न फाइलें, न भीड़भाड़ : ई-गवर्नेंस ने कैसे बदला मधुबनी जिले में सरकारी सिस्टम
मधुबनी जिले के 388 सरकारी ऑफिसों में अब फाइलें टेबिलों पर अटकती नहीं और न ही चढ़ावा ढूंढती हैं और यह सब बदलाव किया है ई-गवर्नेंस के सिस्टम ने

मधुबनी जिले का एक छोटा-सा ब्लॉक ऑफिस है, पंडौल. यह संवाददाता जब वहां पहुंचा तो एक बारगी ऐसा लगा कि कहीं छुट्टी का दिन तो नहीं. क्योंकि अमूमन किसी ब्लॉक कार्यालय में काम-काजी दिनों में इतना सन्नाटा नहीं रहता. वहां तो अलग-अलग गांवों से लोग आ-आकर सरकारी बाबुओं पर लदे रहते हैं. किसी को इंदिरा आवास बनवाना होता है तो कोई मनरेगा जॉब कार्ड के फेर में रहता है. कैंपस में दलालों की बैठकें अलग सजी रहती हैं, जो तयशुदा सुविधा शुल्क लेकर हर काम कराने की गारंटी देते हैं.
मगर यहां न काम करवाने वालों की भीड़ थी, न दलाल ही नजर आ रहे थे. बस इक्का-दुक्का लोग ही कैंपस में टहल रहे थे. उनसे पूछा तो पता चला कि वे इस दफ्तर के ड्राइवर और चतुर्थ वर्गीय कर्मचारी हैं. “अब कोई काहे आएगा, सब औनलाइन (ऑनलाइन) हो गया है न.” अपनी शंका जाहिर करने पर उनमें से एक ने कहा. “जाइये न, भीतरे सब अफसर और स्टाफ बैठा है, बताएगा कहानी.”
यह बात सच निकली, अंदर हर कमरे में सरकारी कर्मचारी बैठे थे. कंप्यूटर और लैपटॉप के सामने और 'बीडियो' साहब (ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिसर) के केबिन में प्रभारी BDO प्रशिक्षु आईएएस वीरूपाक्ष विक्रम सिंह के साथ दो-तीन और अधिकारी बैठे थे और एक टैब पर ऑनलाइन मीटिंग चल रही थी. बाद में बताया गया कि हर शुक्रवार को मधुबनी जिला समाहरणालय (कलेक्टरेट) में डीएम साहब का जनता दरबार चलता है, जिसमें लोगों की शिकायतें सुनकर उसका निराकरण किया जाता है. वे लोग उसी बैठक में ऑनलाइन भागीदारी कर रहे थे.
वीरूपाक्ष बताते हैं, “पहले तो यह होता था कि यहां काम करवाने वालों की भीड़ जुटी रहती थी औऱ शुक्रवार के दिन हमारी आधी टीम मधुबनी में जनता दरबार में हाजिरी लगा रही होती थी. अब न हमें कहीं जाने की जरूरत है और न लोगों को यहां आकर चक्कर लगवाने की. लोगों को कोई भी काम हो वे पंचायत के ऑफिस में आवेदन कर देते हैं, फिर वे ऑनलाइन वहां से ट्रैक करते रहते हैं कि उनका काम हुआ या नहीं. नहीं हुआ तो कहां अटका है. यह सब दरअसल हमारे डीएम साहब की वजह से हुआ है, उन्होंने पूरे मधुबनी जिले के हर दफ्तर को ई-ऑफिस से जोड़ दिया है. अब आवेदन, आवेदन की ट्रैकिंग, काम की निगरानी, मीटिंग सब ऑनलाइन हो गया है. अब किसी को कहीं जाने की जरूरत नहीं है, न लोगों को और न ही अधिकारियों को.”
वीरूपाक्ष जो कह रहे हैं, उसका पैमाना मधुबनी जिला समाहरणालय में अपने कमरे में बैठे आईटी अधिकारी आशीष कुमार से बात करने पर पता चलता है. वे बताते हैं, “ब्लॉक से लेकर जिला समाहरणालय तक मधुबनी जिले के कुल 388 सरकारी दफ्तरों को हमने पेपरलेस कर दिया है. हमने इसके लिए 1240 यूजर क्रिएट किए हैं और इतने अधिकारी अब सरकार के ई-ऑफिस साफ्टवेयर पर काम कर रहे हैं. इन दफ्तरों की लगभग सभी फाइलें स्कैन करके ऑनलाइन कर ली गई है.”
