राजस्थान में ‘दो संतान’ की नीति बदलने का फैसला सुधार या दबाव में झुकी सरकार?
राजस्थान में अब पंचायती राज व नगरीय निकायों में नहीं गूंजेगा 'बच्चे दो ही अच्छे' का नारा

राजस्थान की सियासत में एक बार फिर जनसंख्या, विचारधारा और चुनावी गणित आमने-सामने आ खड़े हुए हैं. मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की कैबिनेट ने 24 फरवरी को अपनी ही पार्टी की पूर्ववर्ती भैरोंसिंह शेखावत सरकार के तीन दशक पुराने उस नियम को खत्म कर दिया, जिसने पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में दो से अधिक संतान वाले लोगों की राह रोक रखी थी.
साल 1995 में राजस्थान की तत्कालीन भैरोसिंह शेखावत सरकार ने जनसंख्या विस्फोट रोकने के लिए पंचायत व नगरीय निकाय चुनाव में दो संतान की बाध्यता लागू की थी. उस वक्त इसे एक साहसिक निर्णय के तौर पर देखा गया था. इसके बाद राजस्थान में पांच सरकारें बदल चुकी हैं, मगर किसी ने भी इस फैसले को पलटने की कोशिश नहीं की.
राजस्थान पंचायती राज अधिनियम 1994 की धारा 19 और राजस्थान नगर पालिका अधिनियम 2009 की धारा 24 में यह प्रावधान किया गया था कि दो से अधिक संतान वाले व्यक्ति प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनाव में भागीदारी नहीं कर सकेंगे. चुनाव जीतने के बाद अगर किसी पंचायत या निकाय प्रतिनिधि के दो से अधिक संतान होती हैं, तो उसे पद से हटाने का प्रावधान था. बाद में 1 जून 2002 से यही नियम सरकारी कर्मचारियों पर भी लागू हुआ, जिसके तहत दो से अधिक संतान होने पर कर्मचारियों की पदोन्नति और वेतनवृद्धि पर रोक लगाई गई. राजस्थान की पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार ने 2023 में सरकारी कर्मचारियों के लिए दो संतान की बाध्यता को हटा दिया था.
भजनलाल सरकार ने अब पंचायत व नगरीय निकाय प्रतिनिधियों के लिए भी 'टू चाइल्ड पॉलिसी' को खत्म करने का निर्णय लिया है. सरकार के इस निर्णय पर संसदीय कार्यमंत्री जोगाराम पटेल कहते हैं, ''1995 में जब यह फैसला लिया गया था, तब राजस्थान में जनसंख्या वृद्धि दर 3.2 फीसदी थी जो अब घटकर 2 फीसदी पर आ गई है. इसलिए अब इस नियम की कोई आवश्यकता नहीं रह गई है. इसी के चलते कैबिनेट ने राजस्थान पंचायती राज संशोधन बिल 2026 और राजस्थान नगरपालिका संशोधन बिल 2026 को मंजूरी दी है.''
भजनलाल सरकार का यह फैसला महज सांख्यिकीय तर्कों तक सीमित नहीं रहा है. इसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थों ने बहस को और भड़का दिया है. समाजशास्त्री डॉ. राजीव गुप्ता कहते हैं, ''सरकार का यह निर्णय महिलाओं की स्वाधीनता पर प्रहार है तथा पितृसत्ता को वापस पुनर्स्थापित करने वाला है. सरकार ने महिलाओं के 'मेरा शरीर-मेरा निर्णय' के अधिकार को ठेस पहुंचाते हुए उन्हें बच्चा पैदा करने की मशीन मान लिया है. सरकार के इस निर्णय का समाज के गरीब और निम्न तबके पर बहुत बुरा असर दिखाई देगा.''
