ओडिशा में राज्यसभा की फंसी हुई एक सीट निकालने के लिए BJP क्या जुगत भिड़ा रही?

ओडिशा की चार राज्यसभा सीटों में से चौथी पर BJD-कांग्रेस समर्थित उम्मीदवार के मुकाबले BJP ने एक ‘निर्दलीय’ उम्मीदवार को समर्थन दिया है

Dilip ray with Amit Shah
राज्यसभा चुनाव के लिए 'निर्दलीय' उम्मीदवार दिलीप राय के साथ केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह (फाइल फोटो)

ओडिशा की चार राज्यसभा सीटों के लिए 16 मार्च को मतदान होना है. इसमें दो सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एक सीट पर बीजू जनता दल (BJD) की जीत पक्की दिख रही है. चौथी सीट सुरक्षित करने के लिए BJD और कांग्रेस के बीच 24 साल बाद गठबंधन हुआ है.लेकिन गुत्थी तब उलझी, जब पूर्व केंद्रीय मंत्री दिलीप राय ने BJP रहते हुए बतौर स्वतंत्र उम्मीदवार नामांकन कर दिया.

वे राज्य के बड़े व्यवसायी भी हैं, जिनके कई होटल हैं.  ओडिशा विधानसभा के 147 सदस्यों में BJP के पास 79 विधायक हैं और तीन निर्दलीयों का उन्हें समर्थन प्राप्त है. यानी उनके पास फिलहाल कुल 82 विधायकों का वोट है. जीत के लिए प्रत्येक उम्मीदवार को 30 प्रथम वरीयता के वोट चाहिए.

ऐसे में दांव पर लगी चार सीटों में से दो सीटें जीतना BJP के लिए तय माना जा रहा है. दूसरी ओर BJD के पास विधानसभा में 50 विधायक हैं, लेकिन दो विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निलंबित किए जाने के बाद प्रभावी संख्या घटकर 48 रह गई है. यानी उसकी भी एक सीट पक्की दिख रही है.   

चौथी सीट पक्की करने के लिए BJD ने प्रसिद्ध यूरोलॉजिस्ट डॉ. दत्तेश्वर होता को मैदान में उतारा है, जिन्हें 14 सदस्यों वाली कांग्रेस और एक सदस्य वाली CPI (M) ने समर्थन दिया है. अगर सभी वोट पार्टी लाइन के मुताबिक पड़े, तो यह सीट भी पक्की मानी जा सकती है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि विपक्षी दलों की एकजुटता क्या दिलीप राय के पक्ष में संभावित क्रॉस-वोटिंग को रोक पाएगी?  

BJP के दो आधिकारिक उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित होने के बाद भी पार्टी के पास लगभग 22 प्रथम वरीयता वोट बचेंगे, जो संभवतः राय को मिल सकते हैं. इसके अलावा BJD के निलंबित दो विधायकों, अरविंद मोहापात्रा और सनातन महाकुड़ के वोट भी राय को मिलने की संभावना है. यदि ऐसा होता है, तो राय को जीत के लिए केवल छह और प्रथम वरीयता वोटों की जरूरत होगी. 

उनके रसूख खासकर आर्थिक और अतीत की घटनाओं को देखते हुए यह मुश्किल भी नहीं माना जा रहा.   यही वजह है कि दिलीप राय आखिरी वक्त में नामांकन करने के बाद 'अंतरात्मा की आवाज' पर वोट करने की अपील कर रहे हैं. 5 मार्च को मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, "मुझे उम्मीद है कि मेरे पक्ष में अंतरात्मा की आवाज़ पर वोट डाले जाएंगे." दिलीप राय अनायास ही ऐसी अपील नहीं कर रहे हैं. वे पहले भी ऐसा कर चुके हैं, जिसमें उन्हें सफलता मिली थी. 

साल 2002 के राज्यसभा चुनाव के दौरान वे BJD के सदस्य थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया था. तब उन्होंने निर्दलीय पर्चा दाखिल कर दिया था, जिसके बाद पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया. दिलचस्प बात यह है कि उस दौरान उन्हें बड़ी संख्या में क्रॉस-वोटिंग के जरिए वोट मिले थे, जिनमें अधिकांश वोट BJD विधायकों के ही थे.  उस दौर में राज्यसभा चुनाव गुप्त मतदान से होते थे, फिर भी राय के पक्ष में वोट देने वाले BJD के बागी विधायकों को आसानी से पहचान लिया गया था. दूसरी खास बात यह रही कि पार्टी लाइन से अलग जाकर चुनाव लड़ने के कारण राय पर तो कार्रवाई हुई, लेकिन उन्हें वोट देने वाले विधायकों पर नहीं. तत्कालीन मुख्यमंत्री और BJD अध्यक्ष नवीन पटनायक ने पार्टी में टूट की आशंका के चलते उनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया था.