सभी यानी लगभग 40 हजार सरकारी फाइलें. ऐसे में अब इन दफ्तरों में बाबुओं के टेबलों पर दर्जनों सरकारी फाइलों का बोझ नजर नहीं आता. फाइलें अब एक टेबल से दूसरी टेबल ले जाते चपरासी नहीं दिखते. न ही इस दफ्तर का डाक विभाग चिट्ठियों को यहां से वहां तक भेजता है. अब सारी फाइलें ऑनलाइन मूव कर रही हैं और उनके पोर्टल पर एक-एक बात का हिसाब है कि फाइल किस तारीख को कितने बजे जेनरेट हुई, अभी कहां है और क्यों रुकी है?
आशीष कहते हैं, “अब हमारे यहां फाइलों के अटकने, उससे पेपर गायब हो जाने और किसी भी आपदा में इनके नष्ट हो जाने की कहानी खत्म हो गई है. किसी ब्लॉक में कोई छोटा अधिकारी अगर किसी फाइल को समय से ज्यादा बेवजह रोक ले तो इसकी खबर डीएम साहब को हो जाती है. इसलिए सारा काम समय से हो रहा है, कहीं कोई गड़बड़ी नहीं तो पब्लिक क्यों भीड़ लगाएगी.”
आशीष के दावों की तस्दीक ऐसे कई लोग करते हैं, जिन्हें इसका लाभ मिला. गजानंद राज अपनी मां की जगह पर अनुकंपा की नौकरी के लिए 2020 से प्रयासरत थे. फाइलें अपनी गति से घूम रही थीं, जैसे सिस्टम ऑनलाइन हुआ 15 दिनों में ही उन्हें नौकरी मिल गई. उनके साथ 230 लोगों को इस योजना के तहत नौकरी मिली है. बलदेव साह, दो साल से बुजुर्गों की पेंशन के लिए कोशिश कर रहे थे, मगर नए सिस्टम में उनका काम चार दिन में हो गया. रामकुमार सिंह दो-तीन साल से राशनकार्ड बनवाने में जुटे थे. ई-ऑफिस में उनका राशन कार्ड 15 दिन में बन गया. इसी तरह पंचायत कार्यपालक सहायक शंकर कुमार सिंह के वेतन वृद्धि का काम पांच से सात दिन में हो गया. वे इसके लिए लंबे समय से कोशिश कर रहे थे.
आशीष हमें बताते हैं कि पूरे बिहार में सिर्फ सहरसा, दरभंगा और मधुबनी जिले में ई-ऑफिस का ठीक से इस्तेमाल हो रहा है. वे हमें मधुबनी समाहरणालय के एक-एक कमरे में ले जाकर दिखाते हैं. जहां टेबलें खाली हैं और जरूरी कागजात लाल कपड़े में बंधे छज्जों पर रखे हैं. स्टाफ कंप्यूटर और लैपटॉप पर काम-काज निपटा रहे हैं. स्थापना शाखा जिसका काम जिले भर के सरकारी कर्मचारियों की नौकरी, सेवाशर्त और छुट्टियों तक का हिसाब-किताब रखना होता है, वहां के एक अधिकारी कुमुद रंजन कहते हैं, “पहले तो हम स्टाफ के फोन से परेशान रहते थे. वे लोग बार-बार पूछते रहते थे, हमारी छुट्टी स्वीकृत हुई या नहीं. दरअसल पहले सीएल भी लेना होता था तो लोग एक हफ्ते पहले आवेदन देते थे. आवेदन चिट्ठी से आता था और फिर अलग-अलग अधिकारियों के पास जाता था. इसमें काफी टाइम लगता था. अब तो आप ऑनलाइन एप्लाई कीजिये, 45 मिनट से एक घंटे में छुट्टियों का फैसला हो जाता है. हम भी आराम से हैं.”
डाक शाखा में और भी आराम का माहौल दिखता है. वहां के एक स्टाफ बताते हैं, “अब हमारे यहां सिर्फ चिट्ठियां आती हैं, जाती नहीं हैं. जो चिट्ठियां आती हैं, उन्हें हम स्कैन करके अपलोड कर देते हैं. फिर वे ई-ऑफिस के सिस्टम में आ जाती हैं.”
आशीष बताते हैं कि यह मुहिम नए जिलाधिकारी आनंद शर्मा के आने के बाद शुरू हुई है. उन्होंने ज्वाइनिंग के साथ ही मधुबनी जिले को पेपरलेस बनाने का लक्ष्य रखा था. उसमें वे काफी सफल भी हुए. उन्होंने इसके लिए यहां की आईटी टीम को मजबूत किया. 22 मास्टर ट्रेनर रखे और जिला से लेकर प्रखंड तक के 388 सरकारी दफ्तरों में लगातार ट्रेनिंग करवाई.
