पिछड़ा वर्ग आयोग बना लेकिन पंचायत चुनाव अब भी अधर में!
योगी सरकार ने OBC आरक्षण के लिए आयोग तो बना दिया लेकिन छह महीने की प्रक्रिया और कानूनी चुनौतियों के बीच विधानसभा चुनाव से पहले पंचायत चुनाव पर सवाल कायम हैं

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनावों से पहले गठित किया गया ‘उत्तर प्रदेश राज्य स्थानीय ग्रामीण निकाय समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग’ सिर्फ एक प्रशासनिक या कानूनी प्रक्रिया नहीं है बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीतिक बिसात पर रखा गया बेहद अहम मोहरा भी माना जा रहा है.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता वाली कैबिनेट ने 18 मई को जिस समय इस आयोग को मंजूरी दी है, वह समय राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जा रहा है. पंचायतों का मौजूदा कार्यकाल 26 मई को समाप्त हो रहा है और अदालतें लगातार सरकार से पूछ रही थीं कि आखिर OBC आरक्षण को लेकर ‘ट्रिपल टेस्ट’ कब पूरा होगा.
ऐसे में आयोग का गठन कानूनी मजबूरी भी है और राजनीतिक रणनीति भी.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पंचायत चुनाव हमेशा से विधानसभा चुनावों का सेमीफाइनल माने जाते रहे हैं. भले ही ये चुनाव राजनीतिक दलों के चुनाव चिह्न पर नहीं लड़े जाते लेकिन गांवों में प्रधान, बीडीसी सदस्य, जिला पंचायत सदस्य और ब्लॉक प्रमुख जैसे पदों पर जीतने वाले लोग आगे चलकर विधानसभा चुनावों में बूथ प्रबंधन, जातीय लामबंदी और वोट ट्रांसफर की सबसे मजबूत कड़ी बनते हैं. यही वजह है कि BJP, समाजवादी पार्टी (सपा), कांग्रेस और BSP सभी पंचायत चुनावों को अपनी जमीनी ताकत के परीक्षण के तौर पर देखते हैं.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि BJP के लिए यह आयोग इसलिए भी अहम है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को उत्तर प्रदेश में OBC वोटों के एक हिस्से में गिरावट का सामना करना पड़ा था. खासकर गैर-यादव पिछड़ी जातियों में BJP की पकड़ पहले जैसी मजबूत नहीं दिखी. ऐसे में पंचायत चुनावों से पहले OBC आरक्षण को कानूनी सुरक्षा देना BJP को यह संदेश देने का मौका देगा कि वह पिछड़ों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर गंभीर है. लखनऊ में राजनीति शास्त्र विभाग के शिक्षक आशुतोष गौतम कहते हैं, “यूपी में पंचायत चुनाव सिर्फ स्थानीय चुनाव नहीं होते. गांव का प्रधान भविष्य का विधानसभा प्रभारी बनता है. BJP यह अच्छी तरह समझती है कि अगर पंचायतों में OBC नेतृत्व मज़बूत होता है तो 2027 में उसका सीधा लाभ विधानसभा चुनाव में मिलेगा. इसलिए यह आयोग सिर्फ अदालत के आदेश का पालन नहीं, बल्कि राजनीतिक सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा है.”
दरअसल सुप्रीम कोर्ट और इलाहाबाद हाई कोर्ट पहले ही साफ कर चुके हैं कि राज्य सरकारें बिना वैज्ञानिक आधार के स्थानीय निकायों में OBC आरक्षण लागू नहीं कर सकतीं. अदालतों ने इसके लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ अनिवार्य किया है. इसमें पहला कदम समर्पित आयोग का गठन, दूसरा अनुभवजन्य यानी वास्तविक अध्ययन और तीसरा संवैधानिक सीमा के भीतर आरक्षण तय करना शामिल है.
महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अदालतें पहले कई बार OBC आरक्षण को रद्द कर चुकी हैं. उत्तर प्रदेश सरकार नहीं चाहती कि पंचायत चुनाव या विधानसभा चुनाव के ऐन पहले ऐसा कोई संवैधानिक संकट खड़ा हो. यही वजह है कि सरकार ने पांच सदस्यीय आयोग बनाने का फैसला किया है जिसमें हाई कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश को अध्यक्ष बनाया जाएगा. आयोग पूरे प्रदेश में पिछड़े वर्गों की सामाजिक, राजनीतिक और प्रतिनिधित्व संबंधी स्थिति का अध्ययन करेगा और उसके आधार पर पंचायतों में OBC आरक्षण का नया फार्मूला तय होगा.
वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने कैबिनेट के फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि आयोग का उद्देश्य पंचायतों में पिछड़े वर्गों की वास्तविक स्थिति का समकालीन और अनुभवजन्य अध्ययन करना है ताकि आरक्षण की व्यवस्था संवैधानिक कसौटी पर टिक सके. सरकार इसे वैज्ञानिक आधार देने की बात कर रही है.
