बंगाल हत्याकांड : राज सिंह की गिरफ्तारी से पूर्वी यूपी की सियासत में हलचल
पश्चिमी बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के पूर्व निजी सचिव चंद्रनाथ रथ की हत्या के आरोप में बलिया के राज सिंह को गिरफ्तार किया गया है

पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के पूर्व निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की हत्या के मामले में बलिया के राज सिंह की गिरफ्तारी ने पूर्वांचल की राजनीति, अपराध और सोशल मीडिया से पैदा हुए नए किस्म के ‘लोकल पावर सेंटर’ पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.
25 वर्षीय राज सिंह की पहचान सिर्फ एक स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता तक सीमित नहीं थी. सोशल मीडिया पर वह खुद को अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा का प्रदेश महासचिव बताता था, BJP नेताओं के साथ तस्वीरें साझा करता था, गाड़ियों के काफिले और गनमैन के साथ रील बनाता था.
इसके अलावा वह 'मिशन ब्लॉक प्रमुख 2026’ जैसे संदेशों के जरिए अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का खुला प्रदर्शन भी करता रहता था. लेकिन अब वही युवक पश्चिम बंगाल सीआईडी और एसटीएफ की जांच के केंद्र में है. जांच एजेंसियों का दावा है कि चंद्रनाथ रथ की हत्या के लिए बाहर से बुलाए गए कथित शूटरों और संसाधन उपलब्ध कराने वालों में उसकी भूमिका सामने आई है. हालांकि परिवार इसे राजनीतिक साजिश बताते हुए राज को निर्दोष बता रहा है.
ऐसे शुरू हुई ‘पहचान’ बनाने की कहानी
राज सिंह बलिया जिले के सदर कोतवाली क्षेत्र के आनंद नगर का निवासी है. मूल रूप से उसका परिवार चिलकहर ब्लॉक के गड़वार थाना क्षेत्र स्थित कुरेजी गांव से जुड़ा है. पिता केशव सिंह शिक्षक रहे हैं और परिवार सामाजिक रूप से सम्मानित माना जाता था. बड़े भाई यशवंत सिंह निजी व्यवसाय चलाते हैं, जबकि बहन वकालत करती हैं. परिवार लंबे समय से BJP समर्थक रहा है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, राज बचपन से ही 'मनबढ़' और 'दबंग छवि' बनाने की कोशिश करता था.
पढ़ाई के दौरान ही उसकी रुचि छात्र राजनीति में बढ़ी. उसने मुरली मनोहर टाउन पीजी कॉलेज और बाद में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से पढ़ाई की. कॉलेज के दिनों में वह स्थानीय नेताओं के संपर्क में आया और धीरे-धीरे उसने खुद को 'युवा क्षत्रिय नेता' के रूप में प्रोजेक्ट करना शुरू कर दिया. उसके सोशल मीडिया प्रोफाइल इस महत्वाकांक्षा की झलक देते हैं. फेसबुक और इंस्टाग्राम पर उसने खुद को 'प्रदेश महासचिव, अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा' और 'मिशन ब्लॉक प्रमुख चिलकहर' लिख रखा था. राजनीतिक कार्यक्रमों, नेताओं से मुलाकात और लग्जरी गाड़ियों के साथ तस्वीरें उसकी डिजिटल पहचान का हिस्सा थीं.
तस्वीरों की राजनीति और ‘करीबी’ का खेल
राज सिंह की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया पर उसकी कई तस्वीरें तेजी से वायरल हुईं. इनमें उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दयाशंकर सिंह समेत कई BJP नेताओं के साथ उसकी तस्वीरें शामिल हैं. हालांकि BJP नेताओं ने उससे किसी राजनीतिक संबंध से साफ इनकार किया है. बलिया में BJP के जिला अध्यक्ष संजय मिश्रा ने कहा कि नेताओं के साथ तस्वीर खिंचवा लेना किसी राजनीतिक संबद्धता का प्रमाण नहीं है. वहीं परिवहन मंत्री दयाशंकर सिंह ने भी कहा कि राज का BJP से कोई संबंध नहीं था. लेकिन स्थानीय राजनीति को करीब से देखने वाले लोग इसे सिर्फ 'फोटो पॉलिटिक्स' नहीं मानते.