ई-ऑफिस के अलावा मधुबनी जिले में कई लोकल सॉफ्टवेयर भी डेवलप करवाए गए हैं. इनमें से एक है मधुबनी फर्स्ट, जिसमें पूरे जिले के 45 विभाग कनेक्ट रहते हैं और डीएम कभी भी इन्हें खोलकर देख सकते हैं कि कहां क्या काम चल रहा है. इस पोर्टल का मकसद निगरानी है. इसके अलावा उन्होंने अपने जनता दरबार के लिए भी ऑनलाइन पोर्टल तैयार करवाया है. लोग ऑनलाइन आवेदन करते हैं औऱ फिर जब उन्हें बुलाया जाता है तो वे आते हैं. उनसे आगंतुकों के मिलने की व्यवस्था भी ऑनलाइन है, इसके लिए डीएम विजिटर एप बना है. लोग ऑनलाइन आवेदन देते हैं और उन्हें मुलाकात का समय मिलता है. उन्होंने अपने कोर्ट के लिए भी एक मॉड्यूल विकसित कराया है.
दरअसल टेक बैकग्राउंड से आने वाले आनंद शर्मा अपने कैरियर की शुरुआत से दफ्तर के काम-काज को ऑनलाइन करने और दफ्तरों को पेपरलेस बनाने के हिमायती रहे हैं. वे बताते हैं कि इसकी शुरुआत तब हुई जब वे बिहार सरकार के को-ऑपरेटिव विभाग में ज्वाइंट डायरेक्टर थे. तब उन्होंने पूरे विभाग को पेपरलेस कराया था. इसी तरह उन्होंने पंचायती राज विभाग में रहते हुए उसके सिस्टम को ऑनलाइन कराया. 2022 में जब उन्हें सहरसा जिले का डीएम बनाया गया तो उन्होंने पूरे जिला प्रशासन को पेपरलेस कराया और उस वक्त वह देश का पहला पेपरलेस डीएम ऑफिस बना. वहां भी वे पूरे जिले को पेपरलेस बनाना चाहते थे, मगर इसके पहले उनका तबादला हो गया. अपने उस काम को उन्होंने मधुबनी आकर अंजाम दिया.
इंडिया टुडे से बातचीत में आनंद शर्मा कहते हैं, “मेरा स्पष्ट मानना रहा है कि अगर हम गुड गवर्नेंस देना चाहते हैं तो इसके लिए ई-गर्वनेंस सबसे अच्छा टूल है. वह सिस्टम को जिम्मेदार बनाता है, कोई फाइल किसके पास कितनी देर रही यह पता चलता है. मेरा अपना अनुभव है कि हमारे यहां फाइलों के मूव करने की गति लगभग तीन गुना बेहतर हो गई है. इससे नीतियों को लागू करना भी तेज हो गया है.”
यह पूछने पर कि आपने कई लोकल सॉफ्टवेयर डेवलप कराए हैं. आपके तबादले के बाद भी उसमें काम होता रहेगा, यह आप कैसे सुनिश्चित करेंगे? वे बताते हैं, “मैंने टीम के हाथ में सबकुछ छोड़ दिया है. उन्हें ऑनलाइन की आदत हो गई है. अब लगता नहीं है कि वे फिर से पेपर पर लौटेंगे. इसका उदाहरण है कि सहरसा में हमने तीन साल पहले जो काम शुरू वह आज भी जारी है.”
मधुबनी जिले के इस अभियान का एक बड़ा लाभ खर्चे में कमी को लेकर भी हुआ है. आशीष कहते हैं, “हमारे समाहरणालय में हर साल पेपर और कार्टिज पर 25 लाख खर्च होता था और सभी 388 दफ्तरों को जोड़ दें तो यह खर्च 7.5 करोड़ तक चला जाता था. इसकी तो सीधे बचत हुई है. पर्यावरण का फायदा अलग है.”
इस तरह खुद को पेपरलेस करके मधुबनी जिले ने अपनी कार्यक्षमता को बेहतर बनाया है, लोगों को समय से समाधान उपलब्ध कराया है और पेपर का खर्च कम करके पैसे और पर्यावरण दोनों की मदद की है. अब देखना है, यहां के इस प्रयोग को बिहार सरकार पूरे राज्य में कब तक लागू करती है.