इन्फ्रास्ट्रक्चर पर खर्च आधा, कर्ज दोगुना! भजनलाल सरकार पर उठे सवाल

CAG की रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार पिछले वित्त वर्ष में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए तय बजट का केवल आधा ही खर्च कर पाई

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा (फाइल फोटो)

देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने राजस्थान में बुनियादी ढांचे के विकास के लिए आवंटित बजट में भारी कमी को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. इसका सीधा मतलब है कि राजस्थान में बुनियादी ढांचे के विकास की रफ्तार मंद पड़ गई है.

CAG की रिपोर्ट के मुताबिक राजस्थान की भजनलाल सरकार वित्त वर्ष 2025-26 में पूंजीगत व्यय यानी इंफ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए तय बजट का केवल 51.82 प्रतिशत ही खर्च कर पाई. पश्चिम बंगाल के बाद राजस्थान देश का दूसरा ऐसा राज्य है जहां बुनियादी तंत्र के विकास के लिए आवंटित बजट का आधा हिस्सा ही खर्च हुआ. 

पश्चिम बंगाल सरकार चुनावी वर्ष में भी बजट का महज 48 फीसदी हिस्सा खर्च कर सकी. एक तरफ राजस्थान, छत्तीसगढ़ और बंगाल जैसे राज्य इस श्रेणी में पिछड़ गए, वहीं कर्नाटक, तेलंगाना जैसे राज्यों ने इस मद में आवंटित बजट का 100 फीसदी से ज्यादा हिस्सा खर्च कर दिया. 

बुनियादी ढांचे को गति देने में बिहार, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों की स्थिति भी बेहतर रही है. बुनियादी ढांचे के लिए आवंटित बजट सड़क, अस्पताल, स्कूल, पुल और अन्य विकास परियोजनाओं पर खर्च किया जाता है. CAG के आंकड़ों के अनुसार राजस्थान सरकार ने 2025-26 के लिए पूंजीगत व्यय के लिए 56,327 करोड़ रुपए का बजट तय किया था, लेकिन मार्च 2026 तक इसमें से केवल 29,190 करोड़ रुपए यानी करीब आधा बजट ही खर्च किया जा सका.

केंद्र सरकार राज्यों को बुनियादी ढांचे में निवेश बढ़ाने की लगातार सलाह देती रही है, ऐसे वक्त में ‘डबल इंजन सरकार’ में इस तरह बजट का कम खर्च होना कई सवालों को जन्म दे रहा है. CAG की रिपोर्ट के बाद सूबे की भजनलाल सरकार विपक्ष के निशाने पर आ गई है. राजस्थान विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली का कहना है, "मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा कांग्रेस के 5 वर्षों के शासन से अपने 2 वर्षों की तुलना का जो झूठा माहौल बना रहे थे, उसे CAG की रिपोर्ट ने उजागर कर दिया है. इस सरकार ने राजस्थान को विकास में नहीं बल्कि कर्ज में आगे बढ़ाया है. भाजपा सरकार का वित्तीय कुप्रबंधन अब सामने आ गया है."

विपक्ष ही नहीं, बजट विशेषज्ञ भी बुनियादी बजट में कटौती को सूबे के लिए खतरनाक संकेत मान रहे हैं. बजट अध्ययन राजस्थान केंद्र (बार्क) के राज्य समन्वयक निसार अहमद कहते हैं, “किसी भी राज्य की आर्थिक सेहत का सबसे बड़ा संकेत उसका पूंजीगत व्यय होता है. अगर सरकार सड़क, अस्पताल, शिक्षा और सिंचाई जैसी परिसंपत्तियों पर तय बजट भी खर्च नहीं कर पा रही है, तो इसका मतलब है कि विकास परियोजनाएं जमीन पर धीमी पड़ रही हैं. विकास खर्च कम होगा तो कर्ज लगातार बढ़ता जाएगा, जिससे भविष्य में सरकार पर ब्याज और वित्तीय दबाव भी बढ़ेगा.”

अहमद की यह बात इसलिए भी अहम है क्योंकि राजस्थान में बुनियादी ढांचे के लिए आवंटित बजट में कमी के साथ ही कर्ज भार भी बहुत तेजी से बढ़ा है. साल 2025-26 में राजस्थान सरकार ने बजट अनुमान से 65 फीसदी ज्यादा कर्जा लिया. CAG रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि राजस्थान सरकार ने वित्तीय वर्ष के दौरान अनुमान से कहीं ज्यादा कर्ज लिया. 

सरकार ने करीब 43 हजार करोड़ रुपए उधार लेने का अनुमान रखा था, वहीं वर्ष के अंत तक यह आंकड़ा 1.21 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया. यानी, सरकार ने करीब 78 हजार करोड़ का अतिरिक्त कर्जा लिया. CAG ने सलाह दी है कि विकास बजट का उपयोग पूरे साल संतुलित तरीके से होना चाहिए ताकि परियोजनाओं की गुणवत्ता प्रभावित न हो.

बुनियाद बजट में कटौती का असर 

विशेषज्ञों के अनुसार पूंजीगत खर्च में कमी का सीधा असर आम लोगों और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है. सड़क और पुल परियोजनाओं में देरी होने से परिवहन लागत बढ़ती है और उद्योगों को नुकसान होता है. अस्पताल और स्वास्थ्य ढांचे पर कम खर्च का असर ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों की चिकित्सा सुविधाओं पर पड़ सकता है. 

वहीं स्कूल, कॉलेज और तकनीकी संस्थानों के निर्माण में सुस्ती से शिक्षा क्षेत्र प्रभावित होने की आशंका है. इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में कमी का असर रोजगार पर भी पड़ता है. निर्माण कार्य धीमे होने से सीमेंट, लोहा, मशीनरी और परिवहन जैसे क्षेत्रों में मांग घटती है. इससे हजारों श्रमिकों और छोटे कारोबारियों की आय प्रभावित होती है. पूंजीगत खर्च में कमी लंबे समय में प्रदेश की विकास दर और निवेश आकर्षित करने की क्षमता को भी कमजोर कर सकती है.

देखा जाए तो राजस्थान जैसे बड़े और तेजी से बढ़ते राज्य के लिए बुनियादी ढांचे पर निवेश केवल सरकारी आंकड़ों का विषय नहीं, बल्कि रोजगार, उद्योग, शिक्षा और आम लोगों की सुविधाओं से जुड़ा सवाल है. ऐसे में CAG रिपोर्ट ने यह बहस तेज कर दी है कि आखिर बढ़ते कर्ज के बावजूद विकास परियोजनाओं की रफ्तार धीमी क्यों पड़ रही है? आने वाले समय में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह विकास कार्यों को जमीन पर कितनी तेजी से उतार पाती है.

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