राज्यसभा चुनाव के बहाने कैसे तैयार हुई नीतीश की विदाई की पटकथा?
बिहार में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद छोड़ने की अटकलें तो लंबे समय से लग रही थीं लेकिन यह बदलाव जिस तरह से हुआ, उसने सबको चौंकाया है

होली का अगला दिन. 11 बजने में कुछ मिनट पहले बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट करके अपनी तरफ से यह साफ कर दिया कि वे राज्यसभा जा रहे हैं, दूसरे शब्दों में कहें तो वे अब बिहार के मुख्यमंत्री नहीं रहेंगे.
अपनी पोस्ट में उन्होंने लिखा कि वे इसलिए राज्यसभा जा रहे हैं, क्योंकि अब तक उन्होंने तीन सदनों- लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद का प्रतिनिधित्व किया है. इस चौथे और उच्च सदन में जाने की उनकी अभिलाषा शेष थी, इसलिए वे वहां जा रहे हैं.
नीतीश कुमार पहले भी ऐसी इच्छा जाहिर करते रहे हैं. हालांकि अब यह सोशल मीडिया पोस्ट बिहार की जनता के लिए उनका आधिकारिक स्पष्टीकरण है. मगर सवाल यह है कि महज तीन महीने पहले बंपर जीत हासिल कर दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री बने नीतीश कुमार, जिनकी पार्टी के पास 85 विधायक, 12 लोकसभा और चार राज्यसभा सांसद हैं, उन्होंने अचानक बिहार की सत्ता छोड़कर राज्यसभा जाने का फैसला क्यों लिया?
माना जाता है कि बिहार ही नहीं, केंद्र की सत्ता की चाबी भी उनके पास है. अपनी जाति के अलावा उन्हें राज्य की 36 फीसदी अतिपिछड़ी जातियों और 50 फीसदी महिलाओं का अपार समर्थन प्राप्त है. क्या यह महज राज्यसभा जाने की उनकी ‘अभिलाषा’ भर थी या इसके पीछे कोई और कहानी भी है?
बिहार में राजनीति के जानकारों को उनके स्पष्टीकरण के बावजूद यह कहानी इसलिए असहज लग रही है, क्योंकि महज दो दिन पहले तक उनके राज्यसभा जाने की कोई चर्चा नहीं थी. होली के एक दिन पहले तक सबकुछ तय हो चुका था. JDU की तरफ से दो नाम पक्के हैं. पहला रामनाथ ठाकुर, जो बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के बेटे हैं और पिछले दो टर्म से राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. वे केंद्र सरकार में मंत्री भी हैं.
दूसरा नाम खुद नीतीश कुमार के बेटे निशांत का था. उनके एक-सवा साल से राजनीति में आने और अपने पिता की विरासत संभालने की चर्चा थी. पिछले दिनों इन चर्चाओं को तब और बल मिला जब नीतीश के करीबी दो मंत्रियों, श्रवण कुमार और अशोक कुमार चौधरी ने मीडिया के सामने पुष्टि कर दी कि इस होली के बाद निशांत का राजनीति में आना तय हो गया है.
मगर तीन मार्च के तीसरे पहर सीएम हाउस का माहौल बदलने लगा. JDU की राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची आने में देर होने लगी और अंदरखाने से खबर मिली कि BJP ने संदेश भेजा है कि नीतीश जी को अब कुर्सी छोड़ देनी चाहिए.
सत्ता के करीबी लोग नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि BJP से मिले संदेश के बाद नीतीश असहज हो गए थे. यह तय था कि BJP और JDU के बीच सत्ता का हस्तांतरण होगा, मगर इस तरह अचानक होगा, इसके लिए वे मानसिक रूप से तैयार नहीं थे. ऐसे में उम्मीदवार की घोषणा की जगह यह मंथन शुरू हो गया कि आगे की रणनीति क्या हो. पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा से बीच का रास्ता निकालने के लिए कहा गया.
BJP के शीर्ष नेतृत्व से बात करके अगले दिन (होली के दिन, 4 मार्च को) जब संजय कुमार झा नीतीश से मिलने पहुंचे, तो मुख्यमंत्री इस बात के लिए सहमत हो गए कि निशांत के बदले वे खुद राज्यसभा जाएंगे और निशांत को जल्द पार्टी और सरकार में भूमिका दी जाएगी. मगर खबर यह भी थी कि नीतीश इस फैसले से बहुत खुश नहीं हैं. उनके करीबी भी अचानक हुए इस फैसले को लेकर सहज नहीं हो पा रहे थे.
