नीतीश के टिके रहने के बावजूद बार-बार सरकार बदलना बिहार पर कैसे भारी पड़ा?

बिहार में 12 साल में नौवीं बार सरकार बदलने की आहट ने विकास कार्यों की रफ्तार पर फिर ब्रेक लगा दिया है

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)

बिहार में राजस्व विभाग के हजारों कर्मचारी 11 फरवरी से हड़ताल पर हैं. इस बीच राज्य में बड़ा राजनीतिक बदलाव स्पष्ट हो चुका है. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जल्द ही पद छोड़कर राज्यसभा चले जाएंगे. 

इसी हवाले से 11 मार्च को बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने इन हड़ताली कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा, “लोग भ्रम में न रहें. कल भी एनडीए की सरकार थी, आज भी एनडीए की सरकार है, कल भी एनडीए की सरकार रहेगी.'

इसके आगे उनका कहना था कि जो लोग कर्मचारियों को बरगला रहे हैं कि सत्ता परिवर्तन होगा और मुक्ति मिल जाएगी, यह संभव नहीं है. हर हाल में राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग का जो अभियान होगा, उसे बिहार के हित में पूरा करना होगा.

सिन्हा अपने विभाग के कर्मचारियों को यह बता रहे थे कि वे यह उम्मीद न रखें कि सत्ता परिवर्तन के बाद भूमि सुधार महाअभियान खत्म हो जाएगा. दरअसल, इन दिनों विजय कुमार सिन्हा के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग में ही नहीं, बल्कि बिहार के ज्यादातर विभागों में कामकाज की गति सुस्त है. नए फैसले नहीं लिए जा रहे और एक ठहराव-सा आ चुका है. 

ऐसा लग रहा है कि सभी महत्वपूर्ण फैसलों को नई सरकार के गठन तक टाल दिया जा रहा है. हालांकि राज्य में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है. पिछले 12 वर्षों में यह नौवां मौका है, जब सरकार बदल रही है और सचिवालय में नई सरकार का इंतजार है.

बिहार के बारे में कहा जाता है कि 2005 से अब तक पिछले 21 वर्षों में नीतीश कुमार की पार्टी JDU लगातार सत्ता में रही है. मई 2014 से फरवरी 2015 के छोटे से अंतराल को छोड़ दिया जाए तो इस अरसे में नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहे हैं और उन्हीं के हिसाब से बिहार की सरकार चलती रही है. यह एक तरह का स्थायित्व है. मगर इस तथ्य पर जब हम थोड़ी और बारीक निगाह डालते हैं, तो समझ आता है कि मई 2014 से मार्च 2026 के बीच के 12 सालों में ही बिहार की सरकार आठ बार बदल चुकी है. 

अब जिस बदलाव का मौका है, वह इस अवधि का नौवां बदलाव होगा. इस दौरान औसतन हर एक-सवा साल में सरकार बनती और गिरती रही है. भले ही इन बदलावों के बाद भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे, मगर अकसर विभागों के मंत्री बदले गए. ऐसे में काम की निरंतरता हर बार बुरी तरह प्रभावित होती है. अगर सिर्फ राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की बात की जाए, तो इस अवधि में आठ अलग-अलग लोग इस विभाग को संभाल चुके हैं.

हालांकि लंबे अरसे से बिहार सरकार का एजेंडा बिहार में भूमि विवादों को समाप्त करना रहा है और हर मंत्री इसकी कोशिश करता है. मगर हर मंत्री इसके लिए अलग-अलग अभियान चलाता है और सरकार में बदलाव के बाद पुराना अभियान खटाई में पड़ जाता है.

इसी तरह बिहार में एक महत्वपूर्ण विभाग उद्योग विभाग है. नीतीश सरकार की अब तक की सबसे बड़ी चुनौती राज्य में उद्योग को बढ़ावा देने और निवेश लाने की रही है. मगर पिछले पांच वर्षों में ही इस विभाग में चार मंत्री बदल चुके हैं. फरवरी 2021 में शाहनवाज हुसैन जब बिहार के उद्योग मंत्री बने, तो उन्होंने राज्य में उद्योगों की स्थापना के लिए कई तरह के प्रयास किए और इन प्रयासों की वजह से उन्हें सराहना भी मिली. मगर महज डेढ़ साल में ही उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा, क्योंकि नीतीश कुमार ने RJD के साथ मिलकर सरकार बना ली. तब RJD के समीर महासेठ उद्योग मंत्री बने. उन्होंने भी गंभीरता से काम शुरू किया, मगर उनका तरीका और प्राथमिकताएं अलग थीं. उनके समय में पटना में एक बड़ा 'बिजनेस कनेक्ट' भी आयोजित हुआ. मगर अगले डेढ़ वर्षों में उनकी भी विदाई हो गई, क्योंकि नीतीश कुमार अब BJP के साथ आ गए थे.

फिर नीतीश मिश्रा को बिहार का उद्योग मंत्री बनाया गया. उन्हें थोड़ा अधिक वक्त मिला, तकरीबन 22 महीने. उन्होंने भी अपने तरीके से काम किया और नए प्रस्ताव बनाए. कुछ काम आगे बढ़े और कुछ की शुरुआत हुई. मगर नवंबर 2025 में जब नई सरकार बनी, तो यह पद उनसे लेकर दिलीप जायसवाल को दे दिया गया. नई सरकार बनते ही नई औद्योगिक नीति भी बनी और प्राथमिकताएं भी बदलीं. AI और डिफेंस कॉरिडोर जैसे प्रयोगों पर जोर दिया गया. मगर अभी दिलीप जायसवाल इस विभाग को समझ ही रहे थे कि सरकार बदलने की नौबत आ गई है. अगली सरकार में दिलीप जायसवाल ही मंत्री रहेंगे या कोई नया नाम आएगा, यह कहना मुश्किल है.

नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर उद्योग विभाग के एक अधिकारी कहते हैं, “कहा जाता है कि बिहार में सबकुछ नीतीश जी के हिसाब से होता है. मगर हम देखते हैं कि जैसे ही नया मंत्री आता है, विभाग में सीनियर ब्यूरोक्रेट बदल जाते हैं. मंत्री अपनी पसंद का अधिकारी लेकर आते हैं. ऐसे में जिस प्रोजेक्ट पर पिछले कुछ महीने से निवेश की प्रक्रिया चल रही होती है, वह रुक जाती है. नया अधिकारी नए तरीके से प्रोजेक्ट का रिव्यू करता है. ऐसे में कई बड़ी कंपनियां उद्योग स्थापित करने के लिए जमीन अलॉट करवाकर भी रुकी रहती हैं. कुछ साल पहले शाही एक्सपोर्ट और रिहाना टेक्सटाइल जैसी कंपनियां तय नहीं कर पा रही थीं कि वे बिहार में निवेश करें या नहीं, क्योंकि बार-बार सरकार बदलने से उनका कॉन्फिडेंस लेवल भी कमजोर होता है.”

यही वजह है कि पिछले एक दशक में एक-दो बड़ी इंडस्ट्री को छोड़कर कोई बड़ा निवेश बिहार में नहीं आया है. लघु उद्यम की योजनाएं भी बार-बार खटाई में जा रही हैं. जाति आधारित गणना के बाद राज्य के 93 लाख परिवारों के एक सदस्य को रोजगार शुरू करने के लिए दो लाख रुपए देने की योजना अभी धीमी गति से चल रही है.

शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानव विकास से जुड़े विभागों में भी योजनाओं की निरंतरता इसी वजह से प्रभावित होती रही है. एक जमाने में बिहार में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों को स्कूल के नजदीक आवास दिलाने और महिला शिक्षकों को स्कूटी सिखाने की योजना बनी थी. वह योजना अब खटाई में है. पिछले दिनों हर पंचायत में जीवका दीदी की लाइब्रेरी खोले जाने की घोषणा हुई थी, अब उस घोषणा का कहीं अता-पता नहीं है.

बिहार पहले भी ऐसा दौर देख चुका है. 1961 से 1990 के बीच 29 वर्षों में बिहार में 23 बार सरकारें बदली थीं. इन बदलावों की वजह से आजादी के ठीक बाद श्रीकृष्ण सिंह ने जिस स्थाई विकास की आधारशिला रखी थी, वह प्रभावित होती रही. हालांकि पिछले 12 वर्षों में राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही हैं, मगर सरकारें बदलती रही हैं और विभागों के मंत्री-अफसर भी.

जब इसका असर समझने के लिए हमने अर्थशास्त्री प्रो. विद्यार्थी विकास से बात की. उनका कहना है, “बिहार में जब भी सरकार बदली, हमने देखा है कि ब्यूरोक्रेसी और एडमिनिस्ट्रेशन में बड़े पैमाने पर फेरबदल होता है. इसकी वजह से ठेकेदार भी बदलते हैं. वजह यह है कि जब भी सरकार बदलती है, तो सत्ता का समीकरण भी बदल जाता है. इससे आर्थिक समीकरण तो बदलते ही हैं, सामाजिक समीकरण में भी बदलाव आता है. इससे लंबी अवधि की परियोजनाएं बुरी तरह बाधित होती हैं. जाहिर है इससे बिहार के विकास को धक्का पहुंचता है. हालांकि इस धक्के को ऊपरी तौर पर महसूस नहीं किया जाता, क्योंकि सत्ता के शीर्ष पर एक ही व्यक्ति है. मगर अंदर ही अंदर यह धक्का काम-काज पर असर डालता है.”

वहीं टाटा सामाजिक संस्थान के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र थोड़ी अलग राय रखते हैं. वे कहते हैं, “चूंकि नीतीश कुमार इस अवधि में लगातार सीएम रहे और वे केंद्रीकृत तरीके से सरकार चलाते रहे हैं, इसलिए एक तरह की निरंतरता तो बनी रहती ही है. हां, इन नीतियों को जमीन पर लागू कराने में फर्क पड़ सकता है. जल्दी-जल्दी होने वाले बदलावों का ज्यादा असर सामाजिक क्षेत्र के कार्यों, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और पेयजल जैसी व्यवस्थाओं पर निश्चित तौर पर पड़ता है.” 

बिहार की आर्थिक बदहाली के लिए पुष्पेंद्र नीतीश कुमार को ही जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं, “आर्थिक स्थिति और कानून व्यवस्था में जो कमियां हैं, वे सरकारों के बदलने से नहीं हैं. उनकी वजह नीतीश कुमार की नीतियों की विफलता है. क्योंकि बुनियादी ढांचे के विकास का काम जो उनकी प्राथमिकता रही है, वह अमूमन अटकता नहीं है. उद्योग और कानून व्यवस्था की विफलता की जिम्मेदारी नीतीश कुमार के ही खाते में जाएगी. इसलिए आज बिहार की प्रति व्यक्ति आय नाइजीरिया, सूडान और सिएरा लियोन जैसे देशों के बराबर है. आज डॉलर का एक्सचेंज रेट बढ़ने के बाद तो हमारी प्रति व्यक्ति आय मलावी के आसपास पहुंच गई है.”
 

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