पूर्वांचल की राजनीति में लंबे समय से ऐसी प्रवृत्ति रही है, जहां महत्वाकांक्षी युवा नेता सत्ता पक्ष के नेताओं के आसपास रहकर अपनी पहचान गढ़ते हैं. सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और मजबूत किया है. एक तस्वीर, एक रील या किसी मंत्री के कार्यक्रम में मौजूदगी स्थानीय स्तर पर प्रभाव पैदा करने का माध्यम बन जाती है. राज सिंह भी इसी मॉडल पर काम करता दिखाई देता है. वह नेताओं के साथ तस्वीरें साझा करता, गाड़ियों के काफिले के साथ वीडियो बनाता और खुद को भविष्य का ब्लॉक प्रमुख बताकर समर्थकों के बीच प्रभाव स्थापित करने की कोशिश करता था.
परिवार के मुताबिक, राज पंचायत राजनीति में सक्रिय होना चाहता था. पहले उसकी नजर सभासद चुनाव पर थी, लेकिन सीट आरक्षित होने के बाद उसने ब्लॉक प्रमुख की राजनीति पर ध्यान केंद्रित किया. उसके भाई यशवंत सिंह का दावा है कि राज सक्रिय रूप से राजनीतिक नेटवर्क बना रहा था और भविष्य में बड़ा नेता बनना चाहता था. यही वजह थी कि वह लगातार नेताओं के संपर्क में रहने की कोशिश करता था.
स्थानीय लोगों के अनुसार, वह अक्सर दो या तीन एसयूवी गाड़ियों के काफिले के साथ चलता था. कई बार उसके साथ बिहार और पूर्वांचल के दूसरे जिलों के युवक भी दिखाई देते थे. इलाके में उसकी छवि एक ऐसे युवक की बन रही थी जो “सिस्टम तक पहुंच” रखता है. गांव के लोगों का कहना है कि वह कम ही गांव आता था. उसका अधिकांश समय बलिया शहर, नगरा, रसड़ा और चिलकहर इलाके में बीतता था.
अपराध के आरोप और बढ़ती दबंग छवि
राज सिंह का नाम पहली बार 2020 में आनंद नगर में दिव्यांग अंडा दुकानदार अजीत गुप्ता को गोली मारने के मामले में सामने आया था. आरोप था कि उधार के 50 रुपए मांगने पर विवाद हुआ और बाद में अजीत को गोली मार दी गई. हालांकि उस मामले में पुलिस की कार्रवाई सीमित रही और परिवार लगातार राजनीतिक संरक्षण का आरोप लगाता रहा. अजीत गुप्ता के पिता पारस नाथ गुप्ता अब खुलकर कह रहे हैं कि राजनीतिक संरक्षण की वजह से राज के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं हुई. स्थानीय लोगों के अनुसार, उस घटना के बाद इलाके में राज की 'दबंग' छवि और मजबूत हो गई.
सोशल मीडिया पर वायरल कुछ वीडियो में वह गनमैन के साथ दिखाई देता है और मूंछों पर ताव देता नजर आता है. यह सब एक ऐसे 'स्थानीय पावर सेंटर' की छवि गढ़ने की कोशिश थी, जो राजनीति और ताकत दोनों का प्रदर्शन कर सके.
बंगाल हत्याकांड और जांच एजेंसियों का दावा
6 मई की रात पश्चिम बंगाल के मध्यमग्राम में चंद्रनाथ रथ की हत्या हुई थी. इसके बाद बंगाल पुलिस और एसटीएफ ने बिहार और यूपी के कई जिलों में छापेमारी की. जांच एजेंसियों के अनुसार, हत्या के बाद भाग रहे आरोपियों ने जिन टोल प्लाजा पर यूपीआई और फास्टैग से भुगतान किया, उसी डिजिटल ट्रेल ने पुलिस को आरोपियों तक पहुंचाया. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, बक्सर निवासी मयंक मिश्रा और विक्की मौर्या की गिरफ्तारी के बाद राज सिंह का नाम सामने आया. इसके बाद यूपी एसटीएफ और कोलकाता पुलिस ने राज सिंह को अयोध्या से गिरफ्तार किया.
