जीवित बेटी का मृत्यु भोज! यह मामला राजस्थान में जाति व्यवस्था के बारे में क्या बताता है?

राजस्थान जैसे परंपराओं से बंधे समाज में प्यार और शादी सिर्फ दिल का मामला नहीं है, इसे जाति की कसौटी पर भी खरा उतरना पड़ता है

कार की मांग ने बिगाड़ा खेल.(Photo: Representational)
सांकेतिक फोटो

राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के एक छोटे से कस्बे जहाजपुर में, हाल ही में एक परिवार ने अपनी ही बेटी को मृत घोषित कर दिया. हालांकि, यह कोई शारीरिक मृत्यु नहीं थी. एक हैरान कर देने वाले मामले में, देवेंद्र सिंह कानावत ने अखबार में एक नोटिस छपवाकर अपनी बेटी आकांक्षा के ‘निधन’ की घोषणा की और लोगों को उसके अंतिम संस्कार में शामिल होने का न्योता दिया. 

दरअसल, आकांक्षा ने परिवार की मर्जी के खिलाफ अपनी जाति से बाहर शादी कर ली थी. इस नोटिस का संदेश साफ था: अब परिवार या समाज के लिए उसका कोई अस्तित्व नहीं है. ह्यूमन राइट्स संस्था 'पीयूएलसी' (PUCL) की शिकायत के बाद पुलिस ने दखल दिया और ऐसे किसी भी कार्यक्रम को रोक दिया. साथ ही पुलिस ने उस जोड़े को सुरक्षा का भरोसा भी दिया. 

लेकिन यह घटना कोई इकलौता मामला नहीं है, बल्कि यह राजस्थान के एक कड़वे सच को दिखाती है कि अंतर-जातीय शादियां कानूनी तो हैं, लेकिन समाज उन्हें अब भी स्वीकार नहीं कर पा रहा है.

इस घटना के बाद जो प्रतिक्रियाएं आईं, वे और भी चिंताजनक थीं. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने पिता के इस कदम का समर्थन किया. उनके कमेंट्स का मतलब था कि अगर बेटियां दूसरी जाति में शादी करें, तो माता-पिता को उनके साथ ‘सख्ती’ से पेश आना चाहिए. कहने का तरीका भले ही अलग था, लेकिन सबकी बात एक ही थी: जाति की सीमाएं नहीं लांघी जा सकतीं.

हाल के वर्षों में राज्य भर में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां परिवारों ने अंतर-जातीय शादी करने पर बच्चों को सार्वजनिक रूप से बेदखल कर दिया या उनसे रिश्ते तोड़ लिए. हर बार अखबार में नोटिस नहीं दिया जाता, लेकिन नतीजा एक जैसा ही होता है- समाज से बाहर करना, अकेला कर देना और कुछ मामलों में तो धमकियां और 'ऑनर किलिंग' तक की नौबत आ जाती है.

इसमें एक बड़ा विरोधाभास भी दिखता है. जो समुदाय अपनी जाति में ही शादी करने पर जोर देते हैं, उनमें से कई खुद जातिगत भेदभाव से लड़ने के लिए बनी आरक्षण नीतियों का लाभ लेते हैं. फिर भी, अपने समाज के भीतर वे शादी-ब्याह को लेकर जाति की ऊंच-नीच के नियमों को बड़ी सख्ती से मानते हैं.

राजनीतिक जगत में भी यह तनाव दिखता है. राजस्थान के विधायक मुकेश भाकर (जाट) और अनुसूचित जनजाति (ST) की जज कोमल मीणा की शादी पर दोनों समुदायों में काफी बहस हुई. कुछ ने इसे प्रगतिशील कदम माना, तो कुछ इससे असहज दिखे. जानकारों का कहना है कि विरोध थोड़ा कम इसलिए था क्योंकि एक ST महिला का विवाह सामाजिक रूप से प्रभावशाली जाट परिवार में हुआ था. इससे पता चलता है कि अंतर-जातीय शादियों की स्वीकार्यता भी इस पर टिकी है कि कौन-सी जाति ऊपर या नीचे मानी जाती है.