क्यों छह वोट का जुगाड़ आसान लग रहा है

सूत्रों के मुताबिक, दिलीप राय मंझे हुए राजनेता हैं और उन्होंने कुछ संभावना देखकर ही आखिरी समय में नामांकन किया है. उन्हें पता है कि BJD और कांग्रेस के अंदर कुछ विधायक नाराज चल रहे हैं और वे इस असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश कर सकते हैं.   हाल ही में BJD ने पूर्व विधायक प्रभात बिस्वाल को डॉ. होता की उम्मीदवारी का विरोध करने पर पार्टी से निकाल दिया था. उनके बेटे सौविक बिस्वाल कटक-चौदवार से विधायक हैं और बताया जा रहा है कि वे अपने पिता के खिलाफ हुई इस कार्रवाई से खासे नाराज हैं. 

इसी तरह पूर्व विधायक प्रभात त्रिपाठी भी असंतुष्ट बताए जाते हैं, जिनके बेटे देबी रंजन त्रिपाठी वर्तमान में विधायक हैं.   कांग्रेस में भी असंतोष की खबरें हैं. बीते साल दिसंबर में पूर्व विधायक मोहम्मद मुकीम ने केंद्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की उम्र पर सवाल उठाया था और सीधे राहुल गांधी को चिट्ठी लिखी थी, जिसके बाद उन्हें निकाल दिया गया था. उनकी बेटी सोफिया फिरदौस कटक-बराबती से कांग्रेस विधायक हैं. 

दिलीप राय के लिए यहां भी संभावना बनती दिख रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राय इन नाराज विधायकों का समर्थन हासिल करने की कोशिश करेंगे. हालांकि वे कहते हैं, "पिछले राज्यसभा चुनाव में जब मैं लड़ा था, तब मेरे पास समर्थन जुटाने के लिए दो महीने का समय था. इस बार समय कम है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि लोग मुझे वोट करेंगे."   

लेकिन क्या BJD और कांग्रेस अपने विधायकों को एकजुट कर पाएंगे? कांग्रेस विधायक प्रदीप माझी कहते हैं, "हमने जिन्हें समर्थन दिया है, उन्हें कांग्रेस के सभी 14 विधायक सपोर्ट कर रहे हैं. BJP की तरफ से कांग्रेसी विधायकों को तोड़ने का प्रयास शुरू हो चुका है, लेकिन इस बार हम ओडिशा में ऐसा नहीं होने देंगे. जहां तक दिलीप राय की बात है, वह वोट मांग रहे हैं, लेकिन अभी तक किसी कांग्रेसी विधायक से संपर्क नहीं किया गया है." वहीं BJD विधायकों के टूटने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह नवीन पटनायक को देखना है. उधर BJD विधायक गौतम बुद्ध दास भी पार्टी की एकजुटता का दावा कर रहे हैं.

कौन हैं दिलीप राय

कभी बीजू पटनायक और फिर नवीन पटनायक के सबसे करीबी सहयोगियों में गिने जाने वाले राय, BJD के संस्थापक सदस्यों में से एक थे. वे इस्पात, कोयला और संसदीय मामलों के केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं. राय एकमात्र ओडिया सांसद हैं, जो देवगौड़ा, गुजराल और वाजपेयी तीनों प्रधानमंत्रियों के मंत्रिमंडल का हिस्सा रहे हैं.   साल 2000 में वाजपेयी सरकार से हटाए जाने के बाद उनके और नवीन पटनायक के बीच मतभेद हो गए. 

दो साल बाद जब उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं मिला और उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया, तो उन्हें निष्कासित कर दिया गया. इसके बावजूद 2002 में राय ने चुनाव जीत लिया था और उस समय BJD के लगभग 15 विधायकों ने उनके पक्ष में क्रॉस-वोटिंग की थी.  व्यवसायी के तौर पर वह 'मेफेयर ग्रुप ऑफ होटल्स' के संस्थापक और मुख्य प्रबंधक हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान दाखिल किए गए शपथ पत्र के मुताबिक उनकी कुल संपत्ति 313 करोड़ रुपये है.

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