सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजस्थान में क्यों गरमाया धर्मांतरण का मुद्दा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई बन गया है तो वो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) कानून के तहत मामला दर्ज नहीं करवा सकता

राजस्थान के गंगानगर जिले के अनूपगढ़ कस्बे में सितंबर 2025 में पुलिस ने एक ऐसे गिरोह को पकड़ा, जो 454 लोगों का धर्मांतरण करा चुका था. 'फ्रेंड्स मिशनरी प्रेयर बैंड' नामक इस संगठन के हर सदस्य को हर साल 20 लोगों का धर्म परिवर्तन कराने का लक्ष्य दिया गया था. इसके बदले उन्हें 9 हजार रुपए प्रति माह वेतन और अन्य भत्ते दिए जा रहे थे.
संगठन के कार्यालय से पुलिस को जो रजिस्टर मिला, उसमें 454 लोगों का हवाला दिया गया था, उनमें से 430 लोग अनुसूचित जाति के थे. हालांकि अनूपगढ़ का यह मामला तो महज एक बानगी है. पिछले कुछ सालों में राजस्थान में इस तरह के मामले बड़ी तादाद में सामने आए हैं.
धर्मांतरण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य में धर्मांतरण, आरक्षण और सामाजिक अधिकारों को लेकर चर्चा और तेज हो गई है. काबिलेगौर है कि सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने 24 मार्च को आदेश दिया था कि अगर कोई अनुसूचित जाति का व्यक्ति अपना धर्म बदलकर ईसाई धर्म अपनाता है, तो वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत कोई कार्रवाई नहीं कर पाएगा.
वैसे राजस्थान में पिछले कई वर्षों से धर्मांतरण का मुद्दा गर्म है. हाल ही में राजस्थान सरकार ने धर्म परिवर्तन रोकने के लिए विधानसभा में एक कानून भी बनाया है. इसमें जबरन धर्मांतरण कराए जाने पर आजीवन कारावास और 50 लाख रुपए के जुर्माने का प्रावधान किया गया है.
राजस्थान पुलिस ने राज्य के 12 जिलों को धर्मांतरण की दृष्टि से संवेदनशील माना है. इन जिलों में राजधानी जयपुर समेत भरतपुर, धौलपुर, अलवर, गंगानगर, हनुमानगढ़, अजमेर, कोटा, बूंदी, बांसवाड़ा, डूंगरपुर और प्रतापगढ़ के नाम शामिल हैं. इनमें आदिवासी बहुल डूंगरपुर, बांसवाड़ा और प्रतापगढ़ में जनजाति वर्ग के धर्म परिवर्तन के मामले सामने आए हैं, जबकि अन्य जिलों में अनुसूचित जाति समुदाय से जुड़े मामले अधिक बताए जा रहे हैं.
राजस्थान में धर्मांतरण करने वाले लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर किए जाने की मांग काफी लंबे समय से उठती रही है.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से एक दिन पहले, 23 मार्च को राजस्थान के सलूंबर में वनवासी कल्याण परिषद की एक बड़ी सभा हुई. इसमें धर्म परिवर्तन करने वाले आदिवासी समाज के लोगों को आरक्षण सूची से डिलिस्टिंग करने की मांग की गई. इसके साथ ही आगामी 24 मई को दिल्ली में पूरे देश के जनजाति समाज का 'संस्कृति समागम और गर्जना रैली' आयोजित करने का ऐलान किया गया.
23 मार्च 2026 को उदयपुर से लोकसभा सांसद मन्नालाल रावत ने संसद में यह मांग उठाई कि धर्मांतरित आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति सूची से हटा दिया जाए. रावत ने जनगणना में ईसाई धर्म अपना चुके आदिवासियों को अनुसूचित जाति के कॉलम से बाहर निकालने की मांग की.
राजस्थान की भजनलाल सरकार के जनजाति क्षेत्रीय विकास मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने कहा, "आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे कई गिरोह सक्रिय हैं जो माता-पिता और उनके बच्चों को बरगलाकर ईसाई बना रहे हैं. शिक्षा, रोजगार और चिकित्सा के नाम पर गरीब आदिवासियों को गुमराह करके उनका धर्मांतरण करवाया जा रहा है. धर्मांतरण के बाद वे एसटी नहीं रहते, ऐसे में वे एसटी आरक्षण समेत दूसरे फायदों के हकदार भी नहीं हैं. सरकार ऐसे लोगों को सूची से बाहर कराने के प्रयास कर रही है."