एक और मामले में, नागौर सांसद हनुमान बेनीवाल ने जाट महासभा के अध्यक्ष राजा राम मील के परिवार में हुई अंतर-जातीय शादियों पर सवाल उठाए. इससे यह साफ होता है कि समाज में यह उम्मीद की जाती है कि जो लोग जाति समूहों का नेतृत्व करते हैं, वे निजी जीवन में भी जाति के नियमों का पालन करें.

सामाजिक दबाव का सबसे बड़ा उदाहरण वरिष्ठ राजनेता मानवेंद्र सिंह से जुड़ा विवाद है. उनकी पत्नी की दो साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी. जब उनके और चारण समुदाय की एक महिला के बीच रिश्ते की खबरें आईं, तो राजपूत और चारण दोनों समुदायों के कुछ हिस्सों ने इसका विरोध किया. मानवेंद्र सिंह ने खुद इन खबरों की पुष्टि नहीं की है, लेकिन लोगों की प्रतिक्रिया बहुत कुछ बयां करती है.

राजपूत-चारण समुदाय के कुछ हिस्सों में, चारण महिलाओं को बहन समान माना जाता है. यह पुराने सामाजिक नियमों का हिस्सा है जो जाति से आगे बढ़कर रिश्तों की मर्यादा तय करते हैं. ऐसी परंपराओं को तोड़ने वाली शादियों को केवल निजी पसंद नहीं, बल्कि पूरे समुदाय की पहचान पर हमला माना जाता है. यह मुद्दा परिवार और समाज के बीच तनाव का कारण बना, जिसे नेताओं ने ‘सम्मान’ या ‘इज्जत’ का मामला बताया.

यही ‘इज्जत’ का विचार अंतर-जातीय शादियों के विरोध की जड़ है. राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में गांव अक्सर जाति के आधार पर बसे होते हैं. वहां शादी सिर्फ दो लोगों का मिलना नहीं, बल्कि सामाजिक सीमाओं को फिर से पक्का करना है. उन सीमाओं को पार करने का मतलब है पूरी सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देना.

और इस चुनौती के परिणाम अक्सर भारी होते हैं. जो जोड़े दूसरी जाति में शादी करते हैं, उन्हें भावनात्मक दबाव से लेकर सामाजिक बहिष्कार तक झेलना पड़ता है. कुछ मामलों में परिवार पूरी तरह से नाता तोड़ लेते हैं. हिंसा जैसी चरम घटनाएं भले ही कम चर्चा में आती हों, लेकिन डर इतना होता है कि कई जोड़ों को पुलिस सुरक्षा मांगनी पड़ती है.

दूसरी ओर, नागरिक समाज और न्यायपालिका ने हमेशा सहमति देने वाले वयस्कों के साथी चुनने के अधिकार का समर्थन किया है. कानून आजादी देता है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि पुलिस इसे कैसे लागू करती है और क्या जोड़े सामाजिक विरोध को सहने की ताकत रखते हैं.

हालांकि, बदलाव के संकेत भी दिख रहे हैं. शिक्षा, शहरों की ओर पलायन और बाहरी दुनिया के संपर्क से युवाओं की सोच बदल रही है. अंतर-जातीय शादियां, भले ही अभी कम हों, लेकिन अब ज्यादा दिखने लगी हैं. मगर स्वीकार्यता की रफ्तार बदलाव के मुकाबले धीमी है. कानून और समाज के बीच की खाई अभी भी बहुत बड़ी है. कागजों पर अपना जीवनसाथी चुनना एक मौलिक अधिकार है. लेकिन जमीनी हकीकत में, इसे परिवार की उम्मीदों, जाति के प्रति वफादारी और समाज से बाहर निकाले जाने के डर के बीच तौलना पड़ता है.

जहाजपुर का मामला भले ही बीच में रुक गया हो, लेकिन इसका संदेश कायम है. अपनी पसंद से साथी चुनने के कारण एक बेटी को मृत घोषित कर दिया जाना केवल एक व्यक्तिगत दुख नहीं है. यह उस समाज का चेहरा है जो आज भी परंपरा और व्यक्तिगत आजादी के बीच संघर्ष कर रहा है. राजस्थान में कई लोगों के लिए प्यार आज भी सिर्फ दिल का मामला नहीं है, बल्कि जाति की एक परीक्षा है.

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