ओडिशा में सबसे कमजोर आदिवासी समुदाय अब तक सरकारी मदद से दूर!

ओडिशा में कुल 13 जनजातियों को विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह यानी PVTG का दर्जा दिया गया है. हाल में आई CAG रिपोर्ट के मुताबिक इनकी आधी से ज्यादा आबादी तक सरकारी योजनाएं नहीं पहुंच रहीं

Khond Tribe from Odisha (Photo : Odisha Tourism)
ओडिशा के खोंड आदिवासी समुदाय की एक महिला (फोटो : ओडिशा टूरिज्म)

मनकिडिया. यह एक खास जाति का नाम है. ओडिशा की एक ऐसी जाति, जिसके पूरे देश में मात्र 203 लोग बचे हैं. इन्हें बचाने के लिए इस वक्त धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान, प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय महा अभियान, प्रधानमंत्री जनजातीय विकास मिशन और एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल जैसी अनेक योजनाएं चल रही हैं. इन योजनाओं का उद्देश्य इस संख्या को बरकरार रखने के साथ-साथ इसे बढ़ाना भी है.

लेकिन ओडिशा में जमीन पर ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा है. आदिम जनजातियों के कुल 288 गांवों में आज तक सड़क नहीं पहुंची है. वहीं, 231 गांवों के आदिवासियों ने अब तक बिजली नहीं देखी है. स्थिति इतनी विकट है कि 297 गांवों में पीने के लिए साफ पानी उपलब्ध नहीं है और 773 गांवों में आज तक मोबाइल नेटवर्क तक नहीं पहुंचा है.

ओडिशा में कुल 13 जनजातियों को 'विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह' (PVTG) का दर्जा दिया गया है. इनकी आबादी का आंकड़ा बेहद चिंताजनक है. मनकिडिया समुदाय के मात्र 203 लोग बचे हैं, जबकि बिरहोर के 596, हिल खरिया के 1,908, चुकटिया भुंजिया के 2,378, लोधा के 3,112, सौर के 5,553 और दिदाई समुदाय के 7,250 लोग शेष हैं. इसी तरह जुआंग 8,592, कुटिया खोंड 8,636, डोंगरिया खोंड 8,848, लंजिया सौर 11,820, बोंडा पोराजा 12,231 और पौड़ी भुयान समुदाय के 13,776 लोग बचे हैं.

हाल ही में आई भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि ओडिशा के इन समूहों के लगभग 54 प्रतिशत यानी करीब 1.6 लाख लोग प्रमुख सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से वंचित रह गए हैं.

बीते 31 मार्च को जारी रिपोर्ट के अनुसार, ओडिशा में PVTG की कुल आबादी लगभग 2.94 लाख है, जो 1,679 गांवों और बस्तियों में फैली हुई है. इनमें से केवल 1.34 लाख लोगों को ही ओडिशा पीवीटीजी इंपावरमेंट एंड लाइवलीहुड्स इंप्रूवमेंट प्रोग्राम (OPELIP) के तहत कवर किया गया. बाकी वे लोग जो 1,138 नए चिह्नित गांवों में रहते हैं, वे अभी तक किसी भी तरह की कल्याणकारी योजनाओं से बाहर हैं.

बता दें कि PVTG भारत के सबसे हाशिए पर रहने वाले समुदायों में शामिल हैं. भारत सरकार ने पांचवीं पंचवर्षीय योजना (1974-79) के दौरान 75 ऐसे समूहों की पहचान की थी, जिनमें से 13 ओडिशा में हैं.
रिपोर्ट के मुताबिक, OPELIP के तहत साल 2020 के जून महीने में तीन नई माइक्रो प्रोजेक्ट एजेंसियां बनाई गई थीं. इनका लक्ष्य राज्य के पीवीटीजी समुदायों तक पहुंच बनाना और उन्हें सशक्त करना था. लेकिन जनवरी 2025 तक ये एजेंसियां चालू ही नहीं हो पाईं. इन एजेंसियों को न तो पर्याप्त कर्मचारी मिले और न ही फंड. जुलाई 2024 से जनवरी 2025 के बीच किए गए इस ऑडिट में पाया गया कि मार्च 2024 तक राज्य के PVTG समुदाय के लगभग 1.6 लाख लोग वर्षों से विभिन्न सरकारी योजनाओं से पूरी तरह बाहर रहे.

