राजस्थान में अब अपराधियों को जुलूस नहीं निकलेगा; पुलिस के ‘फोटो-ऑप-कल्चर’ पर कैसे लगी रोक?

राजस्थान में बीते दिनों ऐसी कई घटनाएं सामने आईं जब पुलिस ने अपराधियों को पकड़कर उनका जुलूस निकाला

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सांकेतिक तस्वीर

साल का पहला दिन बीकानेर के कोटगेट इलाके के लोगों के लिए बड़ा ही दिलचस्प नजारा लेकर आया. दरअसल ये लोग 1 जनवरी को कोटगेट थाना क्षेत्र की सड़कों पर पुलिस के साथ पांच युवकों को महिलाओं के कपड़े पहने हुए चलते देख रहे थे. पुलिस बार-बार उनकी तरफ मुड़कर पूछ रही थी कि अपराध करोगे तो क्या होगाॽ अपराधी इसके जवाब में कह रहे थे- यही हाल होगा. 

इन पांचों युवकों को मारपीट जैसी घटनाओं के आरोप में पकड़ा गया था. पुलिस ने आरोपियों को महिलाओं के कपड़े पहनाकर सार्वजनिक जुलूस निकाला. इसके पीछे वजह बताई गई कि अब ये इतना बदनाम हो चुके हैं कि भविष्य में अपराध से तौबा कर लेंगे.   

इससे पहले 26 दिसंबर को जयपुर जिले के चौमू कस्बे में मस्जिद तोड़ने की अफवाह के बाद पत्थरबाजी की घटना हो गई.  पुलिस ने पत्थरबाजी के आरोप में कई लोगों को पकड़कर उनकी रैली निकाली. इसी दौरान कुछ युवकों को पीटते हुए सड़क पर दौड़ाया गया. ये युवक बार-बार कहते रहे कि उन्होंने पत्थर नहीं चलाए, मगर पुलिस ने उनकी एक नहीं सुनी. 

20 जनवरी 2026 को भीलवाड़ा में एक गुटका व्यापारी से चार लाख रुपए की लूट के आरोप में पकड़े गए पांच युवकों का भी पुलिस ने जुलूस निकाला. ये सभी लंगड़ाकर चल रहे थे. इससे ऐसा लगा कि इनके साथ काफी मारपीट हुई है.  

भीलवाड़ा, चौमू और बीकानेर की ये घटनाएं तो बानगीभर हैं. राजस्थान में किसी भी अपराध में पकड़े गए लोगों की सार्वजनिक पैरेड या जुलूस निकालना पुलिस की परिपाटी बन चुका था मगर अब पुलिस के लिए यह सब करना आसान नहीं होगा. 

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने अपराध साबित होने से पहले आरोपियों की फोटो, वीडियो सार्वजनिक करने और उनका सड़क पर जुलूस निकालने पर रोक लगा दी है. जैसलमेर जिले के 10 लोगों की ओर से दायर की गई याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश फरजंद अली ने अपने आदेश में कहा, ''संविधान का अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति को गरिमा और आत्मसम्मान के साथ जीने का अधिकार देता है. किसी भी आपराधिक मामले में गिरफ्तारी के बाद भी आरोपियों को गरिमा के साथ जीने का अधिकार समाप्त नहीं होता क्योंकि उन्हें अदालत ने उस अपराध के लिए सजा नहीं दी है. इसलिए पुलिस किसी भी आरोपी को हथकड़ी पहनाकर सार्वजनिक तौर पर नहीं घुमा सकेगी और न ही उसके फोटो और वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर अपलोड किए जाएंगे.''  