विवाद इसलिए भी तेज हुआ है क्योंकि इस फैसले से ठीक पहले बागेश्वर धाम के महंत धीरेंद्र शास्त्री ने पुष्कर में हिंदुओं को चार बच्चे पैदा करने की सलाह दी थी. उससे पहले लखनऊ में BJP के पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू दंपतियों को तीन बच्चे पैदा करने का सुझाव दिया था. अजमेर के पुष्कर में हनुमंत कथा करने आए धीरेंद्र शास्त्री ने समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत करते हुए कहा था, ''हिंदू को कम-से-कम 4 बच्चे पैदा करने चाहिए. हमारी शादी अभी नहीं हुई तो हम पर तो लोग कमेंट करेंगे कि बाबा तुम्हारा क्या योगदान है. तो जब हमारा ब्याह हो जाएगा, तो हम भी हिंदुओं की आबादी बढ़ाने में अपना योगदान देंगे.''
17 फरवरी को मोहन भागवत ने कहा था, ''प्रत्येक हिंदू दंपति को तीन बच्चे पैदा करने चाहिए. जो समाज तीन से कम बच्चे पैदा करता है, वह भविष्य में समाप्त हो जाता है. तीन बच्चे पैदा करने की बात हमारे नव दंपतियों को बताई जानी चाहिए.''
मोहन भागवत व धीरेंद्र शास्त्री के बयानों के तुरंत बाद भजनलाल सरकार के दो संतान की बाध्यता खत्म करने संबंधी इस निर्णय पर विपक्ष ने जोरदार हमला किया है.
प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा, ''अब फैसले जनसंख्या नियंत्रण के आधार पर नहीं, बल्कि विचारधारा के दबाव में लिए जा रहे हैं. राजस्थान में क्या कानून बनेगा, यह संघ प्रमुख मोहन भागवत और कथावाचक धीरेंद्र शास्त्री जैसे लोग तय कर रहे हैं. संघ को खुश करने के लिए पंचायत चुनाव के नियम बदले गए हैं.''
राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने कहा, ''भारत दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है, आबादी में हमने चीन को पीछे छोड़ दिया है. ऐसे में सरकार ठोस जनसंख्या नियंत्रण नीति पर काम करने की जगह सिर्फ चुनावी समीकरण साधने में जुटी है.''
इधर, भजनलाल सरकार के कैबिनेट मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने कांग्रेस के इन आरोपों को निराधार बताया है. राठौड़ ने कहा, ''यह फैसला समय की जरूरत को देखते हुए लिया गया है, इसका संघ प्रमुख मोहन भागवत या धीरेंद्र शास्त्री के बयानों से कोई संबंध नहीं है. अगर किसी के बयान के आधार पर फैसला लेना होता, तो तीन बच्चों की बात भी की जा सकती थी. यह कदम सामाजिक यथार्थ और लोकतांत्रिक समावेशन को ध्यान में रखकर उठाया गया है, न कि किसी वैचारिक दबाव में.''
गौर करने वाली बात है कि राजस्थान में BJP और इससे जुड़े संगठन पिछले लंबे समय से पंचायती राज और शहरी निकायों में दो बच्चों की बाध्यता को हटाए जाने की मांग कर रहे थे. सरकारी कर्मचारियों को जब दो संतान की बाध्यता से मुक्त कर दिया गया, तब पंचायती राज व निकाय प्रतिनिधि भी इस नियम को हटाने की मांग करने लगे थे.
सरपंच संघ कई बार सरकार को इस संबंध में ज्ञापन दे चुका है. चित्तौड़गढ़ से विधायक चंद्रभान सिंह आक्या ने पंचायत चुनाव में दो बच्चों की बाध्यता हटाने की मांग करते हुए सरकार को घेरा था. आक्या ने यह पूछा था कि यह कैसा नियम है कि तीन संतान होने पर विधानसभा और लोकसभा चुनाव तो लड़ सकते हैं, पर पंचायत चुनाव नहीं. कांग्रेस के पूर्व मंत्री हेमाराम चौधरी भी दो संतान की बाध्यता का नियम हटाने की वकालत कर चुके हैं.
बहरहाल, राजस्थान की राजनीति में यह बदलाव आने वाले चुनावों से पहले एक नया विमर्श खड़ा कर चुका है. एक ओर सरकार इसे समय की मांग और लोकतांत्रिक अधिकारों का विस्तार बता रही है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे वैचारिक दबाव और चुनावी डर का परिणाम करार दे रहा है.