जांच एजेंसियों का दावा है कि राज ने कथित शूटरों को संसाधन उपलब्ध कराने और नेटवर्क बनाने में भूमिका निभाई. हालांकि अभी तक हत्या की सुपारी किसने दी और हत्या के पीछे असली मकसद क्या था, इसकी जांच जारी है.
राज सिंह का परिवार पूरे मामले को साजिश बता रहा है. उसकी मां जामवंती देवी ने सीसीटीवी फुटेज जारी कर दावा किया कि घटना के समय राज घर पर था. परिवार का कहना है कि वह कभी कोलकाता गया ही नहीं. बहन ने मामले की सीबीआई जांच की मांग की है, जबकि परिवार के वकीलों ने पश्चिम बंगाल पुलिस पर गिरफ्तारी के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं के पालन न करने का आरोप लगाया है. भाई यशवंत सिंह का कहना है कि राज एक राजनीतिक कार्यकर्ता है और उसे गलत तरीके से अपराधी साबित किया जा रहा है. उनका दावा है कि हत्या के समय का सीसीटीवी फुटेज राज की मौजूदगी घर पर दिखाता है. हालांकि जांच एजेंसियां इस दावे की जांच कर रही हैं और अभी तक किसी निष्कर्ष पर सार्वजनिक रूप से नहीं पहुंची हैं.
पूर्वांचल में ‘राजनीति-अपराध-सोशल मीडिया’ का नया मॉडल
राज सिंह का मामला सिर्फ एक हत्या की जांच तक सीमित नहीं है. यह पूर्वांचल में उभर रही उस नई सामाजिक-राजनीतिक प्रवृत्ति की भी कहानी है, जहां सोशल मीडिया के जरिए प्रभावशाली दिखना, नेताओं के साथ तस्वीरें साझा करना और स्थानीय स्तर पर शक्ति प्रदर्शन करना राजनीतिक पहचान का माध्यम बन गया है. ऐसे कई युवा बिना किसी औपचारिक राजनीतिक पद के भी खुद को 'नेता' के रूप में स्थापित करने की कोशिश करते हैं.
गाड़ियों के काफिले, सुरक्षाकर्मियों जैसी दिखने वाली मौजूदगी, सोशल मीडिया रील्स और नेताओं के साथ फोटो उनके लिए राजनीतिक पूंजी का काम करती है. विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक राजनीति और अपराधी नेटवर्क के बीच की रेखाओं को धुंधला करती जा रही है. कई बार स्थानीय स्तर पर ऐसे युवकों को राजनीतिक संरक्षण का एहसास मिलता है, जिससे उनकी सामाजिक पकड़ बढ़ती है और प्रशासनिक तंत्र पर प्रभाव का दावा मजबूत होता है. राज सिंह की कहानी भी इसी जटिल ताने-बाने का हिस्सा दिखाई देती है, जहां महत्वाकांक्षा, सोशल मीडिया की चमक, स्थानीय राजनीति और कथित आपराधिक संपर्क एक-दूसरे में घुलते नजर आते हैं.
राज सिंह की गिरफ्तारी के बाद जांच एजेंसियां उसके राजनीतिक संपर्कों, वित्तीय गतिविधियों और कथित आपराधिक नेटवर्क की पड़ताल कर रही हैं. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, अपराध से अर्जित संपत्तियों और उसके संपर्कों की भी जांच हो रही है. स्थानीय स्तर पर उसके करीबी माने जाने वाले कई लोग फिलहाल सामने आने से बच रहे हैं. इलाके में यह चर्चा भी है कि गिरफ्तारी के बाद उससे जुड़े कई युवक भूमिगत हो गए हैं.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राज सिंह सिर्फ महत्वाकांक्षी स्थानीय राजनीतिक कार्यकर्ता था, या फिर उसने राजनीति की आड़ में ऐसा नेटवर्क तैयार कर लिया था, जो अब राष्ट्रीय स्तर की आपराधिक जांच के दायरे में आ गया है. जांच आगे बढ़ने के साथ यह मामला सिर्फ एक हत्या की गुत्थी नहीं रहेगा, बल्कि पूर्वांचल की उस बदलती राजनीति का आईना भी बन सकता है, जहां सोशल मीडिया की चमक और सत्ता के करीब दिखने की होड़ कई बार युवाओं को खतरनाक रास्तों तक ले जाती है.