राजस्थान कांग्रेस में अब नहीं चलेगा ‘आया राम-गया राम’, ये नया फॉर्मूला पार्टी को मजबूत कर पाएगा?

राजस्थान कांग्रेस ने तय किया है कि पार्टी में वापसी करने वाले नेताओं को छह साल तक न तो चुनाव में टिकट मिलेगा, न ही कोई पद, हालांकि वह अतीत में ऐसे कई नियम-कायदे बनाकर उन्हें तोड़ती रही है

राजस्थान उपचुनाव
सांकेतिक तस्वीर

कांग्रेस के राजस्थान प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा के एक बयान ने कांग्रेस से बगावत कर घर वापसी की आस लगाए बैठे नेताओं की चिंता बढ़ा दी है. रंधावा ने ऐलान किया है कि जो नेता कांग्रेस छोड़कर जा चुके हैं और अब वापस कांग्रेस में आना चाहते हैं तो उन्हें छह साल के लिए न तो टिकट मिलेगी, न ही कोई पद. 

बताया जा रहा है कि प्रायोगिक तौर पर कांग्रेस राजस्थान से इस फॉर्मूले को लागू करने जा रही है. इस फॉर्मूले को थोड़ा ओर स्पष्ट करते हुए रंधावा कहते हैं, ''कांग्रेस से बगावत करने या पार्टी छोड़कर चले जाने पर जिन नेताओं को पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित किया गया था, अगर वो नेता घर वापसी कर रहे हैं तो उन्हें 6 साल टिकट भूल जाना चाहिए. उन्हें 6 साल तक पार्टी की सेवा करनी होगी फिर हम देखेंगे कि उन्हें टिकट दिया जाए या नहीं.”

फिलहाल कांग्रेस के इस फॉर्मूले की जद में राजस्थान के 27 ऐसे नेता आते हैं जो विधानसभा और लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में गए हैं. इनमें नागौर से सांसद रही ज्योति मिर्धा और बांसवाड़ा के दिग्गज आदिवासी नेता महेंद्रजीत सिंह मालवीय जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं. राजनीतिक विश्लेषक अजय पुरोहित कहते हैं,  ''कांग्रेस में इस तरह के नियम और फॉर्मूले बनते रहे हैं मगर उन्हें लागू करना बहुत मुश्किल है. पहले भी पार्टी में दो बार लगातार चुनाव हारने वाले, 75 साल से ज्यादा उम्र वाले नेताओं को टिकट नहीं देने और परिवारवाद को खत्म करने जैसे नियम बनाए थे मगर ये सब छोटे नेताओं पर ही लागू होते हैं. कांग्रेस का यही दुर्भाग्य है कि यहां नाम, वक्त और हालात देखकर फॉर्मूले को लागू किया जाता है.''

कांग्रेस के अतीत पर नजर दौड़ाएं तो पुरोहित के इस दावे में दम नजर आता है. कुछ साल पहले कांग्रेस आलाकमान ने दो बार चुनाव हारने वाले नेताओं को टिकट नहीं दिए जाने का फार्मूला बनाया था मगर राजस्थान कांग्रेस के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष डॉ. चंद्रभान, पूर्व विधायक जुबैर खान (दिवंगत), आदिवासी नेता रघुवीर मीणा और डॉ. बीडी कल्ला जैसे नेताओं को लगातार दो बार हारने के बाद भी टिकट दिया गया. 

इसी तरह कई बार नियम बनाकर परिवारवाद खत्म करने की बात की जाती है मगर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे वैभव गहलोत को दो बार लोकसभा का टिकट दिया गया, दोनों बार उनको हार मिली. इसी तरह झुंझुनूं में हुए उप चुनाव में पूर्व सांसद व मंत्री शीशराम ओला की तीसरी पीढ़ी को टिकट मिला जिसके चलते कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. झुंझुनूं विधानसभा सीट से विधायक बृजेंद्र ओला जब लोकसभा चुनाव में झुंझुनूं से सांसद चुन लिए गए तो झुंझुनूं विधानसभा सीट के लिए हुए उपचुनाव में उनके बेटे अमित ओला को उम्मीदवार बनाया गया मगर बीजेपी के राजेंद्र भांबू के सामने वो टिक नहीं पाए. 

इसी तरह प्रशांत बैरवा, दानिश अबरार, दिव्या मदेरणा, प्रीति शक्तावत और मनोज मेघवाल जैसे नेताओं को भी परिवारवाद के चलते विधानसभा चुनाव का टिकट मिला मगर ये सारे चुनाव हार गए. विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने 75 साल से अधिक उम्र के नेताओं को टिकट नहीं दिए जाने की घोषणा की थी मगर पूर्व मंत्री शांति धारीवाल, दयाराम परमार, पूर्व विधानसभाध्यक्ष सीपी जोशी व दीपेंद्र सिंह शेखावत, पूर्व विधायक दीपचंद खेरिया, नरेंद्र बुडानिया जैसे 75 पार की उम्र वाले नेताओं के लिए यह नियम दरकिनार कर दिए गए. 

