राजस्थान में पुलिस हिरासत की मौतों का सच क्या है?

राजस्थान में पुलिस हिरासत के दौरान दो साल के भीतर 21 लोगों की मौत हो चुकी है

Bahraich custodial death
सांकेतिक फोटो

राजस्थान के बूंदी जिले के इंद्रगढ़ पुलिस थाने में 10 मार्च को पॉक्सो मामले में गिरफ्तार एक 23 वर्षीय युवक की संदिग्ध मौत हो गई. पुलिस युवक की मौत की वजह आत्महत्या बता रही थी, मगर परिजनों ने इसे हत्या बताते हुए हंगामा खड़ा कर दिया.

परिजनों का आरोप था कि पुलिस की पिटाई से युवक की जान गई है. मामला तूल पकड़ा तो बूंदी के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र मीणा ने पूरे थाने के स्टाफ को लाइन हाजिर कर दिया.

वहीं डूंगरपुर में एक आदिवासी युवक की हिरासत में कथित मौत के मामले ने इतना तूल पकड़ा कि प्रशासन को पूरे थाना स्टाफ को निलंबित करना पड़ा. जिले के दोवड़ा थाने में चोरी के आरोप में पकड़े गए दिलीप अहारी नामक युवक की पूछताछ के दौरान तबीयत बिगड़ गई. पुलिस उसे नजदीकी अस्पताल लेकर गई, मगर स्थिति ज्यादा चिंताजनक होने के कारण बाद में उसे उदयपुर रेफर कर दिया गया. उदयपुर में 30 सितंबर को इलाज के दौरान युवक की मौत हो गई. घटना से गुस्साए परिजनों और आदिवासी नेताओं ने तीन दिन तक शव कलेक्ट्रेट के बाहर रखकर प्रदर्शन किया.

बात इतनी बढ़ गई कि राजस्थान सरकार में मंत्री बाबूलाल खराड़ी, बांसवाड़ा से सांसद राजकुमार रोत, उदयपुर से भाजपा सांसद मन्नालाल रावत, विधायक उमेश मीणा और अनिल कटारा को आंदोलनकारियों के बीच आकर प्रशासन के साथ वार्ता करनी पड़ी. पुलिस मामले की वजह हार्ट अटैक बताती रही, मगर परिजन इसे पीटकर हत्या करने का मामला बता रहे हैं. अभी इस मामले की न्यायिक जांच चल रही है.

डूंगरपुर और बूंदी की ये दो घटनाएं तो बानगीभर हैं. पिछले दो साल में राजस्थान में इस तरह की 21 घटनाएं हो चुकी हैं. ये मामले बताते हैं कि राजस्थान में पुलिस हिरासत में मौतें अब अपवाद नहीं, बल्कि एक खतरनाक पैटर्न बनता जा रहा है. हिरासत में होने वाली संदिग्ध मौतों ने कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

इसका सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि पुलिस महकमा हिरासत में हुई इन मौतों के लिए किसी भी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं मानता. इन मौतों के पीछे पुलिस ने जो वजह बताई हैं, वे भी बहुत अलग हैं. हिरासत में मौत के पांच मामलों को पुलिस हार्ट अटैक बताती है, वहीं 14 मामलों को आत्महत्या मान रही है. एक मामला तो और भी अजीब है, जहां पुलिस हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति ने कुएं में कूदकर जान दे दी, वहीं एक व्यक्ति की गर्मी में लू लगने से मौत हो गई.

यह सारा मामला राजस्थान के गृह विभाग की ओर से विधानसभा में दी गई जानकारी में सामने आया है. राजस्थान विधानसभा में कांग्रेस विधायक और पूर्व गृहमंत्री शांति धारीवाल की ओर से जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 तक पुलिस कस्टडी में मौत के संबंध में जानकारी मांगी गई थी. इसके जवाब में सरकार ने बताया कि साल 2024 में 8 और 2025 में 13 लोगों की मौत पुलिस हिरासत में हुई है. 2024 में हिरासत में हुई मौतों के सभी मामलों में पुलिस को क्लीनचिट मिल चुकी है, जबकि 2025 के 13 में से 9 मामलों की जांच अभी चल रही है.

