातार उठेगा कि क्या वास्तव में पूरे सच तक पहुंचने की कोशिश हुई या फिर जिम्मेदारी की श्रृंखला को जानबूझकर सीमित कर दिया गया.
अयोध्या में साकेत महाविद्यालय के पूर्व आचार्य वी. एन.अरोड़ा कहते हैं “राम मंदिर केवल एक धार्मिक परिसर नहीं है. यह आधुनिक भारत के सबसे बड़े सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों का परिणाम है. इसकी विश्वसनीयता केवल अदालत के फैसलों या भव्य निर्माण से नहीं, बल्कि उसके प्रशासन की पारदर्शिता से भी तय होगी. करोड़ों श्रद्धालु दान इसलिए करते हैं क्योंकि उन्हें संस्था पर भरोसा होता है.
यही भरोसा इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा पक्ष है.” यही कारण है कि इस मामले में जल्दबाजी में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा. उपलब्ध तथ्यों से इतना जरूर स्पष्ट है कि एसआइटी की शुरुआती रिपोर्ट के आधार पर प्रत्यक्ष साक्ष्य वाले कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू हुई है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि शीर्ष स्तर की जवाबदेही पर अभी अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है. इसलिए यह कहना कि बड़े जिम्मेदार पूरी तरह बच गए हैं, फिलहाल तथ्यात्मक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सकता. वहीं यह सवाल उठाना भी पूरी तरह स्वाभाविक है कि यदि पूरी व्यवस्था की निगरानी वरिष्ठ स्तर पर थी तो उसकी जिम्मेदारी की जांच किस सीमा तक होगी.