राजकोट हादसा : गुजरात हाई कोर्ट ने राज्य सरकार पर भरोसा न करने की बात क्यों कही?

गुजरात के राजकोट में स्थित टीआरपी गेमिंग जोन में 25 मई को भीषण आग लग गई थी. इस हादसे में अब तक 33 लोगों की मौत हुई है जिनमें नौ बच्चे शामिल हैं

राजकोट के टीआरपी गेम जोन में 25 मई को भीषण आगलगी के बाद बचाव का एक दृश्य
राजकोट के टीआरपी गेम जोन में 25 मई को भीषण आगलगी के बाद बचाव का एक दृश्य

पिछले चार सालों से गुजरात के राजकोट में नाना मावा रोड पर स्थित टीआरपी गेमिंग जोन छुट्टियों के दिन इलाके के लोगों के लिए मनोरंजन स्थल बना हुआ था. लेकिन अस्थायी रूप से बने और बिना सुरक्षा इंतजामों के चल रहे इस गेमिंग जोन में जैसे हादसा अपने दिन का इंतजार कर रहा था. शनिवार, 25 मई वह मनहूस दिन साबित हुआ जब टीआरपी गेमिंग जोन में भीषण आग लग गई. इस हादसे में अब तक 33 लोगों की मौत हुई है जिनमें नौ बच्चे शामिल हैं. 

'आग लगने पर कुआं खोदा जाता है' हमारे देश में यह कहावत यूं ही नहीं बनी होगी. दरअसल इन मासूम बच्चों की मौत की कीमत पर ही शिथिल पड़े सिस्टम में थोड़ी हरकत हुई है. गुजरात हाई कोर्ट ने इस दुर्घटना का स्वत: संज्ञान लेते हुए इसे "मानव निर्मित" आपदा करार दिया.  उसने राज्य सरकार को जमकर फटकार लगाते हुए कुछ कड़े सवाल पूछे हैं. लेकिन घटना की तह में जाने पर पता चलता है कि हमारे यहां आम लोगों के जीवन का मोल दरअसल कौड़ियों से भी कम आंका जाता है.

विभिन्न रिपोर्ट्स में यह बताया गया है कि 2021 में स्थापना के बाद टीआरपी गेमिंग जोन ने इस साल तक फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट के लिए आवेदन नहीं किया था. 27 मई को राज्य सरकार की ओर से गुजरात हाई कोर्ट में पेश हुईं अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीषा लवकुमार शाह ने भी यह माना कि अहमदाबाद-गांधीनगर में कम से कम दो गेमिंग जोन बिना परमीशन के संचालित हो रहे थे. जब उन्होंने यह जानकारी और दी कि इन परिसरों से संबंधित फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट के मुद्दों को पिछले चार सालों से हल नहीं किया गया था तो अदालत बहुत नाराज हुई.

प्रशासन की इस लापरवाही पर हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति बीरेन वैष्णव और देवन देसाई की अवकाश पीठ ने कहा, "क्या आप अंधे हो गए हैं? क्या आप सो गए थे? अब हमें लोकल सिस्टम और राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है." पीठ ने नगर आयुक्त से पूछा कि उन्हें इस "मानव निर्मित आपदा" के लिए निजी रूप से जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया जाना चाहिए. न्यायाधीशों ने सुरक्षा मानदंडों का उल्लंघन करके अवैध गेमिंग जोन को संचालित करने की अनुमति देने के लिए शहरी स्थानीय निकायों को भी कड़ी फटकार लगाई. अदालत ने राजकोट के उन शीर्ष अधिकारियों को भी नहीं बख्शा, जिनकी तस्वीरें हादसे के बाद विभिन्न सोशल मीडिया मंचों और स्थानीय मीडिया में प्रसारित हो रही हैं. 

हादसे से पहले की इन तस्वीरों में नगर आयुक्त अमित अरोड़ा, कलेक्टर अरुण महेश बाबू, पुलिस उपायुक्त जोन-1 प्रवीण मीना और पुलिस अधीक्षक बलराम मीना कथित तौर पर टीआरपी गेमिंग जोन में मौजूद दिख रहे हैं. अदालत ने इस पर टिप्पणी करते हुए पूछा, "ये अधिकारी कौन थे? क्या वे वहां खेलने गए थे?" 

