VIP कल्चर या नियमों का मखौल! मंत्री के निजी समारोह में गार्ड ऑफ ऑनर पर उठे सवाल
राजस्थान में नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा की बेटी की शादी के दौरान सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग से लेकर गार्ड ऑफ ऑनर के नियम तोड़े जाने तक के आरोप लग रहे हैं

राजस्थान की सियासत में इन दिनों एक शादी चर्चा का केंद्र बनी हुई है. इसकी वजह शादी की रस्में या रिश्ते नहीं, बल्कि सत्ता और सिस्टम का कथित दुरुपयोग है. सूबे के नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा की बेटी के विवाह समारोह में सरकारी संसाधनों और प्रोटोकॉल नियमों का उल्लंघन कई सवाल खड़े कर गया.
सीकर जिले के भारणी गांव में 21 अप्रैल को आयोजित इस भव्य विवाह समारोह में मंत्री की बेटी का विवाह विराटनगर विधायक कुलदीप धनखड़ के बेटे के साथ हुआ. कार्यक्रम में देश और प्रदेश की सियासत के कई बड़े चेहरे मौजूद रहे. सिक्किम के राज्यपाल ओम प्रकाश माथुर और राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े भी इस शाही शादी के मेहमान बने.
मंत्री ने शादी के कार्ड पर अपना पद नहीं लिखकर सादगी का संदेश देने की कोशिश ज़रूर की, मगर जमीनी हकीकत ने इस सादगी की परत जल्दी ही हटा दी. अपने व्यक्तिगत और निजी कार्यक्रम में दो बार गार्ड ऑफ ऑनर दिलाकर प्रोटोकॉल नियमों का माखौल उड़ाया गया. वहीं जयपुर से करीब 100 किलोमीटर दूर उनके विभाग की दमकलें इस गांव में बनाए जा रहे मंडप में पानी का छिड़काव करती नज़र आईं. ये दमकलें जयपुर विकास प्राधिकरण की थीं, जिन्हें मंत्री के निजी कार्यक्रम में बुलाया गया था.
बड़ा विवाद तब खड़ा हुआ जब समारोह के दौरान पुलिस ने दो बार गार्ड ऑफ ऑनर दिया. यह एक ऐसा सम्मान है जो आमतौर पर राष्ट्रीय पर्वों या सरकारी आयोजनों तक सीमित होता है. हालांकि, मंत्री की ओर से यह हवाला दिया गया कि राज्यपाल के आगमन पर सलामी दी गई थी, मगर जिस स्थान और संदर्भ में यह हुआ, उसने पूरे मामले को विवादास्पद बना दिया.
राजस्थान में गार्ड ऑफ ऑनर को लेकर प्रोटोकॉल हमेशा सख्त रहा है. नियम साफ कहते हैं कि यह सम्मान केवल आधिकारिक सरकारी कार्यक्रमों और राष्ट्रीय पर्वों के अवसरों पर ही दिया जा सकता है. 26 जनवरी को राज्यपाल और 15 अगस्त को मुख्यमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर देने की परंपरा रही है. इसके अलावा, यह सम्मान उन विशिष्ट मौकों पर दिया जाता है जहां राज्य या राष्ट्र की औपचारिक उपस्थिति होती है.
इतिहास भी इस सख्ती की गवाही देता है. 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को गार्ड ऑफ ऑनर देने से इनकार कर दिया गया था, क्योंकि वह कार्यक्रम प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं था. 2017 में जोधपुर में केंद्रीय गृह मंत्री के दौरे के दौरान भी इसी तरह का विवाद हुआ था. ऑनर गार्ड ने अपने वेतन-भत्तों में की गई कटौती के विरोध में गृहमंत्री को गार्ड ऑफ ऑनर व सलामी देने से मना कर दिया था. राजस्थान के पूर्व राज्यपाल कल्याण सिंह ने तो 2018 में खुद गार्ड ऑफ ऑनर लेना ही बंद कर दिया था. कल्याण सिंह ने एक आदेश जारी कर यह कहा कि इस परंपरा का इस्तेमाल सीमित और मर्यादित होना चाहिए.
हाल ही में उत्तर प्रदेश में एक कथावाचक को गार्ड ऑफ ऑनर दिए जाने का मामला भी विवादों में रहा था, जहां एक निजी धार्मिक व्यक्ति को पुलिस सलामी देती नज़र आई थी. उस घटना ने भी यही सवाल उठाया था कि क्या सरकारी सम्मान अब निजी प्रभाव और पहुँच का हिस्सा बनते जा रहे हैं?
