राजस्थान में अब जल जीवन मिशन का पानी भी बना जानलेवा!

पहले कुओं और हैंडपंपों में बहने वाली फ्लोराइड की बीमारी अब राजस्थान के जल जीवन मिशन के नलों में भी बहने लगी है

जल जीवन मिशन
सांकेतिक फोटो

राजस्थान में फ्लोराइड अब सिर्फ भूजल की समस्या नहीं रही, बल्कि यह सरकारी दावों की परीक्षा बन गई है. अब तक हैंडपंप और बोरवेल के पानी में फ्लोराइड का जहर घुलने के मामले सामने आते थे, मगर अब जल जीवन मिशन के तहत घरों तक पहुंचाया जा रहा नल का जल भी फ्लोराइड से दूषित पाया गया है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के 19 जिलों के 450 गांवों में फ्लोराइड का स्तर तय सीमा से बहुत ज्यादा पाया गया है. यह मामला प्रदेश में जल जीवन मिशन के तहत घरों में आपूर्ति किए जा रहे पानी की जांच में सामने आया है.

जल जीवन मिशन की तय गाइडलाइन के अनुसार, पाइपलाइन के जरिए घरों में की जा रही जल की आपूर्ति की गुणवत्ता ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (BIS) के मानक बीआईएस:10500 के अनुसार होनी चाहिए. मगर राजस्थान के 19 जिलों में मानक का पालन होना तो दूर, पेयजल सेहत के लिए खतरा बन चुका है.

केंद्रीय जल शक्ति राज्य मंत्री वी. सोमन्ना ने पिछले दिनों संसद में यह दावा किया था कि राजस्थान की फ्लोराइड प्रभावित 4177 बस्तियों में बीआईएस मानकों के अनुसार घरों में पानी पहुंचाया जा रहा है. मगर WHO और सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड की हालिया रिपोर्ट्स इन दावों की पोल खोलती नजर आती हैं. WHO के अनुसार जयपुर, नागौर, बाड़मेर, दौसा, जोधपुर और झुंझुनूं समेत 19 जिलों में फ्लोराइड की मात्रा WHO के 1.5 mg/L मानक से 5-6 गुना अधिक (8 mg/L) तक पाई गई है.

सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड ने जनवरी 2026 में जारी अपनी रिपोर्ट में प्रदेश के 30 जिलों और 40 लाख से ज्यादा आबादी को फ्लोराइड के खतरे का शिकार बताया है. बोर्ड की ओर से पानी के 643 नमूनों की जांच कराई गई, जिसमें से 41 नमूनों में फ्लोराइड खतरनाक स्तर का पाया गया.

सवाई माधोपुर का बपुई गांव इस त्रासदी का जीवित चेहरा है. यहां पूरी आबादी के दांत खराब होना सामान्य बात है और 50 साल से ऊपर का शायद ही कोई बुजुर्ग हो जो बिना सहारे चल सके. इस गांव का पानी लोगों की प्यास नहीं बुझाता, बल्कि उनका शरीर गला रहा है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि राजस्थान के कई जिलों में भूजल 900 से 1200 फीट नीचे चला गया है, जिसके कारण यहां फ्लोराइड की सांद्रता तेजी से बढ़ी है. रेगिस्तानी जिलों बाड़मेर, जैसलमेर और नागौर में हालात कुछ ज्यादा ही भयावह हैं. यहां पानी 1500 फीट तक नीचे चला गया है और फ्लोराइड की मात्रा 99 PPM (Parts Per Million) के स्तर तक पहुंच चुकी है, जबकि पेयजल में इसकी आदर्श मात्रा 0.5 से 1 PPM के बीच होनी चाहिए.

फ्लोराइड की कितनी मात्रा क्या करती है
 

देखा जाए तो 90 फीसदी फ्लोराइड प्रभावित आबादी अकेले राजस्थान में निवास कर रही है. देश के 14,133 फ्लोराइड प्रभावित क्षेत्रों में से 7670 अकेले राजस्थान में हैं. यह आंकड़ा किसी चेतावनी से कम नहीं है.

फ्लोराइड पर लंबे समय से काम कर रहे डॉ. रामलाल कहते हैं, "फ्लोराइड का असर अब सिर्फ दांतों के पीले होने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हड्डियों में फ्लोरोसिस और कई बीमारियों का कारण बन रहा है. अगर फ्लोराइड की मात्रा 10 mg/L से ऊपर है, तो उससे जड़ता और अपंगता तक की स्थिति बन सकती है. पानी में फ्लोराइड शरीर की हड्डियों में जमा होकर उन्हें धीरे-धीरे तोड़ता है. यही कारण है कि कई इलाकों में लोग समय से पहले बूढ़े हो रहे हैं. महिलाओं और पुरुषों में रीढ़ झुकने, कुबड़ापन और चलने-फिरने में अक्षमता जैसे लक्षण आम हैं. ग्रामीण अस्पतालों में फ्लोरोसिस के मरीज लगातार बढ़ रहे हैं."

चिंता सिर्फ इंसानों तक सीमित नहीं है, बल्कि अब पशुओं में भी फ्लोरोसिस का असर नजर आने लगा है. अर्चना शर्मा के ग्लोबल साइंटिफिक जर्नल में प्रकाशित शोध के अनुसार, "राजस्थान में 1980 तक पशुओं में फ्लोराइड की समस्या लगभग नहीं थी, मगर 1990 के आस-पास भूजल के अत्यधिक दोहन के बाद यह समस्या अब पशुधन तक भी पहुंच गई है. फ्लोरोसिस प्रभावित पशुओं के दूध का इस्तेमाल करने वाली आबादी में यह बीमारी और ज्यादा तेजी और खतरनाक तरीके से फैलती है."

फ्लोराइड रोकने के सरकारी उपायों की हालत भी कम चिंताजनक नहीं है. जयपुर जिले के गोविंदगढ़, दौसा के लालसोट, सवाई माधोपुर के गंगापुर और बूंदी जिले के हिंडौली जैसे इलाकों में लगे RO प्लांट पिछले काफी समय से खराब पड़े हैं. ये हालात तब हैं जब राजस्थान के 23 जिलों का चयन राष्ट्रीय फ्लोरोसिस नियंत्रण कार्यक्रम के तहत किया गया है.

साल 2008 में नागौर पहला जिला था जिसका इस कार्यक्रम में चयन हुआ. अब तक अजमेर, राजसमंद, भीलवाड़ा, टोंक, जोधपुर, बीकानेर, चूरू, दौसा, डूंगरपुर, जयपुर, जैसलमेर, जालोर, पाली, सीकर, उदयपुर, बांसवाड़ा, सवाई माधोपुर, करौली, चित्तौड़गढ़, गंगानगर, झालावाड़ व झुंझुनूं जिलों का चयन इस कार्यक्रम के तहत हो चुका है. मगर फ्लोरोसिस कम होने के बजाय और भयावह होता जा रहा है. सरकारी योजनाएं कागज पर सफल दिखती हैं, गांवों में नहीं.

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