चार साल पहले टीआरपी गेमिंग जोन को छह लोगों ने मिलकर खोला था. ये सभी इसके मालिक हैं और संचालन का जिम्मा संभालते हैं. राज्य सरकार की अब तक की कार्रवाई के तहत राजकोट पुलिस ने इन छह में से तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है. इसके अलावा सरकार ने ड्यूटी में लापरवाही के लिए सात अधिकारियों को निलंबित भी कर दिया है. इनमें दो कार्यकारी अभियंता, एक सहायक अभियंता, दो पुलिस निरीक्षक, एक टाउन प्लानर और एक फायर स्टेशन अधिकारी शामिल है. 

हालांकि नाराज हाई कोर्ट ने सरकार को फटकार लगाते हुए राजकोट, सूरत, अहमदाबाद और वडोदरा के नगर आयुक्तों को निर्देश दिया कि वे ऐसी गेमिंग सुविधा केंद्रों की फायर सेफ्टी, ढांचागत स्थिरता प्रमाणपत्र से संबंधित मुद्दों के बारे में हलफनामा दाखिल करें. 

गुजरात सरकार की बेपरवाही को ऐसे समझा जा सकता है कि उसने साल 2014 में मॉल और दुकानों जैसे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए जीडीसीआर (सामान्य विकास नियंत्रण नियम) जारी किया था. इसके तहत 'मनोरंजन क्षेत्र' भी शामिल किए गए थे. लेकिन सरकार ने उसके बाद यह अपडेट ही नहीं किया कि इसे संचालित करने के लिए क्या मानदंड अपनाए जाएंगे. खासकर उन क्षेत्रों पर भी ध्यान नहीं दिया गया जहां बच्चे और किशोर ज्यादातर आवाजाही करते थे. 

शायद यही वजह है कि हाई कोर्ट ने इस हादसे को "मानव निर्मित आपदा" करार दिया. स्थानीय मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की कि राजकोट में गेमिंग जोन ने जीडीसीआर नियमों में खामियों का फायदा उठाया है, जिसने अधिकारियों के मंजूरी के बिना इन मनोरंजक व्यवसायों को स्थापित करने का रास्ता मजबूत किया. अदालत ने कहा कि नियामक मंजूरी, खासकर फायर सेफ्टी के मुद्दे से बचने के लिए गेमिंग जोन अस्थायी ठिकानों से संचालित हो रहे थे. 

गुजरात में बच्चों और युवाओं के लिए इस तरह के कई बड़े मनोरंजन सुविधा केंद्र, जिन्हें 'गेमिंग आर्केड' या 'प्ले एरिया' कहा जाता है, बड़ी संख्या में चल रहे हैं. इनमें से ज्यादातर अहमदाबाद, सूरत, वडोदरा और राजकोट जैसे शहरों की मुख्य सड़कों पर ही संचालित हो रहे हैं. 26 मई को हाई कोर्ट की अवकाश पीठ ने राज्य सरकार और नगर निगमों को नोटिस जारी कर पूछा था कि राज्य में गेमिंग जोन किस कानून के नियमों के तहत चल रहे हैं?

राजकोट में जिस टीआरपी गेमिंग जोन में हादसा हुआ, वह दरअसल दो मंजिला टिन से बना एक अस्थायी ठिकाना भर था. इसमें केवल एक ही साझा दरवाजा था जिससे होकर प्रवेश और निकास दोनों होता था. ऐसे में जब आग लगी तो वहां फंसे लोगों के लिए उस दरवाजे से होकर भागना और इमरजेंसी सेवाओं को संचालित करना भी मुश्किल हो गया. हालांकि अभी तक यह सामने नहीं आया है कि वहां आग किस वजह से लगी. लेकिन प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, आग की लपटें ग्राउंड फ्लोर पर स्थित इनडोर गेमिंग फैसिलिटी से शुरू हुई थीं और कुछ ही सेकंड में इसने पूरे ठिकाने को जद में ले लिया. 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसके पीछे शॉर्ट सर्किट भी जिम्मेदार हो सकता है. लेकिन भीषण आगलगी की ये घटना मुख्य रूप से फायर सेफ्टी के एवज में बरती गई कई खामियों की वजह से घटी. परिसर में ग्राउंड फ्लोर को पहली मंजिल से जोड़ने के लिए सिर्फ एक ही सीढ़ी थी. इसके अलावा बिजली जनरेटर और गो-कार्टिंग कारों के संचालन के लिए अंदर अनुमानित 3500 लीटर पेट्रोल जमा किया गया था.  