प्रोटोकॉल नियमों के अनुसार गार्ड ऑफ ऑनर कोई सामान्य औपचारिकता नहीं है. यह राज्य की ओर से दिया जाने वाला एक प्रतीकात्मक सम्मान है जो संविधान, संस्थाओं और पदों की गरिमा का प्रतिनिधित्व करता है. यह किसी व्यक्ति विशेष की लोकप्रियता या निजी कार्यक्रम के लिए नहीं, बल्कि उसके संवैधानिक पद या असाधारण सेवा के लिए दिया जाता है. भारतीय प्रोटोकॉल स्पष्ट रूप से कहता है कि निजी कार्यक्रमों में आने वाला कोई भी व्यक्ति इस सम्मान का हकदार नहीं है, चाहे उसका पद कितना भी ऊँचा क्यों न हो.
राजस्थान कांग्रेस के प्रवक्ता जसवंत गुर्जर कहते हैं, "एक तरफ देश में गार्ड ऑफ ऑनर जैसी परंपरा को बंद किए जाने की बहस चल रही है, वहीं दूसरी ओर BJP के मंत्री अपने निजी कार्यक्रमों में पुलिस से गार्ड ऑफ ऑनर दिलवा रहे हैं. यह कदम इस परंपरा का अपमान ही नहीं, बल्कि पुलिस के आत्मविश्वास पर भी चोट है. मंत्री को अपने इस कृत्य के लिए प्रदेश की जनता से सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी चाहिए."
कुल मिलाकर मंत्री की बेटी की शादी जैसे निजी आयोजन में गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाना कई स्तरों पर सवाल खड़े करता है. क्या यह प्रोटोकॉल की अनदेखी है या फिर उस वीआईपी संस्कृति का विस्तार, जहाँ नियमों की व्याख्या शक्ति (पावर) के हिसाब से बदल जाती है?
क्या है गार्ड ऑफ ऑनर
गार्ड ऑफ ऑनर एक औपचारिक परंपरा है जो सेना और राज्य प्रोटोकॉल में निभाई जाती है. भारत में इसका मतलब गणतंत्र की ओर से आधिकारिक सम्मान दिखाना है, न कि किसी व्यक्ति की प्रशंसा करना. यह संविधान, सशस्त्र बल और राज्य के अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करता है. यह सम्मान रक्षा मंत्रालय, सैन्य नियमावली और सरकारी समारोह के दिशा-निर्देशों के तहत स्थापित प्रोटोकॉल मानदंडों द्वारा निर्देशित होता है.
इस परंपरा के पीछे बड़ा सिद्धांत यह है कि सम्मान किसी पद या बलिदान से जुड़ा होता है, न कि लोकप्रियता, निजी कार्यक्रम या फिर धार्मिक स्थिति से. भारत में गार्ड ऑफ ऑनर उन व्यक्तियों के लिए आरक्षित है जो संवैधानिक या आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त पदों पर हैं. इसमें भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शामिल हैं. यह आधिकारिक यात्राओं के दौरान दूसरे देशों के राष्ट्रपतियों या प्रधानमंत्रियों जैसे विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को भी दिया जाता है.
राजनीतिक पदों के अलावा, वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को कमान परिवर्तन या सेवानिवृत्ति परेड जैसे बड़े समारोहों के दौरान गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है. इसी के साथ सशस्त्र बल, अर्धसैनिक बल और पुलिस कर्मी जो कर्तव्य के दौरान अपनी जान गंवाते हैं, उन्हें भी उनके बलिदान के सम्मान के रूप में गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है.
प्रोटोकॉल साफ तौर पर कहता है कि निजी कार्यक्रम में आने वाला कोई भी व्यक्ति गार्ड ऑफ ऑनर का हकदार नहीं है. प्रशासन चाहे तो उन्हें हेलीपैड या जिले की सीमा में प्रवेश के दौरान किसी भी सरकारी कार्यालय में यह सम्मान दे सकता है. इसके अलावा धार्मिक, सामाजिक या सांस्कृतिक प्रभाव के आधार पर भी किसी को गार्ड ऑफ ऑनर का हकदार नहीं माना जा सकता.