ओडिशा होगा सबसे पहले माओवाद मुक्त! 15 नक्सलवादी, 7 दिन की डेडलाइन

देशभर से माओवाद के खात्मे की डेडलाइन 31 मार्च तय की गई है. छत्तीसगढ़ और झारखंड के मुकाबले ओडिशा के लिए एक हफ्ते में यह लक्ष्य हासिल करना ज्यादा आसान लग रहा है

बस्तर रेंज में नक्सलवाद अंतिम दौर में (Photo: ITG/ Chandradeep Kumar)
माओवाद प्रभावित इलाके में सुरक्षाबल (फाइल फोटो)

देशभर में बंदूकधारी माओवादियों को समाप्त करने के लिए केंद्र सरकार ने 31 मार्च की डेडलाइन तय की है. माओवाद से अति प्रभावित राज्यों में से एक ओडिशा इसके नजदीक पहुंचता दिख रहा है. राज्य सरकार ने बताया है कि अब राज्य में बमुश्किल 15 माओवादी बचे हैं, जिन्हें मार्च के अंत तक समाप्त कर दिया जाएगा.

ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने बीते 23 मार्च को विधानसभा में बताया कि 15 मार्च 2026 तक 96 माओवादी और उनके मिलिशिया सदस्य आत्मसमर्पण कर चुके हैं. यह आत्मसमर्पण सुरक्षा बलों के लगातार दबाव और जारी नक्सल-विरोधी अभियानों का परिणाम है. 

माझी ने कहा, "31 मार्च 2026 की समयसीमा नजदीक आने के साथ ही राज्य सरकार को विश्वास है कि वह ओडिशा को पूरी तरह माओवादी प्रभाव से मुक्त करने के अपने लक्ष्य को हासिल कर लेगी. प्रभावित क्षेत्रों में स्थाई शांति सुनिश्चित करने के लिए पुलिस सघन अभियान और पुनर्वास की कोशिश कर रही है."

बीते 23 मार्च को बीजू जनता दल (BJD) विधायक ताराप्रसाद बहिनिपति ने पूछा कि राज्य में माओवादी प्रभावित जिलों की संख्या कितनी है? वर्तमान में कितने माओवादी ओडिशा में सक्रिय हैं? पिछले दो वर्षों में कितने माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है? उन्हें समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए राज्य सरकार ने क्या कदम उठाए हैं और कब तक ओडिशा को पूर्ण रूप से माओ-मुक्त राज्य बनाया जाएगा?

जवाब में सीएम मोहन चरण माझी ने बताया, "केंद्र सरकार की Security Related Expenditure (SRE) योजना के अनुसार, वर्तमान में राज्य का केवल कंधमाल जिला माओवादी प्रभावित जिला (LWE Affected District) के रूप में चिह्नित है. इसके अलावा 8 जिलों- बौध, बलांगीर, कालाहांडी, कोरापुट, मल्कानगिरी, नवरंगपुर, नुआपाड़ा और रायगढ़ा को माओवाद के असर वाले यानी Legacy & Thrust (L&T) जिलों के रूप में वर्गीकृत किया गया है."

मोहन माझी ने आगे बताया, "वास्तविक स्थिति यह है कि कंधमाल, कालाहांडी और रायगढ़ा जिलों के सीमावर्ती क्षेत्रों में लगभग 15 माओवादी सक्रिय हैं. इसके अलावा राज्य के अन्य किसी भी क्षेत्र में माओवादियों की उपस्थिति नहीं है. चूंकि ये जिले घने जंगलों वाले सीमावर्ती इलाके हैं, इस वजह से माओवादियों की थोड़ी बहुत मौजूदगी बची हुई है." इससे पहले 23 फरवरी को भी सीएम ने इस मुद्दे पर जवाब दिया था, जिसमें उन्होंने राज्य में लगभग 40 सक्रिय माओवादी होने की बात कही थी.

बता दें, आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों को समाज की मुख्यधारा में वापस लाने के लिए ओडिशा सरकार की 'आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति' के तहत कई सुविधाएं दी जा रही हैं. इनमें आर्थिक सहायता, आवास सुविधा, अधिकतम 36 महीने तक मासिक स्टाइपेंड, व्यावसायिक प्रशिक्षण, विवाह सहायता, स्वास्थ्य कार्ड और राशन कार्ड शामिल हैं.

अभियान पूरे जोर पर

आखिरी बचे 15 माओवादियों को पकड़ने, मार गिराने या आत्मसमर्पण कराने के लिए केंद्रीय बल और राज्य पुलिस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती. मिली जानकारी के मुताबिक, माओवादी गतिविधियों पर नियंत्रण के लिए प्रभावित क्षेत्रों में केंद्रीय सुरक्षा बलों की 71 कंपनियां तैनात हैं. इसके अलावा 44 स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप टीमें, लगभग 839 जिला वॉलंटियर फोर्स (DVF) जवान, इंडिया रिजर्व बटालियन की 49 प्लाटून, स्पेशल सिक्योरिटी बटालियन की 29 प्लाटून और ओडिशा स्पेशल स्ट्राइकिंग फोर्स की 92 से अधिक प्लाटून तैनात की गई हैं.

