नीतीश कुमार की बिहार से विदाई झारखंड में कांग्रेस के लिए कैसे बनी राहत?
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के साथ राज्य सरकार में साझेदार कांग्रेस को अब लग रहा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए उसकी अहमियत बढ़ जाएगी

मार्च की 5 तारीख देश और बिहार की राजनीति में हाल-फिलहाल का सबसे दिलचस्प घटनाक्रम लेकर आई, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन जमा किया. इससे पड़ोसी राज्य झारखंड में भी दबे-छुपे कई समीकरण बदल गए.
नीतीश कुमार प्रकरण ने प्रत्यक्ष तौर पर तो नहीं, लेकिन परोक्ष रूप से ही सही, झारखंड में सियासी तपिश से परेशान कांग्रेस के चेहरे पर हल्की फुहार ला दी है. अब उसे राज्य में सत्ता से बाहर होने का डर कम हो गया है.
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की बीच-बीच में BJP के साथ गठबंधन की चर्चाओं के कारण कांग्रेस के माथे पर खिंचने वाली चिंता की लकीरों की लंबाई और संख्या, दोनों अब कम होने लगी हैं. आखिर ऐसा नीतीश कुमार की वजह से क्यों होने लगा?
दरअसल, दूसरी बार सरकार बनाने के बाद BJP इस प्रयास में रही कि हेमंत सोरेन कांग्रेस से गठबंधन तोड़कर प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर उसके राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA का हिस्सा बनें. इसके लिए कवायदें शुरू हुईं और अनौपचारिक बातचीत का सिलसिला भी चला. एक फार्मूला तय किया गया कि कांग्रेस के जो विधायक पार्टी छोड़ सकते हैं, उन्हें 'बिरसा कांग्रेस' बनाने दी जाए और बाद में उसे JMM में शामिल कर लिया जाए या उनका समर्थन लिया जाए. सूत्रों का दावा है कि JMM काफी हद तक इसके समर्थन में थी, हालांकि इससे कुछ ठोस परिणाम नहीं निकला.
फिर बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान जब JMM को एक भी सीट नहीं दी गई, तो इसके लिए RJD और कांग्रेस दोनों को समान रूप से जिम्मेदार बताया गया. तब JMM ने खुलकर कहा कि गठबंधन की समीक्षा हर हाल में होगी. लेकिन गठबंधन से बाहर निकलने के लिए यह प्रकरण भी कोई मजबूत आधार नहीं बन सका.
इन सबके बीच JMM की यह कोशिश रही कि वह अपने सभी घटक दलों को समय-समय पर यह एहसास दिलाती रहे कि मामला बराबरी का नहीं है. सहयोगियों को 'छोटे भाई' होने का एहसास अधिक कराया गया. अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, बीते 5 मार्च को ही JMM ने राज्य की राज्यसभा की दोनों खाली सीटों पर अपना दावा ठोक दिया, जबकि संख्या बल के लिहाज से दोनों दल एक-दूसरे के सहयोग के बिना दूसरी सीट नहीं जीत सकते.
वहीं, पिछले साल 6 मई को कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भरे मंच से अपने कार्यकर्ताओं से कहना पड़ा था, "मैंने हेमंत जी से साफ कहा है कि हमारे कार्यकर्ताओं को भी महसूस होना चाहिए कि उनकी सरकार है." पिछली सरकार में कांग्रेस के विधायकों और कार्यकर्ताओं की यह बड़ी शिकायत थी कि प्रखंड स्तर के अधिकारी तक उनकी बात नहीं सुनते.
बात यहीं नहीं रुकी. खड़गे के इस बयान के ठीक एक महीने बाद 7 जून को JMM प्रवक्ता मनोज पांडेय ने रांची के हरमू इलाके में सड़क किनारे एक बैनर लगवाया, जिस पर लिखा था: 'गुरुजी हैं तो गुरूर है, हेमंत है तो हिम्मत है, बसंत है तो बहार है, इसलिए ही तो JMM की सरकार है.' इस पर कांग्रेस की प्रतिक्रिया थी कि यह केवल JMM की नहीं, बल्कि गठबंधन की सरकार है.
