राजस्थान में क्यों शुरू हुई विधानसभा सीटें बढ़ने की चर्चा?

केंद्र सरकार 29 मार्च को संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का यह संशोधित प्रारूप पेश करने जा रही है जिसके तहत लोकसभा में सीटें बढ़ेंगी और इसका असर राज्यों पर पड़ना तय है

सांकेतिक फोटो

राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी के एक बयान से प्रदेश के सियासी हलकों में नई चर्चा शुरू हो गई है. अपने दो साल के कार्यकाल पर आधारित पुस्तक के विमोचन समारोह में देवनानी ने कहा, "वर्तमान में जहां 200 विधायक सदन में बैठते हैं, वहीं आगामी जनगणना के बाद यह संख्या बढ़कर 270 तक हो सकती है. विधानसभा भवन को भविष्य की इन्हीं जरूरतों को ध्यान में रखते हुए 280 विधायकों की क्षमता के अनुसार तैयार किया जा रहा है."

देवनानी का यह बयान ऐसे समय आया है, जब केंद्र सरकार भी सीटों के पुनर्गठन को लेकर सक्रिय नजर आ रही है. 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023' के प्रस्तावित व संशोधित नए फॉर्मूले में लोकसभा सीटों में 50 प्रतिशत तक वृद्धि और उनमें से 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की योजना पर काम चल रहा है. केंद्र सरकार 29 मार्च को संसद में नारी शक्ति वंदन अधिनियम का यह संशोधित प्रारूप पेश करने जा रही है.

इसका सबसे अहम पहलू सीटों का नया फॉर्मूला है. इसके तहत लोकसभा की कुल सीटों में 50 फीसदी की वृद्धि की जाएगी और बढ़ी हुई कुल सीटों में से 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. माना जा रहा है कि 2029 का लोकसभा चुनाव इसी नए ढांचे के तहत हो सकता है.

इस संभावित बदलाव का असर राज्यों पर भी पड़ना तय है. अगर यही फॉर्मूला लागू होता है, तो राजस्थान में भी विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हो सकती है. इस फॉर्मूले के तहत राजस्थान में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़कर 266 होना तय माना जा रहा है. इसके साथ ही सियासी गलियारों में यह चर्चा भी शुरू हो गई है कि राजस्थान के 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव इन्हीं बढ़ी हुई सीटों के आधार पर हो सकते हैं.

राजस्थान में विधानसभा सीटों की संख्या में आखिरी बार 1977 में बढ़ोतरी हुई थी, जब 1971 की जनगणना के आधार पर सीटें 184 से बढ़ाकर 200 कर दी गई थीं. इसके बाद से अब तक सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ है. हालांकि, 2008 में परिसीमन जरूर हुआ, जिसमें 180 विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं और 36 विधानसभा सीटों के नामों में बदलाव किए गए, मगर सीटों की संख्या पहले जैसी रही. ऐतिहासिक रूप से देखें तो 1952 में राज्य में 160 विधानसभा सीटें थीं. अजमेर रियासत के राजस्थान में विलय के बाद 1957 में यह संख्या 167, 1967 में 184 और 1977 में 200 हो गई. इसी तरह लोकसभा सीटों में भी आखिरी बदलाव 1977 में हुआ था, जिसके बाद से राजस्थान में 25 सीटें ही बनी हुई हैं.

देखा जाए तो जनसंख्या के लिहाज से देश में सातवें स्थान पर होने के बावजूद विधानसभा सीटों के मामले में राजस्थान आठवें स्थान पर है. वहीं लोकसभा सीटों की संख्या के आधार पर राज्य नौवें पायदान पर आता है. दिलचस्प बात यह है कि गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों की तुलना में अधिक जनसंख्या होने के बावजूद राजस्थान में लोकसभा सीटें कम हैं. राजस्थान में 25 लोकसभा सीटें हैं, जबकि गुजरात में 26 और कर्नाटक में 28 संसदीय क्षेत्र हैं.

