राजस्थान : हफ्तेभर में 8 बच्चों की मौत! क्या सरकारी व्यवस्थाओं की कमी बनी जानलेवा?

बच्चों की 'रहस्यमयी’ बीमारी से मौत के मामले राजस्थान के जिन गांवों में सामने आए हैं, उनके आसपास बेहतर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है

सांकेतिक फोटो

राजस्थान के सलूंबर जिले में एक रहस्यमयी बीमारी नवजात और छोटे बच्चों पर कहर बनकर टूटी है. जिले के झल्लारा और लसाड़िया ब्लॉक में महज सात-आठ दिन के भीतर आठ मासूमों की मौत इस अज्ञात बीमारी के कारण हो चुकी है. मरने वाले सभी बच्चों की उम्र 2 माह से 5 साल के बीच है.

इस क्षेत्र के 85 अन्य बच्चों में भी इसी तरह के लक्षण पाए गए हैं, जिन्हें उदयपुर रेफर किया गया है. सरकार और चिकित्सा महकमा अलर्ट मोड पर है, मगर बड़ा सवाल यह है कि जब 3 अप्रैल को इस बीमारी से पहले बच्चे ने दम तोड़ा था, तब प्रशासन हरकत में क्यों नहीं आया?

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर के निर्देशों के बाद ही प्रशासन क्यों जागा, यह सबसे बड़ा सवाल है. दरअसल पिछले छह माह में यह दूसरा मौका है जब राजस्थान में बच्चों की जान जोखिम में है. छह माह पहले राजस्थान में कफ सिरप ने अपना कहर बरपाया था. डेक्सट्रोमेथॉर्फन हाइड्रोब्रोमाइड कफ सिरप के कारण प्रदेश में पांच बच्चों की मौत हो गई थी. शुरुआत में चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर यह मानने को तैयार नहीं हुए कि मौतें कफ सिरप से हुई हैं. वे कहते रहे कि यह परिजनों द्वारा दी गई ओवरडोज और को-मॉर्बिडिटी (अन्य बीमारियां) का परिणाम है. मामला तूल पकड़ने के बाद संबंधित कफ सिरप पर रोक लगाई गई.

सलूंबर के एक गांव में बच्चें की मौत के बाद पहुंचे स्वास्थ्य अधिकारी

सलूंबर में 8 बच्चों की मौत के बाद सामने आई जमीनी सच्चाई कहीं ज्यादा डरावनी है. जिन गांवों में बच्चों की मौत हो रही है, वहां से 25-30 किलोमीटर के दायरे में एक भी बेहतर स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. यहां 20-30 हजार की आबादी के बीच एकमात्र उप-स्वास्थ्य केंद्र 'धामनिया' है, जो डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ के बिना खाली पड़ा है. यानी बीमारी से लड़ने से पहले ही सिस्टम ने हथियार डाल दिए हैं. बीमार बच्चों को 25 किलोमीटर दूर लसाड़िया और धरियावद ले जाया गया, जिनमें से एक बच्चे की रास्ते में ही मौत हो गई.

मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद अब जयपुर व उदयपुर से विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम प्रभावित गांवों में बीमारी के कारणों की पड़ताल कर रही है. चिकित्सकों ने बच्चों में एन्सेफलाइटिस यानी दिमागी सूजन का अंदेशा जताया है. एन्सेफलाइटिस में दिमाग में सूजन आ जाती है, जो बहुत तेजी से बढ़ सकती है. छोटे बच्चों के लिए यह स्थिति बेहद खतरनाक होती है. इसके शुरुआती लक्षण तेज बुखार, सिर दर्द, उल्टी और बेहोशी हैं. अगर समय पर इलाज न मिले, तो यह दौरे (सीजर्स), कोमा या मौत का कारण बन सकता है. आमतौर पर यह बीमारी हर्पीस वायरस या मच्छरों से फैलती है, मगर बैक्टीरिया या फंगस भी इसकी वजह हो सकते हैं.

सलूंबर के मुख्य चिकित्सा व स्वास्थ्य अधिकारी महेंद्र कुमार परमान ने बताया, “जिन बच्चों की मौत हुई, उन सबमें उल्टी, बुखार, बेहोशी और दिमाग ठीक से काम नहीं करने जैसे एक ही तरह के लक्षण दिखाई दिए हैं.”

उदयपुर व जयपुर से वरिष्ठ चिकित्सकों की टीम सलूंबर पहुंचकर बीमारी के कारणों की जांच कर रही है. स्वास्थ्य विभाग की 6167 टीमों ने अब तक 1.20 लाख घरों का सर्वे किया है. इनमें 85 बच्चों में उल्टी व बुखार के लक्षण मिले हैं, जिन्हें उदयपुर रेफर किया गया है. सही कारण का पता लगाने के लिए उनके सैंपल लैब भेजे गए हैं. इन टीमों ने सर्दी, जुकाम और बुखार जैसे लक्षणों वाले 924 मरीजों का मौके पर ही उपचार किया.

चिकित्सक इन आठ बच्चों की मौत के पीछे 'चांदीपुरा वायरस' का अंदेशा भी जता रहे हैं. इसे देखते हुए सावधानी और बढ़ा दी गई है. बताया जा रहा है कि देश के कुछ अन्य इलाकों में चांदीपुरा वायरस से प्रभावित बच्चों के लक्षण सलूंबर के मामलों से मेल खा रहे हैं. चांदीपुरा एक खतरनाक वायरस है, जो आमतौर पर सैंडफ्लाई (रेतीली मक्खियों) के जरिए फैलता है.

वायरस चांदीपुरा हो या एन्सेफलाइटिस, एक बात तय है कि यह बीमारी जितनी खतरनाक है, उससे कहीं ज्यादा खतरनाक वह सिस्टम है जो हर बार चेतावनी को नजरअंदाज करता है और मौतों के बाद हरकत में आता है. सवाल यह भी है कि क्या सरकार इस बार अपनी जिम्मेदारी निभाएगी या फिर इन बच्चों की मौत भी फाइलों में दबकर रह जाएगी?

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