हालांकि ताजा फैसले पर कांग्रेस के प्रवक्ता जसवंत गुर्जर कहते हैं, ''कांग्रेस छोड़कर जाने वाले नेताओं को 6 साल के लिए टिकट नहीं दिए जाने का यह फैसला स्वागत योग्य है. यह फॉर्मूला लागू होता है तो इससे दल-बदल जैसी गतिविधियों पर रोक लगेगी.''  

माया मिली न राम  

विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने वाले ज्यादातर नेताओं को संगठन में कोई खास तवज्जो नहीं मिली है. कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने वालों में पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा, लालचंद कटारिया, पूर्व मंत्री महेंद्रजीत सिंह मालवीय, पूर्व विधायक गिर्राज सिंह मलिंगा, दर्जनों नेता हैं. इनमें गौरव वल्लभ को छोड़कर किसी भी नेता को कोई पद नहीं मिला है. वल्लभ को पीएम मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद का सदस्य बनाया गया है. 

पूर्व विधायक वीरेंद्र बेनीवाल, पूर्व विधायक अमीन खान, कांग्रेस नेता मुख्तियार खान, फतेह खान, ओम विश्नोई और सुनील परिहार जैसे नेताओं ने भी टिकट नहीं मिलने पर बगावत की थी मगर ये सभी नेता इस फॉर्मूले के लागू होन से पहले ही कांग्रेस में वापसी कर चुके हैं. 

ज्योति मिर्धा, महेंद्रजीत सिंह मालवीय, लालचंद कटारिया व रिछपाल मिर्धा की गिनती कांग्रेस के बड़े नेताओं में होती रही है मगर कांग्रेस छोड़ने के बाद ये नेता हाशिए पर चले गए. गहलोत सरकार में जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी संभालने वाले महेंद्रजीत सिंह मालवीय विधानसभा चुनाव 2023 में बागीदौरा से कांग्रेस के विधायक चुने गए थे. राजस्थान में भजनलाल शर्मा के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनने के बाद पूर्ववर्ती गहलोत सरकार में जल संसाधन विभाग में अनियमितताओं का मामला उठा तो मालवीय बीजेपी के पाले में कूद गए. दल बदलने पर उन्हें विधायक पद से इस्तीफा देना पड़ा. 

उस वक्त तक महेंद्रजीत सिंह मालवीय की छवि दिग्गज आदिवासी नेता के तौर पर थी. इसी के चलते बीजेपी ने उन्हें लोकसभा चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाया मगर भारतीय आदिवासी पार्टी के राजकुमार रोत के सामने वो मात खा गए. इसके बाद बागीदौरा सीट पर हुए उपचुनाव में भी वो बीजेपी के उम्मीदवार को जीत नहीं दिला पाए. भारतीय आदिवासी पार्टी के जयकृष्ण पटेल के सामने बीजेपी के सुभाष तंबोलिया चुनाव हार गए. हालांकि, अब जयकृष्ण पटेल भी रिश्वत के मामले में फंसे हुए और उनकी विधायकी पर संकट मंडरा रहा है.  

नागौर से पूर्व सांसद डॉ. ज्योति मिर्धा 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी में शामिल हो गई थी. बीजेपी ने उन्हें पहले नागौर विधानसभा क्षेत्र और बाद में नागौर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ाया मगर दोनों ही चुनाव में उन्हें जीत हासिल नहीं हुई. विधानसभा चुनाव में उन्हें उनके चाचा हरेंद्र मिर्धा के सामने हार का सामना करना पड़ा और लोकसभा चुनाव में उन्हें कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ने वाले हनुमान बेनीवाल के सामने शिकस्त खानी पड़ी. 

ज्योति के चाचा रिछपाल मिर्धा भी कांग्रेस के बड़े किसान नेताओं में शुमार रहे हैं. मिर्धा दो बार कांग्रेस, एक बार जनता दल और एक बार निर्दलीय विधायक चुने गए. 2018 के विधानसभा चुनाव में उनका टिकट काटकर उनके बेटे विजयपाल मिर्धा को टिकट दिया गया. लोकसभा चुनाव से पहले वो अपने बेटे विजयपाल मिर्धा, समधी लालचंद कटारिया के साथ बीजेपी में चले गए मगर बीजेपी में भी उन्हें अभी तक कोई जिम्मेदारी नहीं मिली है. 

Read more!