यही नहीं, माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में खुफिया जानकारी के आधार पर सघन अभियान और एरिया डोमिनेशन ऑपरेशन लगातार चलाए जा रहे हैं. इन ऑपरेशन्स में ड्रोन, इंटरसेप्टर, आधुनिक हथियार और संचार उपकरणों का उपयोग किया जा रहा है. राज्य पुलिस के मुताबिक, माओवादी समस्या के पूर्ण उन्मूलन के लिए उपखंड (Sub-Division) स्तर पर कार्ययोजना तैयार की गई है. इसमें ऑपरेशन और खुफिया तंत्र को मजबूत करना, माओवादियों की सप्लाई चेन को समाप्त करना और प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों को तेज करना शामिल है.

पड़ोसी राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों में समन्वित और सशक्त अभियान चलाए जा रहे हैं. साथ ही वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी नियमित रूप से समीक्षा बैठकें कर रहे हैं, ताकि माओवादी प्रभावित क्षेत्रों में विकास कार्यों और सुरक्षा अभियानों का प्रभावी क्रियान्वयन हो सके.

लेकिन असल सवाल है कि क्या आगामी एक हफ्ते यानी 31 मार्च तक यह लक्ष्य हासिल कर लिया जाएगा? ओडिशा के पुलिस महानिदेशक वाईबी खुरानिया कहते हैं, "आप जानते हैं कि 22 मार्च को कंधमाल जिले में माओवादियों के अवैध हथियारों का एक बड़ा जखीरा मिला है. हमारा अभियान जारी है और हमें पूरा विश्वास है कि 31 मार्च तक मिले लक्ष्य के अनुसार हम ओडिशा से नक्सल समस्या को खत्म कर देंगे. फिलहाल एक ही माओवादी प्रभावित क्षेत्र बचा है, जो कंधमाल, रायगढ़ा और कालाहांडी जिलों के ट्राई-जंक्शन पर स्थित है."

उन्होंने आगे कहा, "माओवादी उसी बचे हुए इलाके में हैं और हमारा सर्च ऑपरेशन लगातार जारी है. इसके अलावा पूरे राज्य में कड़ी निगरानी रखी जा रही है. छत्तीसगढ़ की कई सीमाएं हमारे विभिन्न जिलों से लगती हैं, इसी तरह सुंदरगढ़, क्योंझर और राउरकेला झारखंड से सटे हुए हैं. वहां भी हम सतर्क हैं क्योंकि इस समय सभी राज्यों में अभियान चल रहे हैं और घुसपैठ की संभावना बनी रहती है. हम पड़ोसी राज्यों के साथ समन्वय बनाते हुए कड़ी निगरानी रख रहे हैं."

डीजीपी वाईबी खुरानिया के मुताबिक, बाकी बचे 15 माओवादियों को पकड़ने या सरेंडर के लिए तैयार करने के लिए सुरक्षाबल बड़ा अभियान चला रहे हैं. अगला एक सप्ताह इस लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है.

छत्तीसगढ़ और झारखंड में मुश्किल

इधर छत्तीसगढ़ में 250 से 300, तो झारखंड में 50 के करीब माओवादी अब भी सक्रिय हैं. हालांकि, छत्तीसगढ़ में माओवादियों के सरेंडर का सिलसिला लगातार जारी है. 24 मार्च को माओवादियों के बड़े कमांडरों में से एक पापा राव ने अपने 21 साथियों के साथ सरेंडर किया है. नाम न छापने की शर्त पर खुफिया विभाग के एक अधिकारी ने बताया कि पापा राव ने करीब 15 दिन पहले एक विश्वसनीय मध्यस्थ के जरिए संपर्क किया था. इसके बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उनसे लगातार संवाद बनाए रखा और भरोसा दिलाया कि सरकार की पुनर्वास नीति के तहत उन्हें पूरी सुरक्षा और सहायता मिलेगी.

पापा राव छत्तीसगढ़-तेलंगाना सीमा क्षेत्र में सक्रिय रहे और CPI (माओवादी) की पश्चिम क्षेत्रीय समिति में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे थे. संगठन की रणनीतिक गतिविधियों और कैडर संचालन में उनकी प्रमुख भूमिका रही है. मीडिया से बातचीत में पापा राव ने कहा कि लगातार बढ़ते दबाव, जंगलों में कठिन जीवन और सरकार की पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उन्होंने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया है. उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अब वे सामान्य जीवन जीना चाहते हैं और समाज के विकास में योगदान देना चाहते हैं.

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