हालांकि विपक्ष इस कदम को राजनीतिक चाल के रूप में देख रहा है. समाजवादी पार्टी के नेताओं का आरोप है कि BJP पिछड़ा वर्ग की राजनीति में अपनी कमजोर होती पकड़ को संभालने के लिए यह कदम उठा रही है. सपा प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी का कहना है कि BJP को पिछड़ों की चिंता चुनाव आते ही याद आती है. उनके मुताबिक अगर सरकार वास्तव में पिछड़ों को प्रतिनिधित्व देना चाहती तो जातीय जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक करती और उसी आधार पर व्यापक आरक्षण नीति बनाती.
बहुजन समाज पार्टी (BSP) भी इस मुद्दे पर BJP को घेरने की कोशिश कर रही है. BSP नेताओं का कहना है कि पंचायतों में OBC आरक्षण का सवाल सिर्फ चुनावी प्रतिनिधित्व का नहीं बल्कि सामाजिक न्याय का मुद्दा है. पार्टी का दावा है कि BJP ने पिछड़ों को सिर्फ राजनीतिक उपयोग की वस्तु बना दिया है.
हालांकि BJP के रणनीतिकार इसे अलग तरह से देखते हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि पंचायत चुनावों में मजबूत उपस्थिति 2027 की तैयारी का आधार बनेगी. उनके मुताबिक BJP अब सिर्फ हिंदुत्व या मोदी-योगी फैक्टर पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि जातीय और सामाजिक समीकरणों को स्थानीय स्तर पर फिर से मजबूत करना चाहती है. खासकर कुर्मी, मौर्य, निषाद, शाक्य, लोध, कुशवाहा और अन्य गैर-यादव पिछड़ी जातियों को पंचायत प्रतिनिधित्व के जरिए दोबारा अपने साथ जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि पंचायतों में आरक्षण का गणित सीधे तौर पर सत्ता के सामाजिक आधार को प्रभावित करता है. उत्तर प्रदेश में 58 हजार से अधिक ग्राम पंचायतें, 800 से ज्यादा क्षेत्र पंचायतें और 75 जिला पंचायतें हैं. इनसे जुड़े कुल पदों की संख्या आठ लाख से अधिक है. यानी यह सिर्फ चुनाव नहीं बल्कि पूरे ग्रामीण सत्ता ढांचे का पुनर्गठन है. जो दल पंचायतों में मजबूत होता है, वह विधानसभा चुनाव में भी बढ़त बना लेता है.
2021 के पंचायत चुनावों में कई जगह BJP समर्थित उम्मीदवारों को उम्मीद के मुताबिक सफलता नहीं मिली थी. कई जिला पंचायत अध्यक्ष चुनावों में पार्टी को कड़ी मेहनत करनी पड़ी थी. वहीं समाजवादी पार्टी ने पश्चिमी और मध्य यूपी के कई जिलों में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी. इसी अनुभव ने BJP को यह एहसास कराया कि गांवों में संगठनात्मक पकड़ को फिर से मजबूत करना जरूरी है. इस पूरे घटनाक्रम का एक और पहलू है. BJP यह संदेश भी देना चाहती है कि वह अदालतों के निर्देशों का पालन करने वाली सरकार है.
पिछली बार स्थानीय निकाय चुनावों में OBC आरक्षण को लेकर अदालतों में लंबी लड़ाई चली थी. सरकार नहीं चाहती कि पंचायत चुनाव फिर कानूनी विवादों में फंस जाएं और विपक्ष को हमला करने का मौका मिले. लेकिन कुछ राजनीतिक विश्लेषक ओबीसी आयोग के गठन को केवल अदालतों का ध्यान भटकाने की कार्रवाई बता रहे हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व शोध छात्र रमेश श्रीवास्तव बताते हैं, “अब जबकि विधानसभा चुनाव को आठ महीने से कम समय रह गया है ऐसे में ओबीसी आयोग की सिफारिशें और उनके आधार पर पंचायत चुनाव अगले वर्ष होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव से पहले हो पाएंगे इसमें संशय है. सरकार ने केवल अदालतों का ध्यान भटकाने के लिए ओबीसी आयोग का गठन किया है. लेकिन असल में पंचायत चुनाव के अगले साल विधानसभा चुनाव के बाद कराने की पृष्ठभूमि ही तैयार की जा रही है.”
इन सवालों के बीच असली चुनौती छह महीने के भीतर पूरे प्रदेश में अनुभवजन्य अध्ययन पूरा करने और ऐसा आरक्षण फार्मूला तैयार करने की होगी जो अदालत में टिक सके. अगर प्रक्रिया में देरी होती है तो पंचायत चुनाव टल सकते हैं और इसका राजनीतिक नुकसान योगी सरकार को उठाना भी पड़ सकता है.