इस हादसे में टीआरपी गेमिंग जोन पल भर में राख का ढेर बन गया. 33 लोगों के मरने के अलावा करीब 15 लोग लापता बताए जा रहे हैं. हो सकता है कि इनमें से कुछ हादसे का शिकार हो गए हों! बहरहाल, इन लोगों की शिनाख्त में समय लग सकता है. क्योंकि शव बुरी तरह जल चुके हैं. इन्हें पहचानने के लिए अब डीएनए टेस्ट की जरूरत होगी. इस बीच सरकार ने हादसे की जांच के लिए एक एसआईटी का गठन किया है. यह 29 मई तक अपनी शुरुआती रिपोर्ट सरकार को सौंपेगा. इसके अलावा सरकार ने सभी गेमिंग फैसिलिटी सेंटर को निर्देश दिया है कि फायर सेफ्टी और अन्य नियमों के अप्रूवल तक संचालन बंद रखें. 

इधर, विपक्ष ने सरकार के इन उपायों की कड़ी आलोचना की है और कहा कि ये अपर्याप्त और बहुत देर से उठाए गए कदम हैं. कांग्रेस और कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इस बात की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश की कि प्रशासनिक उदासीनता के कारण गुजरात में बार-बार जानलेवा मानवीय हादसे हुए हैं.

प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता मनीष दोशी ने कई घटनाओं का जिक्र किया. सवालिया अंदाज में उन्होंने सरकार से पूछा, "2019 में सूरत में एक अवैध ट्यूशन सेंटर में आग लग गई थी, जिसमें 22 बच्चे मारे गए थे. इस साल जनवरी में वडोदरा में हरनी झील पर नाव पलटने से 12 बच्चे मारे गए.  संचालक ने क्षमता से दोगुने यात्रियों को बिना लाइफ जैकेट के नाव पर बिठाकर नियमों का उल्लंघन किया था. जबकि नगरपालिका ने उसे बोटिंग का ठेका दिया था. राज्य सरकार अपनी नींद से कब जागेगी?"

देखा जाए तो राज्य में बड़े-बड़े हादसे नियमित अंतराल पर होते रहे हैं. साल 2022 में राज्य में विधानसभा चुनाव से ठीक एक महीना पहले मोरबी शहर में केबल ब्रिज गिरने से 135 लोगों की मौत हो गई थी. जांच में पता चला कि निजी ठेकेदार ने पुल का रखरखाव ठीक से नहीं किया था और जिस दिन वो हादसा हुआ उस दिन पुल पर क्षमता से अधिक लोगों की काफी भीड़ मौजूद थी. 

गुजरात कांग्रेस के प्रमुख शक्तिसिंह गोहिल ने कहा कि राज्य के लोगों ने भाजपा को भारी मतों से विधानसभा में 182 में से 156 सीटें दिलायी. फिर भी पार्टी उनके जीवन के प्रति जिम्मेदार महसूस नहीं करती. उन्होंने सत्ताधारी भाजपा पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, "मैं पूरी जिम्मेदारी से आरोप लगा रहा हूं कि ऐसे मनोरंजन केंद्र भाजपा को प्रोटेक्शन मनी देने के बाद संचालित होते हैं. ये केंद्र चोरी-छिपे कोनों में नहीं, बल्कि सभी की नजरों में संचालित होते हैं. प्रशासन उनके अवैध संचालन के बारे में अज्ञानता का दावा कैसे कर सकता है?"

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