नीतीश कुमार के एक बेहद करीबी व्यक्ति बताते हैं कि निशांत ने अपने पिता से कहा था कि वे अभी पार्टी और सत्ता संभालने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने अपने पिता से आग्रह किया है कि वे दिल्ली न जाएं. मगर नीतीश का कहना था कि अब तो यह फैसला हो चुका है और अगले दिन उन्होंने इस पर खुद मुहर भी लगा दी.
JDU में उठे बगावत के स्वर
जैसे ही JDU के नेताओं को पता चला कि नीतीश को राज्यसभा भेजे जाने का फैसला हो चुका है, पार्टी का एक धड़ा उदास नजर आने लगा. देर शाम तक जब सीएम हाउस में पार्टी के सीनियर नेता सत्ता हस्तांतरण की शर्तों को अपनी तरफ से फाइनल कर रहे थे, पार्टी के जमीनी कार्यकर्ता उनके आवास के आगे जुटने लगे. धीरे-धीरे हवा में ये आरोप तैरने लगे कि नीतीश के कुछ करीबी नेताओं ने अपने फायदे के लिए पार्टी और बिहार का सौदा कर लिया है. पार्टी कार्यकर्ता संजय झा और ललन सिंह के खिलाफ नारे लगाने लगे. 5 तारीख को तो नाराज कार्यकर्ताओं ने JDU दफ्तर में तोड़फोड़ तक कर दी है.
विजय चौधरी जैसे नीतीश के करीबी नेताओं ने जरूर यह कहकर माहौल को शांत करने की कोशिश की कि जो कुछ हो रहा है, नीतीश जी की मर्जी से हो रहा है. मगर जमीनी कार्यकर्ताओं ने इस पर भरोसा नहीं किया. खासतौर पर जब यह खबर आई कि गृह मंत्री अमित शाह इस मौके पर बिहार आ रहे हैं और वे JDU नेताओं से भी मिलेंगे, तो कार्यकर्ताओं ने इसे BJP के दबाव के रूप में देखा.
ऐसे में JDU के एमएलसी संजय सिंह और झारखंड के विधायक व नीतीश के दोस्त रहे सरयू राय ने इस फैसले का सार्वजनिक विरोध किया. संजय सिंह ने कहा कि बिहार की जनता नहीं चाहती कि नीतीश अभी बिहार छोड़कर जाएं. वहीं सरयू राय ने कहा कि कोई भी हस्तांतरण इस तरह झटके में नहीं होना चाहिए.
5 मार्च की सुबह नीतीश के आवास के सामने उनके समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं की भीड़ जमा होने लगी. उन लोगों ने कहा कि वे नीतीश को राज्यसभा का नामांकन करने नहीं जाने देंगे. उन्होंने एक विधायक की गाड़ी भी रोक ली. ऐसे में माहौल का जायजा लेने एसएसपी खुद पहुंचे और भारी पुलिस बल तैनात किया गया. कई जानकार यह भी मानते हैं कि इस तनाव को शांत करने के लिए ही मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सोशल मीडिया पर यह पोस्ट किया कि सबकुछ उनकी इच्छा से हो रहा है.
क्या पहले से तय था सत्ता का हस्तांतरण
ऐसा कहा जा रहा है कि BJP और JDU के बीच काफी पहले से यह समझ थी कि चुनाव के बाद बिहार में दोनों दलों के बीच सत्ता का हस्तांतरण होगा. यह सहज तरीके से होगा, ताकि मतदाताओं को ऐसा न लगे कि उनके साथ कोई धोखा हुआ है.
दिल्ली में BJP बीट कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, “दरअसल चुनावी नतीजों के आने के ठीक बाद BJP के केंद्रीय नेतृत्व ने नीतीश के करीबी नेताओं को बुलाकर संदेश दे दिया था कि नीतीश अब अपने बिगड़ते स्वास्थ्य की वजह से मुख्यमंत्री के रूप में लंबी पारी नहीं खेल पाएंगे. इस पर उन नेताओं ने कहा था कि चुनाव नीतीश के चेहरे पर ही जीता गया है, ऐसे में अभी उन्हें हटाकर किसी और को सीएम बनाना ठीक नहीं रहेगा. लेकिन BJP अब और इंतजार करने के मूड में नहीं थी, इसलिए यह फैसला हुआ.”
बताया जाता है कि JDU नेताओं ने पिछले एक साल से कह रखा था कि नीतीश अपने बेटे निशांत को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रहे हैं. ऐसे में जब निशांत को राज्यसभा भेजे जाने की बात आई, तो BJP को लगा कि नीतीश सत्ता हस्तांतरण की बात को और टाल रहे हैं. इसलिए उन्हें यह संदेश भेजा गया.