1952 में राजस्थान में 20 संसदीय क्षेत्र थे, जिन्हें 1957 में 22 और 1967 में 23 किया गया. संभावना जताई जा रही है कि नए परिसीमन में राजस्थान में लोकसभा सीटों की संख्या 25 से बढ़ाकर 35-40 और राज्यसभा की सीटों की संख्या 10 से बढ़ाकर 15-18 तक की जा सकती है.
संवैधानिक विशेषज्ञ और राज्यसभा सांसद घनश्याम तिवाड़ी के अनुसार, "2026 की जनगणना के बाद नए परिसीमन आयोग का गठन होगा. यह आयोग जनसंख्या के आधार पर सीटों की संख्या और सीमाएं तय करेगा. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में गठित होने वाले परिसीमन आयोग में राज्यों के प्रतिनिधि भी शामिल होते हैं. इस बार राजस्थान में लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ना तय है."

दरअसल, 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा और विधानसभा सीटों में बढ़ोतरी पर रोक लगा दी गई थी, जिसे 2002 के 84वें संशोधन द्वारा 2026 तक बढ़ा दिया गया. अब इस रोक के समाप्त होने के बाद सीटों के पुनर्गठन का रास्ता साफ हो जाएगा. हालांकि, वे राज्य इसका अपवाद हैं जिनके बंटवारे के बाद उनमें विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या 2002 के बाद भी तय की गई.
क्या है परिसीमन आयोग?

संविधान के अनुच्छेद 170 के तहत परिसीमन आयोग आखिरी जनगणना व जनसंख्या के आधार पर राज्यों की विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या तय करता है. परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत प्रत्येक राज्य में लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के लिए सीटों की संख्या और उनके निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं. यह कार्य परिसीमन अथवा सीमा आयोग की ओर से किया जाता है. परिसीमन आयोग के आदेश कानून के समान प्रभावी होते हैं और इन्हें न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती.

देश में अब तक चार परिसीमन आयोगों का गठन किया जा चुका है. 1952 में पहला परिसीमन आयोग बना था. उसके बाद 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग बने. लोकसभा सीटों की संख्या आखिरी बार 1976 में बढ़ाई गई थी.

1971 की जनगणना के हिसाब से उस वक्त सीटों की संख्या 522 से बढ़ाकर 545 कर दी गई थी, मगर 2019 के 104वें संविधान संशोधन के तहत एंग्लो इंडियन समुदाय के लिए आरक्षित दो सीटों को समाप्त किए जाने के बाद यह संख्या 543 रह गई है. आजादी के बाद से आज तक जब भी सीटों की संख्या में इजाफा किया गया है, उसका आधार जनसंख्या को बनाया गया है. 1971 तक यही सिलसिला चला.

1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने पर रोक लगाई गई थी. इस रोक को 2002 में 84वें संविधान संशोधन के जरिए 2026 तक बढ़ा दिया गया था. अब 2026 की जनगणना के आधार पर गठित होने वाला पांचवां परिसीमन आयोग विधानसभा और लोकसभा की सीटें तय करेगा.

नए राज्य बनने के बाद कुछ राज्यों में बदल गई थी विधानसभा सीटें

बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के बंटवारे के बाद उनकी विधानसभा और लोकसभा सीटों की संख्या नए सिरे से तय हुई. बिहार में वर्ष 2000 में झारखंड के अलग होने के बाद विधानसभा सीटों की संख्या 243 निर्धारित हुई. साल 2000 में उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड के अलग होने के बाद, साल 2008 के परिसीमन में यहां सीटों की संख्या 403 तय हुई. उत्तराखंड बनने से पहले यहां विधानसभा सीटों की संख्या 425 थी. तेलंगाना के अलग होने के बाद आंध्र प्रदेश में विधानसभा सीटों की संख्या 2014 में 175 निर्धारित की गई.

देश में जम्मू-कश्मीर ऐसा केंद्र शासित प्रदेश है जहां कुछ समय पहले ही विधानसभा सीटों का पुनर्निर्धारण हुआ है. 2022 में जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग ने जम्मू के लिए 43 और कश्मीर के लिए 47 विधानसभा सीटें तय कीं.

हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल, गुजरात, कर्नाटक और केरल जैसे राज्यों में आखिरी बार 1971 की जनगणना के हिसाब से विधानसभा और लोकसभा की सीटें तय हुई थीं. 2026 की जनगणना के आधार पर अब इन राज्यों में सीटों का फेरबदल होगा. वहीं महाराष्ट्र विधानसभा की सीटों की संख्या 1980 में 270 से बढ़ाकर 288 की गई थी.

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