बाल विवाह रोकथाम

इन समुदायों की घटती आबादी का एक बड़ा कारण बाल विवाह भी रहा है. इसे रोकने के लिए लाई गई योजनाओं में भी खामियां सामने आ रही हैं. रिपोर्ट में जिक्र है कि दिसंबर 2020 में शुरू किए गए 'लेट मैरिज इंसेंटिव प्रोग्राम' के तहत 18 वर्ष की आयु के बाद विवाह करने वाली लड़कियों को 2,000 से 20,000 रुपए तक की आर्थिक सहायता दी जाती है.

साल 2019 से 2024 के बीच 1,161 लाभार्थियों के लिए 153.26 लाख रुपए निर्धारित किए गए थे, लेकिन केवल 95.24 लाख रुपए ही खर्च हो पाए. इससे सिर्फ 677 लड़कियों (लगभग 58 प्रतिशत) तक ही सहायता पहुंच सकी. ऑडिट में पाया गया कि यह योजना केवल 43 प्रतिशत गांवों तक ही पहुंच पाई है.

अब बात करते हैं इन क्षेत्रों में पानी की स्थिति की. रिपोर्ट बताती है कि मरम्मत और रखरखाव के अभाव में सिंचाई और पेयजल परियोजनाएं बंद पड़ी हैं. उन्हें समय पर सुधारा नहीं जा सका, जिससे जल संकट बढ़ गया है. निरीक्षण में पाया गया कि 40 में से 23 (58 प्रतिशत) सिंचाई परियोजनाएं और 69 में से 38 (55 प्रतिशत) पेयजल परियोजनाएं काम नहीं कर रही थीं.

इन क्षेत्रों के लोग अब फिर से नदियों, झरनों और नहरों के पानी पर निर्भर होने को मजबूर हैं. केवल 18 प्रतिशत परिवारों के पास ही सुरक्षित पेयजल की सुविधा है. वहीं, मात्र 34 प्रतिशत परिवारों तक गैस कनेक्शन पहुंच पाया है. यही नहीं, महिलाओं और बच्चों को पोषण सहायता देने के लिए 3.59 करोड़ रुपए की लागत से बनाए गए 116 न्यूट्रिशन रिसोर्स सेंटर में से 55 पूरी तरह बंद पड़े हैं.

आखिर ये स्थिति क्यों है 

ओडिशा के पीवीटीजी समुदायों के बीच 'वसुंधरा' नाम की संस्था पिछले 20 सालों से काम कर रही है. संस्था के निदेशक गिरि राव कहते हैं, "कैग की रिपोर्ट मुझे चौंकाती नहीं है. मैंने देखा है कि OPELIP के तहत सभी संबंधित एजेंसियों को पांच साल में 20 बैठकें करनी थीं, ताकि योजनाओं के कार्यान्वयन की समीक्षा हो सके. लेकिन हकीकत यह है कि पांच साल में मात्र दो बैठकें हुईं. रिपोर्ट में साफ लिखा है कि ये बैठकें इसलिए नहीं हो पाईं क्योंकि जिले के कलेक्टर के पास समय नहीं था."

वे आगे कहते हैं, "राज्य में मात्र 3 लाख के करीब पीवीटीजी हैं, लेकिन सरकारें इन मुट्ठी भर लोगों का भी विकास नहीं कर पाई हैं. खरबों रुपए की योजनाओं के बावजूद आदिम जनजातियों की उन तक पहुंच न के बराबर है. बिरहोर जैसे समुदाय, जिन्हें 1986 में चिह्नित किया गया था, वे आज तक लाभों से वंचित हैं क्योंकि उनके लिए नामित एजेंसी ही शुरू नहीं हो सकी."

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