दोनों पार्टियों से जुड़े लोग बताते हैं कि BJP के केंद्रीय नेतृत्व में जहां प्रधानमंत्री मोदी, नीतीश के साथ धैर्यपूर्वक उनकी इच्छा से सत्ता हस्तांतरण के पक्षधर रहे हैं, वहीं अमित शाह का हमेशा से मानना रहा है कि बिहार में अब BJP का मुख्यमंत्री होना चाहिए. पार्टी पिछले 21 साल से कमोबेश JDU के साथ सत्ता में है और राज्य में अभी तक नीतीश के हिसाब से सत्ता चलती रही है. इसलिए वे अब अपना सीएम चाहते हैं.
नीतीश क्यों दबाव में आए?
JDU के पास 85 विधायक और 12 लोकसभा सांसद हैं. इस लिहाज से केंद्र की NDA सरकार की एक चाबी उनसे पास भी है. फिर नीतीश आखिर दबाव में क्यों हैं?
टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं, “मैंने इस बार के विधानसभा चुनाव के वक्त ही एक आलेख में लिखा था कि नीतीश के चेहरे पर BJP चुनाव भले जीत जाए, मगर वह ज्यादा दिन नीतीश को सीएम के तौर पर नहीं रहने देगी. नीतीश आज भले ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हों, लेकिन वे राजनीतिक रूप से काफी मजबूत स्थिति में हैं. ऐसे में वे क्यों दबाव में हैं और BJP की शर्तों के आगे झुक रहे हैं, यह समझ से परे है. ऐसा लगता है कि BJP के पास उनकी कोई दुखती रग है, या फिर नीतीश के करीबियों ने अपने स्वार्थ के लिए BJP से समझौता कर लिया है.”
इस बदलाव का क्या असर होगा?
राज्यसभा जाने का फैसला नीतीश कुमार के राजनीतिक करियर के 20 साल चले स्वर्णकाल का पटाक्षेप है. उन्होंने इन दो दशकों में अपराध नियंत्रण, आधारभूत संरचना विकास, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक न्याय जैसे कार्यों के जरिए अपनी एक बेहतर छवि विकसित की है. क्या अगला मुख्यमंत्री इस परंपरा को जारी रखेगा?
पुष्पेंद्र के मुताबिक नीतीश के कार्यकाल को हम इसलिए याद करते हैं कि उन्होंने बिहार को जातीय संघर्ष और अपराध के अराजक दौर से बाहर निकाला. विकास के कई बड़े काम किए. लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि वे जब तक मजबूत रहे, BJP के साथ रहते हुए भी बिहार को सांप्रदायिक तनाव की राजनीति से काफी हद तक बचा कर रखा.
इसके अलावा पुष्पेंद्र एक और बड़े बदलाव की तरफ इशारा करते हैं. वे कहते हैं, “यह सब जानते हैं कि अब बिहार की सत्ता मुख्यमंत्री कार्यालय से निर्देशित होती है. नीतीश ने BJP के साथ रहते हुए भी इसका चरित्र समाजवादी, लोक-कल्याणकारी, लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष बनाकर रखा था. वे क्राइम, करप्शन और कम्युनलिज्म से समझौता नहीं करते. क्या अगले सीएम, जो दक्षिणपंथी विचारों को मानने वाले होंगे और जिनका कंट्रोल BJP के शीर्ष नेतृत्व के पास होगा, इस परंपरा को आगे बढ़ाएंगे या फिर वे अपनी पार्टी की कोर विचारधारा को लागू करने की कोशिश करेंगे? यह देखने वाली बात होगी.”
इस पूरे मामले पर बिहार में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने कहा है, “नीतीश कुमार राज्यसभा जा रहे हैं तो हमारी सहानुभूति है. हम लोग साथ रहते तो आज ये दिन नहीं देखना पड़ता. हम प्रार्थना करेंगे कि सेहतमंद रहें.” इसके आगे उन्होंने BJP पर आरोप लगाते हुए यह भी कहा “हम पहले भी कहते रहे हैं कि पूरी तरह से नीतीश कुमार को हाईजैक कर लिया गया है. आज वह बात साबित हो गई. जनभावना इस परिवर्तन के खिलाफ है. सबको पता था कि BJP यह करेगी. यह पार्टी जिसके साथ भी रही है, सबसे पहले अपने सहयोगी दलों को खत्म करती है. कहीं भी चले जाइए BJP राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एजेंडा लाना चाहती है.”