हाईकोर्ट ने इस मामले में पुलिस और राजस्थान सरकार से भी जवाब तलब किया है. हाईकोर्ट का आदेश आने के एक दिन बाद ही राजस्थान पुलिस के एडीजी क्राइम ने एक सर्कुलर जारी किया. इसके अनुसार प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति के साथ पुलिस मानवीय, सभ्य और कानून सम्मत व्यवहार करेगी. गिरफ्तार अभियुक्त को प्रदेश के किसी भी हिस्से में सार्वजनिक तौर पर अपमानित, प्रदर्शित और अपराधी की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाएगा. इस सर्कुलर के अनुसार गिरफ्तारी के समय और गिरफ्तारी के बाद किसी भी अभियुक्त का फोटो व वीडियो सोशल मीडिया, पुलिस की आधिकारिक वेबसाइट या प्लेटफार्म और मीडिया को नहीं भेजा जाएगा. 

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता देवकीनंदन व्यास ने कोर्ट में तथ्य पेश कर यह हवाला दिया कि राजस्थान में किसी भी अपराध में पकड़े गए लोगों की इस तरह परेड निकालना आम परिपाटी बन चुका है. पुलिस वाह-वाही बटोरने के लिए मामूली धाराओं में पकड़े गए लोगों की भी परेड निकालती है. इससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होती है. व्यास ने अदालत में दलील दी कि पुलिस ने महिलाओं और अविवाहित युवतियों की फोटो और वीडियो भी बिना किसी कानूनी अधिकार के सार्वजनिक किए हैं. इससे उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा को ठेस पहुंची है. न ही दंड प्रक्रिया संहिता और न ही पुलिस अधिनियम आरोपियों के फोटो खींचकर उन्हें सार्वजनिक तौर पर प्रचारित करने का अधिकार देते हैं. पुलिस का यह कार्य अवैध और मनमानी के दायरे में आता है.  

दरअसल पिछले दिनों जोधपुर के उदयमंदिर पुलिस थाने में मोहन सिंह नाम के एक अधिवक्ता की गिरफ्तारी के बाद फर्श पर बिठाकर फोटो और वीडियो वायरल किए गए थे. अधिवक्ता को इस तरह सार्वजनिक रूप से बदनाम किए जाने का मामला सुर्खियों में आ गया था. इसके बाद पूरे प्रदेश में इसे लेकर बहस छिड़ गई. कोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए पुलिस को यह आदेश दिए हैं कि मोहन सिंह की सभी फोटो तुरंत सभी प्लेटफार्म से हटाकर अदालत में रिपोर्ट पेश की जाए. 

आरोपियों के सार्वजनिक तौर पर जुलूस निकालने और उनके फोटो व वीडियो वायरल करने में पुलिस पर भेदभाव के भी आरोप लग रहे थे. पिछले कुछ अरसे में एक जैसे अपराध के मामलों में पकड़े गए हाई प्रोफाइल और राजनीतिक संरक्षण प्राप्त आरोपियों के मामले में पुलिस नरमी बरत रही थी जबकि सामान्य आरोपियों के खिलाफ सख्त रवैया अपनाया जा रहा था. पुलिस ने एक भी हाई प्रोफाइल आरोपी का सार्वजनिक तौर पर जुलूस नहीं निकाला जबकि सामान्य आरोपियों की आए दिन सड़कों पर पैरेड कराई जा रही थी.   

राजस्थान हाईकोर्ट के अधिवक्ता अभिमन्यु सिंह यदुवंशी कहते हैं, ‘‘नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के ताजा आंकड़ों के अनुसार राजस्थान में दोषसिद्धि दर 60 फीसदी है. ऐसे में हर साल विभिन्न अपराधों में पकड़े गए करीब 40 फीसद लोग दोष मुक्त करार दे दिए जाते हैं. पुलिस अगर इन लोगों की सार्वजनिक परेड निकालती है या इनका वीडियो व फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड करती है तो अपराध मुक्त होने के बाद भी बदनामी उनका पीछा नहीं छोड़ती.’’

जाहिर है कि कोर्ट के इस फैसले ने सिर्फ एक पुलिस के लिए परिपाटी बन चुकी एक परंपरा पर ही रोक नहीं लगाई है, बल्कि व्यवस्था की सोच पर भी बड़ा सवाल खड़ा किया है कि क्या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर किसी व्यक्ति की सामाजिक सज़ा पहले ही तय कर दी जानी चाहिए?

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