पंचायत चुनाव में देरी से राजस्थान के हजारों गांवों में पसरे गंदगी के ढेर!
पिछड़ा वर्ग के आरक्षण के मसले पर राजस्थान में दो साल से ग्राम पंचायत चुनाव टल रहे हैं और हजारों गांव में सार्वजनिक कामकाज की जवाबदेही तय नहीं हो पा रही

22 मार्च 2026 को राजस्थान के पंचायतीराज मंत्री मदन दिलावर का सीकर के बाजोर, पलसाना और रेवासा गांवों में गंदगी देखकर भड़कना महज एक प्रशासनिक घटना नहीं थी. यह उस गहरे संकट की झलक थी, जिसमें इस वक्त पूरा ग्रामीण राजस्थान फंसा हुआ है.
रास्ते में दिखे कचरे के ढेरों ने मंत्री को इतना नाराज किया कि मौके से ही उन्होंने ग्राम विकास अधिकारी को फोन पर फटकार लगाई और तीन अधिकारियों को निलंबित कर दिया. मंत्री की इस कार्रवाई को लेकर असल सवाल यह है कि क्या समस्या सिर्फ तीन अफसरों की थी या पूरी व्यवस्था की?
दरअसल, जिन तीन पंचायतों में मंत्री को गंदगी दिखी, वैसी तस्वीरें आज राजस्थान की हजारों ग्राम पंचायतों में आम हैं. करीब 11 हजार पंचायतों वाले इस राज्य में लगभग 8 हजार गांव सफाई व्यवस्था के लिहाज से बदहाल बताए जा रहे हैं. गांवों की गलियों में कीचड़, नालियों में जाम पानी और सार्वजनिक स्थलों पर कचरे के ढेर अब सामान्य दृश्य बन चुके हैं.
इस अव्यवस्था की जड़ में सबसे बड़ा कारण पंचायत चुनावों में अभूतपूर्व देरी है. संविधान के 73वें और 74वें संशोधन के तहत संसद व विधानसभा की तर्ज पर हर पांच साल में ग्राम पंचायतों के चुनाव कराए जाने अनिवार्य हैं, लेकिन राजस्थान में 2024 में होने वाले चुनाव अब तक टलते चले गए. चुनावों में हो रही इस देरी को लेकर हाईकोर्ट तक सख्ती दिखा चुका है. 14 नवंबर 2025 को राजस्थान हाईकोर्ट ने सरकार को 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव कराने के निर्देश भी दिए थे, फिर भी स्थिति जस की तस बनी हुई है.
फिलहाल, चुनाव में देरी की वजह ओबीसी आयोग बना है, जिसकी रिपोर्ट अभी आना बाकी है. इसी के चलते सरकार ने इस आयोग का कार्यकाल तीसरी बार बढ़ाया है. अभी इसका समय 30 सितंबर तक बढ़ाया गया है. ऐसे में यह संभावना जताई जा रही है कि इस अवधि से पहले पंचायतों के चुनाव होना मुश्किल है. यह आयोग स्थानीय निकाय (पंचायत व नगर परिषद) चुनावों में ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षण का प्रतिशत और वार्डों का निर्धारण करता है. चुनाव को कानूनी अड़चन से बचाने के लिए ओबीसी आयोग 'ट्रिपल टेस्ट सर्वे' यानी एक तीन-स्तरीय सर्वे प्रक्रिया भी पूरी करता है. इस सर्वे के जरिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार निकायों में ओबीसी आरक्षण (50 फीसदी की सीमा के भीतर) तय किया जाता है. ऐसे में ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के बिना चुनाव नहीं कराए जा सकते.
चुनाव न होने का सीधा असर गांवों की प्रशासनिक संरचना पर पड़ा है. चुने हुए सरपंचों की जगह अब प्रशासक नियुक्त हैं और स्थानीय जवाबदेही लगभग खत्म हो गई है. नतीजा यह है कि सफाई व्यवस्था ठेकेदारों और अधिकारियों के भरोसे छोड़ दी गई है, जहां निगरानी कमजोर है और जवाबदेही नदारद.
सियासी मोर्चे पर भी इस मुद्दे ने तूल पकड़ लिया है. कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा सरकार पर आरोप लगाते हैं, "वह जानबूझकर चुनाव टाल रही है. कभी 'वन स्टेट-वन इलेक्शन', कभी परिसीमन और अब ओबीसी आयोग की रिपोर्ट का हवाला देकर चुनाव में देरी की जा रही है." विपक्ष ही नहीं, सफाई के मुद्दे पर सरपंच और सरकार भी आमने-सामने हैं. सरपंचों का कहना है कि सरकार बजट जारी नहीं कर रही, वहीं सरकार का आरोप है कि सरपंचों ने सफाई का पैसा दूसरे कामों में खर्च कर दिया है.
सरपंच संघ के अध्यक्ष बंशीधर गढ़वाल का कहना है, "पंचायतों को पिछले पांच महीनों से फंड नहीं मिला, ऐसे में सफाई कैसे होगी? केंद्र और राज्य वित्त आयोग की हजारों करोड़ की राशि अभी तक पंचायतों तक नहीं पहुंची है. कई पंचायतों में 3 से 5 लाख रुपए तक बकाया हैं और ठेकेदारों ने सफाईकर्मियों को वेतन देना बंद कर दिया है."
विडंबना यह है कि हर साल गांवों में साफ-सफाई पर करीब 2000 करोड़ रुपए खर्च होने का दावा किया जाता है, फिर भी जमीनी हकीकत बेहद खराब है. सवाल यह भी है कि आखिर यह पैसा जा कहां रहा है? क्या सिस्टम में लीकेज है या मॉनिटरिंग पूरी तरह फेल हो चुकी है?
यह लीकेज रोकने के लिए सरकार अब 14 सदस्यीय 'ग्राम स्वच्छता दल' बनाने की तैयारी कर रही है. यह दल गांव स्तर पर सफाई की निगरानी करेगा. कचरा प्रबंधन और नालियों की सफाई पर नजर रखने के अलावा लोगों को साफ-सफाई के लिए प्रेरित करना भी इस दल का जिम्मा होगा. कुल मिलाकर ग्रामीण राजस्थान, जहां 75 फीसद से ज्यादा आबादी रहती है, वहां की यह तस्वीर सिर्फ सफाई की ही नहीं बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे की सुस्ती की कहानी भी कह रही है.