पुलिस हिरासत में मारे गए इन लोगों में एक बांग्लादेशी युवक भी शामिल है. जैसलमेर की तनोट थाना पुलिस ने 19 मार्च 2024 को बांग्लादेशी नागरिक रूबेल मिआह और मोहम्मद दुलाल मिआह को गिरफ्तार किया था. ये दोनों भारत में टूरिस्ट वीजा पर घूमने आए थे. हावड़ा और अजमेर से जैसलमेर होते हुए दोनों बस से तनोट पहुंचे थे. तनोट इलाके में विदेशी लोगों के लिए प्रतिबंधित जगह से इन्हें पूछताछ के लिए पकड़ा गया था. पुलिस कस्टडी के दौरान दुलाल मिआह की तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहां इलाज के दौरान उसने दम तोड़ दिया. पुलिस इसे हार्ट अटैक से हुई मौत बता रही है.

भीलवाड़ा जिले की मांडल थाना पुलिस किसी मामले में पूछताछ के लिए स्थानीय निवासी मुकेश को थाने लेकर आई थी. 25 अप्रैल 2024 को मुकेश की अचानक तबीयत बिगड़ने पर उसे अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहां उसकी मौत हो गई. मृतक के पिता ने बेटे की मौत की वजह पुलिसकर्मियों की पिटाई को बताया, मगर पुलिस के मुताबिक मौत हार्ट अटैक से हुई थी. स्थानीय लोगों के विरोध के बाद मामला दर्ज हुआ और न्यायिक जांच हुई. न्यायिक जांच में पुलिस हिरासत में मौत के लिए किसी को दोषी नहीं माना गया.

हिरासत में मौतों पर राजस्थान के गृह राज्यमंत्री जवाहर सिंह का कहना है, "हिरासत में बंद व्यक्तियों के अधिकारों को लेकर सरकार सजग है. पुलिस को स्पष्ट निर्देश हैं कि हिरासत में किसी व्यक्ति के साथ अमानवीय व्यवहार न हो. प्रदेश में कहीं भी ऐसा मामला सामने आया है, तो सरकार ने जांच कराकर दोषियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की है."

हिरासत में हुई इन मौतों के मामले में यह देखना भी दिलचस्प है कि जिन मामलों में आरोपी ने कस्टडी के दौरान आत्महत्या कर ली, उनमें ड्यूटी पर तैनात संतरी को लापरवाही के लिए 17 सीसीए का नोटिस जारी कर दिया गया. मगर जिन मामलों में हिरासत में तबीयत खराब होने के बाद रास्ते में या अस्पताल में आरोपी की मृत्यु हुई, उनमें मौत का कारण हार्ट अटैक या अन्य किसी बीमारी को बता दिया गया. काबिलेगौर है कि हिरासत में इन मौतों के ज्यादातर मामलों में पुलिस खुद को क्लीनचिट दे चुकी है. 21 में से 12 मामलों में पुलिस ने खुद को निर्दोष साबित कर लिया है, वहीं 9 मामलों की जांच चल रही है.

पिछले साल 29 जुलाई से 12 अगस्त के बीच, महज 15 दिनों के भीतर उदयपुर, राजसमंद और बारां जिलों में तीन लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो गई. जानकार मानते हैं कि पुलिस ऐसे मामलों में पाक साफ इसलिए साबित हो जाती है क्योंकि हिरासत में हुई इन मौतों का पुलिस के अलावा कोई और गवाह या सबूत नहीं होता. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हिरासत में हुई मौतों से संबंधित मीडिया रिपोर्ट्स पर स्वतः संज्ञान लेते हुए पुलिस स्टेशनों में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दिए थे.

मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) इन मौतों को मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानता है. पीयूसीएल के राजस्थान अध्यक्ष भंवर मेघवंशी कहते हैं, "हिरासत में हुई हर मौत प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाती है. हिरासत में आत्महत्या के दावे अक्सर संदिग्ध होते हैं. पुलिस बर्बर यातना, उपेक्षा या अमानवीय व्यवहार को छिपाने के लिए इन्हें आत्महत्या का रूप देती है. हिरासत में आत्महत्या के साधनों की उपलब्धता भी निगरानी में गंभीर लापरवाही की ओर इशारा करती है. ऐसे मामलों में बढ़ोतरी केवल मानवीय गरिमा पर हमला नहीं है, बल्कि संविधान और न्यायपालिका के निर्देशों का घोर उल्लंघन है."

पीयूसीएल ने हिरासत में हुई सभी मौतों की न्यायिक जांच की मांग करते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पीड़ित परिवारों को मुआवजे की मांग की है. संगठन ने हिरासत केंद्रों में सीसीटीवी कैमरे लगाने और डेटा सुरक्षित रखने की अनिवार्य व्यवस्था पर जोर दिया है.

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