आलम यह रहा कि इन सब बातों से कांग्रेस परेशान और समझौते की मुद्रा में रहती आई थी. उसे सत्ता गंवाने का डर हमेशा बना रहा, मगर अब स्थितियां बदली हैं. इसे प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राजेश ठाकुर के बयान से समझा जा सकता है. वे कहते हैं, "नीतीश कुमार के साथ घटी घटना ने साबित कर दिया कि जो ट्रक के पीछे लिखा रहता है 'लटकले त गेले बेटा', BJP ने वही सच कर दिखाया है. जो उनके पीछे लटकेगा, वह बर्बाद हो जाएगा. यह क्षेत्रीय पार्टियों के लिए स्पष्ट संदेश है. BJP ने कैसे नीतीश कुमार के लोगों को धोखेबाज बनाने का काम किया, वैसे ही महाराष्ट्र में शिंदे और झारखंड में चंपाई सोरेन को भी धोखेबाज बनाया गया."
अब मिलेगी अधिक इज्जत!
कांग्रेस को अब भरोसा है कि हेमंत सोरेन खुद का हश्र नीतीश कुमार जैसा नहीं होने देंगे. ऐसे में अब उनके पास भी विकल्प सीमित हैं. वे बड़े भाई की भूमिका में जरूर रहेंगे, लेकिन अब वह छोटे भाई को उस तरह नियंत्रित नहीं कर पाएंगे जैसा अब तक कर रहे थे. कांग्रेस नेताओं का मानना है कि अब तक जो कुछ सिर्फ हेमंत सोरेन के हिसाब से हो रहा था, अब उसमें बदलाव आएगा. अब हेमंत के BJP में शामिल होने का शिगूफा छोड़ना आसान नहीं होगा. इसके बावजूद अगर वे जाते हैं, तो राज्य कांग्रेस के लिए यह बड़ा जीवनदान होगा और पार्टी मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपने पुराने वजूद में लौट आएगी.
रघुबर सरकार में मंत्री रह चुके और JDU के एकमात्र विधायक सरयू राय, नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने पर कहते हैं, "इसे एक स्कीम और डिजाइन के तहत अंजाम दिया गया है. यह निर्णय किसी के गले नहीं उतर रहा है."
झारखंड में JMM के BJP के साथ जाने की अटकलों और कांग्रेस को मिली राहत पर राय का कहना है, " कांग्रेस को राहत जरूर मिली है, लेकिन अब उसे अपने विधायकों पर अधिक नियंत्रण रखना चाहिए. राज्य कांग्रेस और JMM के बीच कम्यूनिकेशन गैप है, जबकि कांग्रेस नेतृत्व के साथ हेमंत सोरेन के संबंध अच्छे हैं. निश्चिंत होने के बजाय कांग्रेस को अपने उन नेताओं पर ध्यान देना चाहिए जो समय-समय पर बिरसा कांग्रेस का झंडा लेकर निकल पड़ते हैं."
JMM के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य कहते हैं, "कांग्रेस क्या सोच रही है, इस पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा, लेकिन JMM के BJP में जाने की बात हमेशा अफवाह ही रही है. जहां तक राजेश ठाकुर की इस टिप्पणी का सवाल है कि BJP के साथ जाने से JDU खत्म हो जाएगी, तो इसमें कोई सच्चाई नहीं है." वे इसके लिए दलील देते हैं कि BJP के साथ जाने से न तो शिवसेना खत्म हुई है और न ही JDU खत्म होगी. जो पार्टी विचारधारा पर आधारित है, उसके विधायक-सांसद भले कम हो जाएं, पार्टी खत्म नहीं होती.
इन सभी दलीलों के बीच आखिरी बात यही सच है कि राजनीतिक गठबंधनों की उम्र निश्चित नहीं होती. अवसर और हालात ही तय करते हैं कि कब, कौन, किसके साथ रहेगा.