शेक्सपियर के तर्क को राजस्थान की चुनौती! अब 'नाम' से तय होगा बच्चों का सम्मान

राजस्थान में बच्चों के 'शर्मिंदगी' भरे नामों को बदलने के लिए 'सार्थक नाम अभियान’ की शुरुआत हुई है

Tribal school dropouts soar 5x in 4 years: Chhattisgarh, Odisha top the list
सांकेतिक फोटो

विलियम शेक्सपियर ने 430 साल पहले कहा था- नाम में क्या रखा है? 'रोमियो जूलियट' में कही गई इन पंक्तियों के मायने राजस्थान को अब समझ में आ रहे हैं. राजस्थान सरकार अब यह मान चुकी है कि नाम में बहुत कुछ रखा है. इसी के मद्देनजर सरकार अब एक ऐसी योजना लेकर आई है, जिससे बेटे-बेटियों को शर्मसार करने वाले नामों से छुटकारा दिलाया जाएगा.

राजस्थान के स्कूल शिक्षा व पंचायती राज विभाग की ओर से 'सार्थक नाम अभियान' चलाया जा रहा है. इस योजना में स्कूली बच्चों के लिए 2950 नामों की एक सूची बनाई गई है. इसमें लड़कियों के लिए 1541 और लड़कों के लिए 1409 नाम सुझाए गए हैं. इन सभी नामों का अंग्रेजी में सही उच्चारण, लेखन और हिंदी अर्थ भी बताया गया है.

राजस्थान के हर सरकारी स्कूल को इन नामों की सूची सौंप दी गई है. साथ ही निर्देश दिए गए हैं कि स्कूल मैनेजमेंट कमेटी और पेरेंट्स-टीचर मीटिंग में वे अभिभावकों को बच्चों के शर्मिंदगी भरे नामों को बदलने के लिए प्रेरित करें. अगर किसी बच्चे का नाम असहज करने वाला हो, तो उन्हें इस सूची में से नया नाम सुझाया जाए.

हालांकि, इस सूची में शामिल कुछ नामों पर सवाल भी उठ रहे हैं. अधिकारियों द्वारा तैयार सूची में लड़कों के लिए दगड़ूराम, दहीभाई, जयचंद और कामदेव जैसे नाम सुझाए गए हैं. इन्हें लेकर आपत्ति जताई जा रही है. वहीं, लड़कियों के लिए गुलाबी, नागश्री, चंपाकली और सती जैसे नामों पर भी सवाल उठ रहे हैं. सबसे ज्यादा आपत्ति 'सती' नाम को लेकर है, क्योंकि यह शब्द एक सामाजिक कुप्रथा को महिमामंडित करता है. इन कुछ चुनिंदा नामों को छोड़ दें, तो 'सार्थक नाम योजना' की हर तरफ सराहना हो रही है.

दरअसल, राजस्थान के ग्रामीण समाज में नामकरण की परंपरा लंबे समय से लैंगिक और सामाजिक भेदभाव की कहानी कहती रही है. खासकर बेटियों के नामों में यह भेदभाव साफ झलकता है. मसलन, पांच-छह बच्चों के बाद अगर कोई लड़की पैदा हुई, तो उसे 'धापू' (अब हम तंग आ चुके हैं) नाम दिया गया. यदि कोई लड़की परिवार की इच्छा के विरुद्ध पैदा हुई, तो उसे 'आचूकी' (आ गई) नाम मिला. वहीं, बेटी के जन्म से नाराज माता-पिता ने उसका नाम 'नाराजी' रख दिया.

घर में बेटियों को सम्मानजनक नाम नहीं मिले, तो फल-सब्जियों के आधार पर उनका नामकरण कर दिया गया. राजस्थान में आज भी महिलाओं के नाम केला, बादाम, शिमला, संतरा, मौसमी, पपीता और अंगूरी मिलना आम बात है. शरबत से नाम 'शरबती' हो गया और मिठाई के नाम पर 'पतासी' रख दिया गया. लड़की के जन्म पर अगर लगा कि उसका कहीं कोई ठोर-ठिकाना नहीं है, तो उसे 'उठली' कह दिया गया. बसंत ऋतु में जन्म होने पर नाम 'बसंती' मिला. अन्य महीनों के आधार पर श्रवणी और बैसाखी जैसे नाम रखे गए. तीज पर जन्म होने पर नाम 'तीजो' रखा गया.

राजस्थान में कद और रंग-रूप को लेकर भी महिलाओं के साथ भेदभाव हुआ है. अगर बेटी जन्म के समय कमजोर हुई, तो उसका नाम 'घोघड़ी' (पतली) रख दिया गया. छोटे कद वाली बेटी का नाम 'नानड़ी' पड़ा. रंग सांवला होने पर 'काळी' और गोरा होने पर 'धौळती' नाम दिया गया.

राजस्थान में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर काम कर रही डॉ. मुकेश बलवदा कहती हैं, "महिलाओं ने समाज में नामों के साथ जो भेदभाव झेला है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है. कैसा लगेगा कि एक महिला को धापूड़ी, नानड़ी और घोघड़ी जैसे शब्दों के साथ पूरी जिंदगी गुजारनी पड़े?"

सामाजिक कार्यकर्ता तारा अहलुवालिया कहती हैं, "राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में पितृसत्ता और लैंगिक भेदभाव के कारण लड़कियों को बचपन में ही ऐसे नाम दे दिए जाते हैं, जो जीवनभर उन्हें शर्मिंदा करते हैं. नाम किसी व्यक्ति की पहचान और आत्म-बोध को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह करियर और जीवन के विभिन्न पहलुओं में उसकी दिशा को प्रभावित करता है."

ऐसा नहीं है कि यह भेदभाव सिर्फ लड़कियों के साथ हुआ हो. लड़कों को भी इसका सामना करना पड़ा है. राज्य में आज भी पुरुषों के चतराराम, चूनाराम, घमंडाराम, शैतानराम और मूलाराम जैसे नाम मिलना आम है. 'सार्थक नाम अभियान' से बच्चों को ऐसे नामों को बदलने का मौका मिलेगा.

राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर कहते हैं, "जीवन में हर व्यक्ति का नाम उसके अस्तित्व और पहचान का अभिन्न अंग होता है. सार्थक नाम अभियान का उद्देश्य ऐसे नामों को बदलना है जो अर्थहीन और नकारात्मक हैं. ये बच्चों के आत्मविश्वास पर बुरा असर डालते हैं. स्कूल स्तर पर अभिभावकों की सहमति से नाम बदलने और संशोधन की प्रक्रिया अपनाई जा रही है."

सरकार के इस अभियान की बदौलत ही सही, लेकिन अब राजस्थान को यह समझ आ गया है कि नाम सिर्फ पुकारने का जरिया नहीं है. यह सम्मान, पहचान और भविष्य की दिशा तय करने वाला पहला शब्द होता है.

Read more!