राजस्थान के कृषि मंत्री डॉ. किरोड़ी लाल मीणा सार्वजनिक तौर पर कह चुके हैं, "अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़ा कोई भी व्यक्ति अगर धर्मांतरण करता है, तो उसे आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए." मंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से किया गया हो या दबाव में, दोनों ही स्थितियों में संबंधित व्यक्ति का आरक्षण का हक खत्म हो जाना चाहिए.
BJP विधायक समाराम गरासिया ने बीते दिनों विधानसभा में कहा, "मैं एक ऐसे आदिवासी क्षेत्र से आता हूं जहां कई आदिवासी अपना धर्म परिवर्तन करके ईसाई बन गए हैं. उन सबका सर्वे कर धर्म बदलने वाले लोगों को जनजाति लिस्ट से बाहर करना चाहिए. ये लोग अपना धर्म तो ईसाई बताते हैं, मगर फायदे आदिवासियों के लिए बनी योजनाओं का लेते हैं."
विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय मनोहर तिवारी के मुताबिक, "केंद्र सरकार को एक योजना बनाकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि एससी/एसटी समुदाय के जिन लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया है, उन्हें इस श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ न मिले."
देखा जाए तो राज्य में हाल ही में सामने आए धर्म परिवर्तन के मामलों ने इस बहस को और हवा दी है. दिसंबर 2025 में बीकानेर जिले के मोमासर गांव में क्रिसमस से ठीक पहले धर्म परिवर्तन के आरोप में 34 लोगों को गिरफ्तार किया गया. वहीं बूंदी में एक चर्च में बड़े स्तर पर धर्मांतरण की जांच हुई.
फरवरी 2024 में भरतपुर के अटल बंध क्षेत्र में करीब 150 लोगों के धर्म परिवर्तन का मामला सामने आया था. वहां आरोप था कि लोगों को पैसे, इलाज और बेहतर जीवन का लालच देकर धर्मांतरित किया जा रहा है. अगस्त 2025 में अलवर के उद्योग नगर क्षेत्र में एक मिशनरी हॉस्टल पर छापे के दौरान 6 से 17 वर्ष की उम्र के 52 बच्चों को मुक्त कराया गया. पुलिस का दावा है कि उन्हें धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से वहां लाया गया था.
हालांकि, इस मुद्दे का दूसरा पक्ष भी उतना ही मुखर है. मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि धर्मांतरण विरोधी कानून और उससे जुड़े मामलों के चलते अल्पसंख्यक समुदायों पर दबाव बढ़ा है. 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज' के अनुसार, राजस्थान में धर्मांतरण विरोधी कानून बनने के बाद पिछले 18 महीनों में कथित धर्मांतरण के नाम पर 150 से अधिक उत्पीड़न की घटनाएं सामने आई हैं.
भारतीय आदिवासी पार्टी (BAP) और भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) भी BJP व हिंदूवादी संगठनों की डिलिस्टिंग जैसी मांगो का विरोध करती रही हैं. 29 जून 2024 को BAP सांसद राजकुमार रोत ने कहा, "आदिवासी हिंदू नहीं हैं और वे हिंदू धर्म को नहीं मानते. आदिवासियों को आरक्षण उनके हिंदू होने की वजह से नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपरा और मान्यताओं की वजह से दिया गया है."
9 अगस्त 2025 को BAP के प्रदेश अध्यक्ष वेला राम घोगरा ने कहा, "डिलिस्टिंग जैसे बयान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और BJP के 'पुनः उपनिवेशीकरण एजेंडे' हैं. कुछ आदिवासी ईसाई बने हैं और बहुत कम संख्या में इस्लाम या बौद्ध धर्म अपनाया है, लेकिन उनका सांस्कृतिक और पारंपरिक जीवन अब भी वही है."
धर्म परिवर्तन पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने इन तमाम घटनाओं और दावों के बीच एक नई कानूनी रेखा खींच दी है. इसे लेकर आने वाले समय में यह बहस और बड़ी होने के आसार हैं.